जहाँ तक मुझे याद पड़ रहा है करीब दो दशक हुये देश के नीति निर्माताओं ने प्रचार शुरू किया कि भारतीय अर्थव्यवस्था में ऐसा उफान आने वाला है जो न भूतो न भविष्यत होगा। उस समय बहती गंगा में हाथ वही धो पायेंगे, जिनके पास उन अवसरों को लपकने लायक डिग्रियाँ होंगी। तरह-तरह के लेख और प्रचार सामग्री इस बाबत अखबारों और बाकी मीडिया में आने लगीं जिससे ऐसा माहौल बना मानो, भारतीय अर्थव्यवस्था में तमाम ऐसे नये क्षेत्र खुलने ही वाले हैं, जिनमें बड़ी संख्या में युवक-युवतियाँ खपेंगे।
ये नये क्षेत्र उन परंपरागत क्षेत्रों के अलावा होने थे, जिनमें आमतौर पर छात्र जाया करते हैं मसलन डाक्टर, इंजीनियर, वकील, या दीगर सरकारी नौकरियाँ। यह तय है और इसे अन्यथा लेने की जरूरत नहीं है कि करीब दो दशक पहले तक लोगों की पहली पसंद सरकारी क्षेत्र के रोजगार होते थे, निजी क्षेत्र का नंबर उसके बाद था। प्राइवेट नौकरियाँ दोयम दर्जे की और असुरक्षित मानी जाती थीं।
हाल ही में थोड़े समय के लिये प्राइवेट नौकरियों पर बहार आई थी। लेकिन मंदी में इनका हाल देखने के बाद अब फिर से इन्हें दोयम दर्जे का ही माना जाने लगा है। लेकिन उदार अर्थव्यवस्था के उस शुरूआती दौर में जो माहौल बनाया गया उसमें यह भी प्रचार किया गया कि आर्थिक उदारीकरण के दौर में ज्यादा रोजगार निजी क्षेत्र में होंगे न कि सरकारी क्षेत्र में। अभी माता-पिता और विद्यार्थी इस शोर को समझ पाते कि धड़ाधड़ डिग्रियां बांटने वाले निजी संस्थान खुलने लगे। मजे की बात कि जहां एक सरकारी संस्थान या कालेज को विकसित होने में दशकों लग जाते हैं, वहाँ ये निजी संस्थान रातों रात विकसित हो गये।
सरकारी कालेजों और विश्वविद्यालयों में योग्य फैकल्टी नहीं मिलने का रोना बरसों से रोया जा रहा है, वहीं इन निजी संस्थानों को रातों रात योग्य फैकल्टी भी मिल गई और जब अर्थव्यवस्था ही उदार हो गई तो फिर मानव संसाधन विकास मंत्रालय क्यों नहीं उदार होता। उसने भी संस्थान खोलने के लाइसेंस उदारता से बांट डाले। इतना हुआ तो भी गनीमत थी, बहती गंगा में हाथ सरकारी संस्थाओं ने भी धोने शुरू कर दिये। तमाम डिग्री कालेजों और युनिवर्सिटीज में इस शोर-शराबे के साथ रोजगार मूलक कोर्सेज शुरू कर दिये गये कि चट डिग्री लीजिये और पट नौकरी (रोजगार) पाइये।
गौर कीजिये, जिस समय ये हल्ला मचना शुरू हुआ उस समय भारतीय समाज में दो-तीन परिवर्तन उल्लेखनीय थे, पहला सूचना क्रांति और उससे पैदा हुए रोजगारों का फायदा एक छोटे से तबके को हुआ था। दूसरा आबादी में एक ऐसा तबका तैयार हो गया था जो धनी तो बन गया था लेकिन परंपरागत और पुश्तैनी रूप से शिक्षित नहीं था। तीसरा निजी क्षेत्र और खास तौर से भारतीय परिपेक्ष्य में निजी क्षेत्र कितना असुरक्षित और बेईमान हो सकता है, इसका व्यापक अनुभव अभी लोगों को मिलना बाकी था, जो कालांतर में हाल ही में आयी मंदी के दौरान मिला। उस समय तो यही शोर था कि अब जो कुछ करेगा, निजी क्षेत्र ही करेगा, सरकारी संस्थाओं और नौकरियों के दिन अब गिने-चुने ही ठहरे। देखिये सूचना उद्योग ने कैसी छलांग लगाई है।
