भाजपा में नरेंद्र मोदी का राजनीतिक कद बढ़ते ही, एनडीए में दरार का संकट और गहरा गया है। भाजपा और जदयू का गठबंधन खतरे में फंस गया है। जो तैयारियां हैं, उनको देखते हुए आसार यही हैं कि अगले 36 घंटों में जदयू, भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए से कुट्टी करने का फैसला ले लेगा। मोदी प्रकरण की आंच से जदयू नेतृत्व के तेवर काफी गर्म हो गए हैं। ऐसे में जदयू सुप्रीमो शरद यादव ने नया राजनीतिक विकल्प तलाशने की बात स्वीकार की है।
तीसरे मोर्चे का तानाबाना बुनने के लिए पहले से ही कुछ कोशिशें होती रही हैं। ये कोशिशें कोई ठोस आकार नहीं ले पा रही थीं। लेकिन ‘मोदी फैक्टर’ के चलते नए सिरे से राजनीतिक जोड़तोड़ के समीकरण बनाए जाने लगे हैं। शुरुआती दौर में जदयू, तृणमूल कांग्रेस और बीजद के बीच तालमेल बनाने की पहल शुरू हो गई है।
उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों भाजपा की गोवा कार्यकारिणी बैठक में मोदी को चुनाव प्रचार अभियान समिति का प्रमुख बना दिया गया था। इसी के बाद एनडीए के अंदर राजनीतिक उठापटक तेज हुई। खासतौर पर जदयू नेतृत्व बेचैन हो गया है। वह किसी कीमत पर मोदी को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। जबकि भाजपा नेतृत्व ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि अगला लोकसभा चुनाव मोदी के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। यह अलग बात है कि पार्टी ने औपचारिक तौर पर मोदी को पीएम ‘चेहरा’ घोषित नहीं किया। लेकिन महज इस ‘बहाने’ से ही जदयू नेतृत्व को फुसलाना मुश्किल हो गया है। यह अलग बात है कि शुरुआती दौर में शरद यादव के तेवर ज्यादा विद्रोही नहीं थे। वे यही कहते नजर आ रहे थे कि मोदी का ‘प्रमोशन’ भाजपा का अंदरूनी मामला है। जब उन्हें पीएम उम्मीदवार बनाया जाएगा, तब हम गठबंधन में रहने या बाहर जाने पर विचार करेंगे।
लेकिन जदयू में भी मोदी प्रकरण को लेकर अंदरूनी खींचतान बढ़ने की खबर है। सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का खेमा अब मोदी प्रकरण पर भाजपा नेतृत्व को कोई रियायत नहीं देना चाहता। नीतीश ने भी भाजपा से गठबंधन तोड़ने का मन बना लिया है। पार्टी के महासचिव शिवानंद तिवारी कहते हैं कि जिस तरह से मोदी को महिमामंडित किया गया है, ऐसे में भाजपा की नीयत साफ हो गई है। इस मामले में संघ नेतृत्व के दबाव में भाजपा ने समर्पण कर दिया है। यहां तक की इन लोगों ने अपने वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी के विरोध को भी कुचल डाला। ऐसे में अब समय आ गया है कि जदयू नेतृत्व दो टूक फैसला ले ले। शिवानंद कहते हैं कि सेक्यूलर राजनीतिक सिद्धांत पर वे लोग कोई समझौता नहीं कर सकते। देश हित में यही है कि विपक्ष के सेक्यूलर दल हाथ मिलाकर देश को नया राजनीतिक विकल्प दें।
जदयू के कई नेताओं ने मोदी के खिलाफ अपना अभियान तेज कर दिया है। शिवानंद तिवारी ने मोदी पर तीखा कटाक्ष किया है। कह दिया है कि मोदी इन दिनों लौह पुरुष सरदार पटेल की बहुत बात करते हैं। यदि 2002 में सरदार पटेल जिंदा होते, तो गुजरात के दंगों में मोदी का ‘कारनामा’ देखकर अवाक रह जाते। वे अगले ही क्षण कान पकड़कर मोदी को मुख्यमंत्री की गद्दी से उतार देते। बिहार जदयू के वरिष्ठ नेता एवं नीतीश सरकार ने कैबिनेट मंत्री नरेंद्र सिंह ने तो मोदी के खिलाफ ‘वाणी युद्ध’ ही शुरू कर दिया। वे यहां तक बोल गए कि अब भाजपा की कमान एक दंगाई दागी के हाथ में आ गई है। दंगाई शख्स हमें किसी भी सूरत में मंजूर नहीं है। पार्टी की कोर ग्रुप की बैठक में सैद्धांतिक तौर पर भाजपा से गठबंधन तोड़ने का फैसला हो चुका है। बस, औपचारिक ऐलान होना ही बाकी रह गया है।
