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अवधनामा अखबार के छह साल

लखनऊ। अखबार निकालना एक बात होती है। उसे लगातार निकालते रहना दूसरी बात होती है, लेकिन अपने उसूलों पर कायम रहते हुए अखबार निकालते रहना बहुत बड़ी बात होती है। अवधनामा हिन्दी ने कई बार खुद को साबित किया है। अवधनामा उसूलों की पत्रकारिता करता है और यही हमारी पहचान है। उसूली पत्रकारिता करते हुए अपने सातवें साल में कदम रखना एक बड़ी बात होती है। पिछले सात सालों में अपने पाठकों से हमें जो मशविरे मिले हैं, उनकी हमने हमेशा इज्जत की है। हम चाहते हैं कि हमारे पाठक आगे भी अपने मशविरों से हमें मालामाल करते रहें।

लखनऊ। अखबार निकालना एक बात होती है। उसे लगातार निकालते रहना दूसरी बात होती है, लेकिन अपने उसूलों पर कायम रहते हुए अखबार निकालते रहना बहुत बड़ी बात होती है। अवधनामा हिन्दी ने कई बार खुद को साबित किया है। अवधनामा उसूलों की पत्रकारिता करता है और यही हमारी पहचान है। उसूली पत्रकारिता करते हुए अपने सातवें साल में कदम रखना एक बड़ी बात होती है। पिछले सात सालों में अपने पाठकों से हमें जो मशविरे मिले हैं, उनकी हमने हमेशा इज्जत की है। हम चाहते हैं कि हमारे पाठक आगे भी अपने मशविरों से हमें मालामाल करते रहें।

गुजश्ता सात सालों में बहुत कुछ बदला है। मुल्क का मिज़ाज बदला, सियासत का मेयार बदला, अखबारों का कलेवर बदला और खबरों का असर बदला है। मगर अफ़सोस ये कि ज्यादातर अखबार कलेवर बदलने के साथ ही अपना तेवर खो दे रहे हैं। तल्ख़ सच्चाई ये है की ज्यादातर पाठक आज  अखबार पढ़ते नहीं देखते हैं। हमारी चुनौती भी यही है। हमे अखबार दिखाने से ज्यादा रूचि अखबार पढ़ाने में है। मल्टी एडिशन के युग में हमने ये तय किया कि हम एक ही एडिशन में पूरे सूबे की खबरे पढ़ाएंगे। बाजार के लिहाज से ये सौदा घाटे का हो सकता है मगर पाठक के लिहाज से यकीन जानिए ये लोगों को पसंद भी आ रहा है।

अवधनामा हिन्दी के सातवें साल का आज पहला कदम है। बीते सालों में हमने यही समझा है कि हमारे लिए हमारे पाठकों से बढ़कर कुछ भी नहीं है। वह हम पर यकीन करते हैं तो हम भी उन्हें वही परोसना चाहते हैं जो सिर्फ सच हो। हमारे सच की वजह से हम पर तमाम इल्जाम भी लगते रहे हैं। हमें एक खास पाठक वर्ग का अखबार तक कहा गया लेकिन हम एलानिया यह बता चुके हैं कि 'हम आप तक बेबाकी और बेखौफ होकर खबरें पहुंचाते हैं क्योंकि हम प्रायोजित खबरें छापते नहीं। इजराइल से हमने पैसे लिए नहीं और ईरान ने कभी दिये नहीं। किसी राजनेता से कोई सम्बन्ध नहीं है। हमारा कोई कारोबार ऐसा है नहीं जिसके लिए हमें अखबार निकालने की जरूरत पड़े। हमारे हिन्दी और उर्दू ससंस्कण में दोहरी पालिसी नहीं है फिर भी मौलवी हजरात हमसे खुश नहीं। हमारी हकगोई की बिना पर कोई हकूमत चाहती नहीं कि अखबार निकलता रहे फिर भी अगर अखबार निकल रहा है तो सिर्फ आपके लिए। आपकी आवाज बनने के लिए और जब तक आप चाहेंगे निकलता रहेगा'।

अवधनामा के जरिये हमने तमाम मुद्दों पर सोती हुई व्यवस्था को जगाया। हमने लगातार यह कोशिश की कि हमारे पाठकों तक सच पहुंचता रहे। हमने यह कोशिश भी कि लोगों के बीच किसी भी तरह का भेदभाव न पलने पाए। हमने उन चेहरों को भी बेनकाब किया जो हालात को खराब करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। छह साल तक अखबार निकालते रहने के बाद सम्पत्ति के नाम पर हमारे पास सिर्फ हमारे पाठकों का विश्वास ही है। हम अपनी इस सम्पत्ति को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहते हैं। हमें यकीन है कि हम उसे कभी खोने भी नहीं देंगे। छह साल के सफर ने हमें थकन नहीं बल्कि और आगे चलते रहने की ताकत दी है। अपनी इसी ताकत के साथ हम आगे भी आपको वही परोसेंगे जो सच होगा, सिर्फ सच।

इन सात सालों में हमने बहुत उतार चढ़ाव देखे मगर इस समूह की कामयाबी इसी में है की तमाम दुस्वारियों के बावजूद हम पर कभी हल्की सहाफत का इल्जाम नहीं लगा। हमारे ऊपर साम्प्रदायिकता का आरोप नहीं लगा और हमारी पहचान कभी किसी सियासी पार्टी से नहीं जोड़ी गयी। हमारे साथियों को तनख्वाहें कभी नहीं रुकीं और हमारे पाठक हमेशा हमारा उत्साह बढ़ाते रहे। अवधनामा महज एक अखबार का नाम नहीं है जो उर्दू के बाद हिंदी में भी अपनी पहचान बनाये हुए है बल्कि ये एक टीम वर्क की जीती जगती मिसाल है। हमारी खबरे ही हमारी सांसे हैं और हमारी सहाफत ही हमारी धड़कन। दुआ कीजिये की ये काम बदस्तूर जारी रहे।

आमीन।       

लेखक उत्कर्ष सिन्हा अवाधनमा के संपादक है. शबाहत हुसैन विजेता समाचार संपादक हैं.

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