सयाने और पुराने लोग अगर स्मृति पर जोर डाले तो उन्हे याद आयेगा कि उस समय जिले-जिले में आई0टी0 हब बनाने की योजनाओं का ढिंढोरा था और हैदराबाद को साइबराबाद बनाने वाले आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंदबाबू नायडू राष्ट्रीय नायक थे। एक उल्लेखनीय बात और थी डाक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर और वकील सरीखे जो परपरांगत पेशे थे उन पेशो मे लगे लोगो की चकाचौंध देखकर बड़ी संख्या में लोग उन्ही पेशों मे ही जाना चाहते थे, लेकिन सरकारी संस्थाओ में सीटे सीमित थीं और अभी भी हैं। इधर नये-नये खुले निजी शिक्षण संस्थानो ने सपने दिखाये कि हमारे यहाँ आइये और मन चाही डिग्रियाँ लीजिए इसके लिए मेरिट और प्रवेश परीक्षा का कोई झंझट नही है।
तो साहब इस चहुँ ओर हल्ले या कह लीजिये हाँके से दिग्भ्रमित होकर आम जन रूपी रेवड़ (जानवरों का झुण्ड) निजी शैक्षणिक संस्थान रूपी शिकार गाहों में घुस गया और उसे डिग्रियाँ भी मिल गई। यह अलग बात है कि शिकारियों ने एक-एक डिग्री का मूल्य दस से पंद्रह लाख रूपये वसूला। डिग्रियाँ पाने के बाद जब यह रेवड़ सुरक्षित चारागाहों (मोटी पगार की नौकरियाँ) की तलाश में निकला तो देखा कि वहाँ सन्नाटा था। दिग्भ्रमित करने के लिये किये गये हल्ले के विपरीत वास्तविकता यह थी कि नौकरियाँ सीमित संख्या में ही थी और वो भी असुरक्षित। कई जगह तो नियोक्ताओं ने छात्रों को यह भी बताया कि आपकी डिग्री का कोई मोल ही नहीं है। नौकरी तो नहीं मिलेगी, हाँ अगर वे चाहें तो उपभोक्ता अदालत में जाकर डिग्री देने वाली संस्था से जुर्माना और क्षतिपूर्ति अलबत्ता वसूल सकते हैं।
इस पूरे माहौल से फिलहाल कैसी अफरा-तफरी मची है, उसके उदाहरण तो तमाम है, लेकिन अंदाजा लगाने के लिये दो ही पर्याप्त होगें। एक बड़े अखबार में सर्वे के हवाले से बताया गया कि अकेले उत्तर प्रदेश में पाँच लाख इंजीनियर बेरोजगार है। अब प्रदेश में इंजीनयरिंग, एम0बी0ए0 और दूसरे रोजगार परक पाठ्य क्रमों की लगभग दो तिहाई सीटें खाली रहती है। वहाँ एडमिशन के लिये छात्रों से गुहार लगाई जा रही है। महौल को भाँप कर और उससे घबराकर अब कई विश्वविद्यालयो ने अपने यहाँ के रोजगार मूलक पाठ्य क्रमों को बंद कर दिया है और प्राप्त सूचना के मुताबिक देश भर के चौंसठ निजी शैक्षणिक संस्थानों ने सरकार को आवेदन दिया है कि वे अपने यहाँ अब एम0बी0ए0 कोर्स नही चलाना चाहते , इन्हे बंद करने की इजाजत दी जाये।
इन सबसे ऊपर कोढ़ मंे खाज तब हुई जब तीन-चार साल पहले आई वैश्विक मंदी की आंधी में भारत में भी वे नौकरियाँ सबसे पहले धराशाही हुई, जो इन रोजगार परक पाठ्यक्रमों की बदौलत मिली थीं और जिनके बारे में प्रचार था कि उदार अर्थव्यवस्था के दौर में ये सुरक्षित और चमकदार भविष्य की गारंटी है।
इस पूरे परिप्रेक्ष्य में सबसे मार्मिक पहलू यह है कि लोगों ने अभी भी कोई सबक नहीं सीखा है। जहाँ देखो 'एजूकेशनल हब'

अनेहस शाश्वत
लेखक अनेहस शाश्वत वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं. दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्तान समेत कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर विभिन्न शहरों में सेवारत रहे. सक्रिय पत्रकारिता से संन्यास लेकर शाश्वत अब धर्म, अध्यात्म और समाज सुधार के क्षेत्र में सक्रिय हो चुके हैं.





