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आधे-अधूरे आश्वासन को नीतीश ने नहीं किया स्वीकार!

भाजपा और जदयू का 17 साल पुराना राजनीतिक गठबंधन आज औपचारिक रूप से टूटने जा रहा है। हालांकि, कल देर रात तक ये कोशिशें जारी रहीं कि ‘बीच-बचाव’ का कोई फॉर्मूला निकल आए। इसके लिए कई प्रयास आखिरी दम तक किए गए। जदयू सुप्रीमो शरद यादव का रुख नरम करने के लिए वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी बात करने की पहल की। नरेंद्र मोदी के मुद्दे पर जदयू नेतृत्व को कुछ आश्वासनों के संदेश भी भिजवाए गए। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने यह भरोसा दिया कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का फैसला एनडीए के सभी दलों की सहमति के बाद होगा। लेकिन, नीतीश कुमार, भाजपा की तरफ से भेजे गए इन आधे-अधूरे आश्वासनों को अपने गले के नीचे उतारने को तैयार नहीं हुए। उन्होंने संदेश भिजवा दिया कि वे मोदी के मामले में दो टूक फैसला चाहते हैं। गोलमोल बातों पर वे अब विश्वास करने को तैयार नहीं हैं।

भाजपा और जदयू का 17 साल पुराना राजनीतिक गठबंधन आज औपचारिक रूप से टूटने जा रहा है। हालांकि, कल देर रात तक ये कोशिशें जारी रहीं कि ‘बीच-बचाव’ का कोई फॉर्मूला निकल आए। इसके लिए कई प्रयास आखिरी दम तक किए गए। जदयू सुप्रीमो शरद यादव का रुख नरम करने के लिए वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी बात करने की पहल की। नरेंद्र मोदी के मुद्दे पर जदयू नेतृत्व को कुछ आश्वासनों के संदेश भी भिजवाए गए। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने यह भरोसा दिया कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का फैसला एनडीए के सभी दलों की सहमति के बाद होगा। लेकिन, नीतीश कुमार, भाजपा की तरफ से भेजे गए इन आधे-अधूरे आश्वासनों को अपने गले के नीचे उतारने को तैयार नहीं हुए। उन्होंने संदेश भिजवा दिया कि वे मोदी के मामले में दो टूक फैसला चाहते हैं। गोलमोल बातों पर वे अब विश्वास करने को तैयार नहीं हैं।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके खास सिपहसालारों ने दो दिन पहले ही गठबंधन तोड़ने का मन बना लिया था। लेकिन, शरद यादव की कोशिश थी कि भाजपा नेतृत्व को मोदी के मामले में पुनर्विचार करने के लिए कुछ और समय दे दिया जाए। शायद, इसी वजह से फैसला टाला गया था। आज सुबह 11 बजे से पटना में जदयू विधायकों की बैठक बुलाई गई है। इसी में गठबंधन के बारे में औपचारिक फैसला किया जाएगा। जदयू के महासचिव शिवानंद तिवारी ने साफ-साफ कह दिया है कि अब भाजपा से रिश्ता तोड़ने का ही विकल्प बचा है। क्योंकि, मोदी के मुद्दे पर भाजपा नेतृत्व ने उनकी पार्टी का विश्वास तोड़ दिया है। ऐसे में, भाजपा नेताओं के कोरे आश्वासनों पर भरोसा करना अक्लमंदी भी नहीं है।

तिवारी का मानना है कि वैसे ही पार्टी को गठबंधन के बारे में फैसला लेने में काफी देरी हो गई है। अच्छा तो यही होता कि 2010 में ही पार्टी, भाजपा से रिश्ता तोड़ लेती। क्योंकि, इसी दौर से साफ हो गया था कि भाजपा, वोटों के ध्रुवीकरण के लिए फिर से सांप्रदायिकता का कार्ड चलाना चाहती है। इसी दौर से पार्टी में ‘मोदी राग’ अलापा जाने लगा था। हम लोगों ने कई बार भाजपा नेतृत्व को इस बारे में अगाह भी किया। लेकिन, हमारी बात नहीं सुनी गई। गोवा कार्यकारिणी की बैठक में दंगाई छवि वाले अपने नेता को इन लोगों ने चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाकर साफ-साफ बता दिया है कि उनकी मंशा क्या है? इसके बाद भी हम लोग चुप रहेंगे, तो सवाल हम पर ही उठेंगे।

