Shambhunath Shukla : सोना जाने कसे और आदमी जाने बसे! … मेरे एक मित्र पत्रकार हैं संजय सिन्हा। आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर हैं। मेरे शुभचिंतक हैं और मैं अपनी गमी व खुशी उनसे जरूर बाटता हूं। बिंदास और हरदम खुश रहने वाले संजय सिन्हा मुझसे कोई दस बरस छोटे होंगे। पर जब वे आईआईएमसी से पत्रकारिता की डिग्री लेकर जनसत्ता में काम करने आए तो मेरे साथ ही उन्हें लगाया गया। लंबी काया के गोरे चिट्टे संजय किसी फिल्मी हीरो से कम नहीं लगते थे। वे जब आफिस आते तो उनके साथ लड़कियों का झुंड भी आता जो जनसत्ता में ट्रेनिंग के लिए नहीं, संजय का सानिध्य पाने के लिए आतीं।
लड़कियों की चहचहाट से जनसत्ता का न्यूज रूम गुलजार तो रहता पर उतना ही कामकाज प्रभावित होता। एक दिन मैने संजय से कहा कि संजय अपनी रेहड़ ले जाओ। संजय यह सुनते ही लगे रोने और रोते-रोते वे पहुंच गए रेजीडेंट एडिटर बनवारी जी के पास। बनवारी जी से उन्होंने कहा कि मुझे शंभूजी के साथ काम नहीं करना है। बनवारी जी ने कहा कि ठीक है पंद्रह दिन और देख लो फिर बदल देंगे। पर एक हफ्ते के बाद ही संजय फिर से बनवारी जी के पास पहुंचे और बोले- मुझे शंभूजी से कोई शिकायत नहीं है उन्हीं के साथ काम करने दीजिए। संजय का कहना था कि सोना जाने कसे आदमी जाने बसे। यानी शंभूजी के साथ एक हफ्ते काम करने के बाद ही मैं जान सका कि उनकी अहमियत क्या है।
खैर ये संजय सिन्हा उस समय हिंदी पत्रकारिता के लिए अजूबा थे। जिस आदमी की पढ़ाई विदेशों में हुई हो और जिसके चाचा, मामा, पिता सब इतने बड़े अधिकारी रहे हों कि तब यह कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि हिंदी में ऐसे परिवारों के बच्चे आ जाएंगे। संजय तो पैदा ही चांदी के चम्मच लेकर हुए थे। पर संजय में दो खूबियां उसे उसके क्लास से अलग करती थीं उसका संजीदापन और संवेदनशीलता। अन्याय के विरुद्ध संजय सबसे पहले बोलता और उसका साथ देते दूसरे एक और संजय जो खुद भी बिहार से थे, समृद्ध परिवार से थे लेकिन सामंती रौबदाब वाले परिवार से यानी हमारे संजय कुमार सिंह। एक लाला और दूसरा ठाकुर।
सिन्हा बोलता तो खूब सोच समझकर और यह मानकर कि पासा उसके खिलाफ नहीं जा सकता और संजय सिंह बोलते तो फिर उन्हें मेरे अलावा और कोई रोक नहीं सकता था। इसलिए यह पूरी फौज मेरे साथ ही रखी गई। हर नया संपादक दन दोनों को मेरे साथ से अलग करने की कोशिश करता लेकिन बुरी तरह मुंह की खाता। वह तो संजय सिन्हा बाद में जी न्यूज चले गए और मैं चंडीगढ़ में स्थानीय संपादक बनकर। उसके कुछ ही रोज बाद संजय सिंह ने नौकरी छोड़ दी और आज वैशाली में ठाठ से रह रहे हैं।