अपने सिपहसालारों की इस तीखी बयानबाजी से शरद यादव कुछ दुखी नजर आए। उन्होंने अनौपचारिक बातचीत में कहा कि बयानबाजी में ना जाइए। हम लोग एक दो दिन में बैठक करके फैसला ले लेंगे। इतना जरूर है कि मोदी प्रकरण मेंं जदयू के विश्वास को तोड़ने की कोशिश हुई है। जिस तरह से मोदी को आगे बढाया जा रहा है, वह अब भाजपा का अंदरूनी मामला ही नहीं रहा। जदयू के इन निर्णायक तेवरों को देखकर भाजपा के रणनीतिकारों ने बीच बचाव की कोशिशें तेज कर दी हैं। पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कल यहां शरद यादव से मुलाकात की। जबकि राजनाथ सिंह, आडवाणी व मुरली मनोहर जोशी ने नीतीश से फोन पर बात की। भाजपा के इन दिग्गजों ने जदयू नेतृत्व से अनुरोध किया है कि वे जल्दबाजी में गठबंधन तोड़ने का फैसला न करें। क्योंकि इससे कहीं न कहीं कांग्रेस का राजनीतिक फायदा हो सकता है।
नीतीश कुमार ने यही कहा है कि मोदी प्रकरण पर स्थिति गंभीर है। जब तक भाजपा नेतृत्व यह घोषणा नहीं करता कि वह मोदी को किसी भी हालत में पीएम चेहरा नहीं बनाएगा, तब तक बात नहीं बन सकती। भाजपा वाले ऐसा आश्वासन देने की स्थिति में अभी नहीं हैं। जदयू सूत्रों के अनुसार नए राजनीतिक विकल्प के लिए पार्टी ने अपनी पहल तेज कर दी है। शरद यादव ने अपने दूत के रूप में पार्टी के प्रधान महासचिव केसी त्यागी को कोलकाता भेजा था। बुधवार को त्यागी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात की थी। उल्लेखनीय है कि तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता ने पहले ही सेक्यूलर दलों को तीसरे मोर्चे की तैयारी के लिए ‘न्यौता’ दिया है। उन्होंने साझा ‘फेडरल फ्रंट’ बनाने की बात की है।
इस संदर्भ में ममता की बात बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से हो चुकी है। नवीन और नीतीश दोनों ने साझा मोर्चा के लिए सकारात्मक रुख अपनाया है। इसी बात को आगे बढ़ाने के लिए जदयू ने केसी त्यागी को खास जिम्मेदारी दी है। त्यागी का कहना है कि समय की मांग है कि भाजपा और कांग्रेस से अलग एक राजनीतिक विकल्प देश को मिले। क्योंकि कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने नौ सालों में देश को तमाम तरह के संकटों में डाला है। जबकि भाजपा नेतृत्व एक बार फिर सांप्रदायिक राजनीति के प्रयोग पर आमादा दिखाई पड़ता है।
नवीन पटनायक ने ओडिशा को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के लिए राजनीतिक मुहिम शुरू की है। इसी सिलसिले में उन्होंने दिल्ली में बुधवार को एक बड़ी रैली की थी। जदयू और तृणमूल कांग्रेस दोनों ने इस मुद्दे पर नवीन को अपना सैद्धांतिक समर्थन भी दिया। तीन दलों की इस नई पहल को देखते हुए कई और राजनीतिक क्षत्रपों ने इसमें अपनी दिलचस्पी जता दी है। खासतौर पर टीडीपी के प्रमुख चंद्र बाबू नायडू ने कह दिया है कि वे तीसरे मोर्चे के हिमायती हैं। वे कोशिश कर रहे हैं कि सभी प्रमुख विपक्षी सेक्यूलर दल नया विकल्प देने के लिए एकजुट हों। ममता ने कह दिया है कि नवीन और नीतीश से बात करके, बात और आगे बढ़ाई जाएगी। ‘झारखंड विकास मोर्चा’ के नेता बाबू लाल मरांडी भी ‘फेडरल फ्रंट’ के हिमायती हो गए हैं। उन्होंने ममता बनर्जी से मुलाकात कर ली है। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस से चोट खाने के बाद मरांडी अपने लिए नया राजनीतिक गठबंधन तलाश रहे हैं।
बिहार में भाजपा और जदयू की साझा सरकार है। यहां पर विधानसभा की 243 सीटे हैं। जदयू के पास 118 सीटे हैं, जबकि बहुमत के लिए 122 विधायकों की दरकार है। चार निर्दलीय विधायकों के समर्थन की जुगाड़ जदयू ने कर ली है। ऐसे में भाजपा के बगैर नीतीश सरकार बरकरार रह सकती है। समझा जाता है कि यह सब राजनीतिक प्रबंधन, गठबंधन से बाहर जाने की कवायद का हिस्सा है। भाजपा के सहयोगी दल शिवसेना ने मोदी के मुद्दे पर नीतीश के रवैए से नाराजगी जाहिर की है। शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में लिखा गया कि नीतीश, भाजपा की बदौलत ही मुख्यमंत्री बने बैठे हैं। यदि उन्होंने भाजपा से 18 साल पुराना गठबंधन तोड़ा, तो यह फैसला उन्हें बहुत महंगा पड़ेगा। वे यह न भूलें कि बगैर भाजपा के वे सत्ता का मुंह नहीं देख पाएंगे। शिवसेना और कई संघ परिवारियों के कटाक्षों ने दोनों दलों के बीच रार और बढ़ा दी है। दोनों दलों के बीच राजनीतिक तलवारें उठ गई हैं। अब इनका म्यान में वापस जाना मुश्किल हो गया है। सो, तीसरे विकल्प की खिचड़ी भी एक खास रणनीति के तहत पकाई जाने लगी है।
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।