जदयू सूत्रों के अनुसार, मोदी के मुद्दे पर शरद यादव और नीतीश कुमार के बीच कल दो दौरों में लंबी बातचीत हो चुकी है। शरद यादव का सुझाव था कि गठबंधन के बारे में फैसला दो-तीन महीने बाद लिया जाए। यानी, संसद के मानसून सत्र तक भाजपा के रवैए का इंतजार कर लिया जाए। शरद ने इसके लिए कई तर्क भी रखे थे। यह भी कहा कि अभी गठबंधन टूटने से यूपीए सरकार को राजनीतिक राहत मिल जाएगी। इसका असर मानसून सत्र में भी दिखाई पड़ सकता है। जबकि, जरूरी है कि पार्टी का रुख महंगाई जैसे मुद्दों पर ‘सच्चे योद्धा’ का दिखाई पड़े। सूत्रों के अनुसार, नीतीश लॉबी के तर्क यही रहे कि फैसले में देरी की गई, तो मुस्लिम वोट बैंक में नकारात्मक राजनीतिक संदेश चला जाएगा। वैसे भी राजद सुप्रीमो लालू यादव प्रदेश के अल्पसंख्यकों को सरकार के विरुद्ध भड़काने में लगे हैं। इसका परिणाम खासतौर पर महाराजगंज उपचुनाव मेें दिखाई पड़ा है। उल्लेखनीय है कि लोकसभा के इस उपचुनाव में जदयू का उम्मीदवार राजद के प्रभुनाथ सिंह से करारी मात खा चुका है। पिछले दिनों हुए चुनाव में यहां से राजद उम्मीदवार एक लाख से ज्यादा वोटों से जीता है। इस चुनाव परिणाम से जदयू नेतृत्व में खासी बेचैनी चली आ रही है।

महाराजगंज उपचुनाव से सबक लेकर नीतीश लॉबी अब भाजपा को कोई रियायत देने को तैयार नहीं हुई। पिछले रविवार को ही जदयू कोर   ग्रुप की बैठक में सैद्धांतिक तौर पर भाजपा से रिश्ता तोड़ने की बात तय हो गई थी। इस बैठक में शरद यादव शामिल नहीं थे। जब उन्हें इस आशय की जानकारी दिल्ली में दी गई, तो उन्होंने यही सलाह दी कि इस मामले का फैसला इतनी जल्दबाजी में नहीं लिया जाना चाहिए। इसी के बाद तय किया गया कि शनिवार और रविवार को पटना में बैठक बुलाकर, मुकम्मल रणनीति तैयार की जाए। इसी के बाद गठबंधन पर औपचारिक ऐलान हो। मुख्यमंत्री नीतीश के तेवर देखकर जदयू में कोई वरिष्ठ नेता नरमी का रुख अपनाने के लिए तैयार नहीं दिखा। यहां तक कि कई विधायकों ने शरद यादव के नरम रुख के प्रति अपनी नाराजगी भी दर्ज करा दी।

पटना में पिछले दो दिनों से राजनीतिक हलचल तेज है। इसके चलते सरकार का कामकाज भी लगभग ठप है। भाजपा कोटे के मंत्रियों ने गुरुवार से ही मंत्रालयों में जाना बंद कर दिया है। यहां तक कि उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने अपने मंत्रालय की कुछ जरूरी फाइलों में भी कल हस्ताक्षर नहीं किए। उन्होंने मंत्रालय के आलाधिकारियों को संदेश भिजवा दिया कि उनके पास अब कोई फाइलें न भेजी जाएं। कई और मंत्रियों ने भी अपना सरकारी कामकाज बंद कर दिया है। भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सीपी ठाकुर ने यहां तक कह दिया है कि एक-दो दिन के अंदर ही भाजपा कोटे के मंत्री सरकार से इस्तीफा दे देंगे। क्योंकि, अब दोनों दलों के बीच राजनीतिक तौर पर अविश्वास की खाई बहुत गहरी हो गई है। भाजपा के कार्यकर्ता भी नहीं चाहते कि सत्ता के लिए पार्टी का आत्म-सम्मान दांव पर लगा दिया जाए।