संजय सिन्हा के बिंदास बातूनीपन का एक उदाहरण बताता हूं। हम लोग २००१ में जेट एयर की फ्लाइट से कोलकाता जा रहे थे। जब हम बोर्डिेंग पास बनवा रहे थे तो हमारे आगे खड़ी एक विदेशी महिला का सामान ज्यादा था और उससे कहा जा रहा था कि सामान का अलग से भाड़ा दो। उस समय वो बहुत ज्यादा था। महिला बार-बार गिड़गिड़ा रही थी पर बोर्डिेंग पास बनाने वाली महिला मान ही नहीं रही थी। हमारे पास सामान के नाम पर एक पोलीथिन बैग भर था। संजय ने कहा कि इनका सामान हम दोनों लोगों के कोटे में डाल दो। यह सुनते ही उस महिला ने हमें बड़ी ही मनुहार भरी नजरों से देखा। जहाज के अंदर उस महिला की सीट हमारे ही साथ थी। विंडो सीट पर वह महिला थी, बीच में मैं और शुरू की सीट संजय की। उस जमाने में जहाज में बैठते ही परिचारिका एक ट्रे में कुछ टाफियां व रुई के गोले लेकर आया करती थी। संजय ने सारी टाफियां उठा लीं।
परिचारिका दोबारा ट्रे लेकर मेरे पास आई तो संजय ने कहा कि शंभूजी सारी टाफियां उठा लीजिए आखिर साढ़े सात हजार की टिकट ली है कुछ टाफियां तो बटोर ली जाएं। उसके बाद परिचारिका से कहा गया कि हिंदी अखबार लाओ। हिंदी अखबार उसके पास था नहीं सो वह टाइम्स आफ इंडिया लेकर आई। संजय ने कहा कि ये कौन सा अखबार है? वह बोली टइम्स आफ इंडिया। संजय ने कहा कि क्या मैं इसे उलटा पढ़ूं जब मुझे अंग्रेजी आती ही नहीं है तो मैं इसका क्या करूं? फिर संजय मुझसे बोला कि शंभूजी पड़ोस वाली महिला से पूछिए कि बहन जी कहां जा रही हैं? मैने कहा कि मैं नहीं पूछता, तुम पूछो। तब तक वह विदेशी गोरी महिला खुद बोली- मेरा नाम जरीना खान है। मैं फिलहाल कोलकाता जा रही हूं। मेरी ससुराल वहां के चटर्जी परिवार में है और मेरे पिता बांग्लादेशी हैं तथा मां ब्रिट्रिश। और हां मैं हिंदी जानती हूं और तुम लोगों की बातें सुनकर मुझे बड़ा मजा आ रहा था।
संजय आज भी मस्त हैं। वे पहले हिंदी पत्रकार थे जिन्होंने इंडियन एक्सप्रेस में काम कर रही प्रतिभाशाली पत्रकार दीपशिखा सेठ से शादी की थी। शायद यह पहला मौका था जब लड़की अंग्रेजी पत्रकार थी और लड़का हिंदी का। उस समय के इंडियन एक्सप्रेस के संपादक अरुण शौरी ने दोनों अखबारों के बीच फौरन एकदीवाल खड़ी करवा दी थी। इन संजय के छोटे भाई का पुणे में पिछले दिनों निधन हो गया और मैं रोज सोचता रहा कि जाऊंगा पर संजय से संवेदना जताने जा नहीं पाया सिर्फ मोबाइल से मैसेज कर दिया। दुख बहुत हुआ कि हम कितने संवेदन शून्य हो गए हैं कि वसुंधरा से पटपडग़ंज अपार्टमेंट नहीं जा पाया।
संजय सिन्हा का आज फोन आया और कहा कि शंभूजी आप फेसबुक पर इतने सक्रिय हैं कि मैने अपना बंद किया एकाउंट फिर खोल लिया। मैने कहा कि हां फालतू हूं इसलिए। संजय ने कहा नहीं शंभूजी आप अब ज्यादा सक्रिय हैं। और वह लिख रहे हैं जो लोग जीवन भर अखबार के पन्ने काले कर नहीं लिख पाते। आप खुद सोचिए आप जब अखबार में थे और खूब लिखते थे तब कितने लोग आपको पढ़ते थे और रिएक्ट करते थे आज आपको पढऩे वालों की संख्या हजारों में है। संजय सिन्हा का यह कहना मुझे और उत्साहित कर गया। संजय ने कहा कि शंभूजी अगर आप दो साल बाद रिटायर होते तो शायद इतनी लगन और उत्साह से नहीं लिख पाते क्योंकि साठ के बाद आदमी का उत्साह भी ठंडा पडऩे लगता है। संजय सिन्हा जैसे लोग बने रहेंगे तो मैं भला क्यों रिटायर होने लगा।
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.






