Shambhunath Shukla : बात १९७३ की है। हमारे एक परिचित सज्जन कानपुर से कांग्रेस के टिकट पर विधायकी का चुनाव लड़ रहे थे। यह वह जमाना था जब लोग कुछ हजार खर्च कर चुनाव लड़ लेते थे। वे सज्जन थे तो ईमानदार पर एक तो वे छात्र राजनीति से निकले थे दूसरे कभी समाजवादी युवजन सभा के अध्यक्ष रह चुके थे इसलिए उनकी छवि एक दबंग और गुंडे की ज्यादा थी। जबकि उन बेचारों ने कभी पंखुरी भी न मारी होगी पर इमेज एक तीरंदाज की। उन दिनों कानपुर में एकमात्र बड़े अखबार ने उनकी खबरों का बॉयकाट शुरू कर दिया। शायद अखबार चाहता था कि वे कुछ विज्ञापन दें। अब उनके पास धेला नहीं।
पार्टी ने कुछ बहुत प्रचार जरूर किया लेकिन निजी तौर पर वे एक पैसा भी न खर्च कर पाने की स्थिति में। तब एक दिन वे ऊबकर अखबार के दफ्तर पहुंचे और सीधे मालिक के केबिन जाकर गरजे- …… बाबू तू रोज अपनी फोटो अपने अखबार के पहले पेज पर छाप और तू विधायकी तो दूर पार्षद का चुनाव भी जीत जाए तो मैं राजनीति छोड़ दूंगा। मालिक महोदय की सिट्टी पिट्टी गुम। क्या बोलें। वे सज्जन चुनाव जीते और रिकार्ड मतों से जीते। अखबार या कारपोरेट घराने नरेंद्र मोदी को हीरो तो बना सकते हैं पर चुनाव वे उन्हें चिकमगलूर से भी नहीं जिता सकते।
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.