राजद सुप्रीमो लालू यादव, जदयू और भाजपा की ताजा रार से खासे गदगद हैं। उन्होंने कह दिया है कि दोनों दलों के बीच हुई फूट में उनका रोल कतई नहीं है। लेकिन, वे इतना जरूर कहेंगे कि नीतीश कुमार, प्रदेश के मुसलमानों को झांसा देने के लिए यह राजनीतिक नाटक कर रहे हैं। वे इस बात का जवाब क्यों नहीं देते कि  गुजरात के दंगों के दौर में वे रेलमंत्री की कुर्सी पर क्यों जमे रहे थे? उस दौर में दंगाई मोदी के बारे में उन्होंने खिलाफत के दो शब्द तक नहीं बोले थे। जबकि, आज धर्म-निरपेक्षता का नाटक कर रहे हैं। जदयू के नेता कान खोलकर सुन लें कि पाखंड की राजनीति बिहार की जनता कभी बर्दाश्त नहीं करती। वह अगले चुनाव में अवसरवादी नेताओं की जमकर धुलाई करने वाली है।

शरद यादव ने भी स्वीकार कर लिया है कि मोदी के मुद्दे पर स्थिति गंभीर हो गई है। लेकिन, अंतिम फैसला पार्टी विधायकों की आम सहमति से ही लिया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी ने यूपीए के साथ गठजोड़ करने की कोई रणनीति नहीं बनाई है। इस आशय की खबरों में कोई दम नहीं है। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी मोदी को ‘न्यौते’ के संदर्भ में यही कहा है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता ही इस बारे में उचित समय पर कोई फैसला  लेंगे। फिलहाल, वे कोई टिप्पणी करने की स्थिति में नहीं हैं। मोदी के मुद्दे पर राहुल ने इतना ही कहा कि यह भाजपा का अंदरूनी मामला है। इस पर वे अपनी कोई राय नहीं देना चाहते। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव वी के हरप्रसाद ने कह दिया है कि नरेंद्र मोदी, हमारी पार्टी के लिए कोई चुनौती नहीं हैं। सच्चाई तो यह है कि वे देश और भाजपा के लिए जरूर चुनौती बनते जा रहे हैं। लेकिन, देश की जनता मोदी जैसे नेताओं को अच्छी तरह से सबक सिखाना जानती है।
नीतीश कुमार ने अंग्रेजी के एक बड़े अखबार को इंटरव्यू देकर यह ‘शर्त’ रख दी कि गठबंधन केवल एक सूरत में बच सकता है। इसके लिए जरूरी है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सार्वजनिक रूप से ऐलान कर दे कि किसी भी स्थिति में विवादित नेता (नरेंद्र मोदी) को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार नहीं बनाया जाएगा। यह ऐलान भी तुरंत हो। इससे कम पर बात नहीं बनने वाली। बताया जा रहा है कि इस इंटरव्यू से दोनों दलों के बीच टकराव और बढ़ गया है। सी पी ठाकुर ने यहां तक कह दिया कि जदयू के किसी नेता के इशारे पर उनकी पार्टी कोई फैसला नहीं ले सकती। जदयू 17 साल पुराना गठबंधन तोड़ती है, तो बिहार की जनता इसका हिसाब जरूर लेगी। क्योंकि, राज्य के मतदाताओं ने केवल जदयू को जनादेश नहीं दिया था। सत्ता का जनादेश दोनों दलों के गठबंधन को मिला था। भाजपा के नेताओं ने कहना शुरू किया है कि नीतीश में हिम्मत हो, तो वे भाजपा का गठबंधन तोड़ने के साथ ही नए चुनाव कराने का फैसला करें। तब उन्हें अपनी राजनीतिक हैसियत का अंदाजा लग जाएगा। इस तरह की तल्खी से दोनों दलों के बीच गरमा-गरमी काफी बढ़ चली है।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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