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सुख-दुख...

…सारे दुखिया जमना (हिंडन) पार.. : अथश्री जनसत्ता अपार्टमेंट कथा

Shambhunath Shukla : जहां का आजकल मैं साकिन हूं यानी मौज़ा वसुंधरा डाकखाना वसुंधरा, जिल्ला गाजियाबाद में हिंदी के सारे नामी गिरामी पत्रकार, चिंतक, साहित्यकार और प्रचंड बौद्धिक लोग रहते हैं। वहां रहना जिमि दशनन मा जीभ बिचारी की तरह है। इनमें करीब-करीब सभी बड़े फेसबुक पर भी सक्रिय हैं। आपने किसी एक की पोस्ट को लाइक किया नहीं कि दूसरा नाराज हो जाएगा। इसलिए इनकी पोस्ट को पढि़ए और चुपचाप खिसक लीजिए। इन सारे बड़े लोगों में कई पत्रकारिता के क्षेत्र में, पद में और गुरुता में मुझसे कई गुना ज्यादा गुरुतर ही नहीं श्रेष्ठ भी हैं। ऐसे मौजे में रहने से जहां एक तरफ काफी कुछ सीखने को मिलता है वहीं दूसरी तरफ हरदम आप एक आतंक के साये में रहते हैं और यह आतंक है बौद्धिक आतंकवाद!

Shambhunath Shukla : जहां का आजकल मैं साकिन हूं यानी मौज़ा वसुंधरा डाकखाना वसुंधरा, जिल्ला गाजियाबाद में हिंदी के सारे नामी गिरामी पत्रकार, चिंतक, साहित्यकार और प्रचंड बौद्धिक लोग रहते हैं। वहां रहना जिमि दशनन मा जीभ बिचारी की तरह है। इनमें करीब-करीब सभी बड़े फेसबुक पर भी सक्रिय हैं। आपने किसी एक की पोस्ट को लाइक किया नहीं कि दूसरा नाराज हो जाएगा। इसलिए इनकी पोस्ट को पढि़ए और चुपचाप खिसक लीजिए। इन सारे बड़े लोगों में कई पत्रकारिता के क्षेत्र में, पद में और गुरुता में मुझसे कई गुना ज्यादा गुरुतर ही नहीं श्रेष्ठ भी हैं। ऐसे मौजे में रहने से जहां एक तरफ काफी कुछ सीखने को मिलता है वहीं दूसरी तरफ हरदम आप एक आतंक के साये में रहते हैं और यह आतंक है बौद्धिक आतंकवाद!

Ambrish Kumar iska jimmedar koun hai
 
Arvind Kumar Shukla badi muskil hai sir..fir bhi.. hindi sahitya ko बौद्धिक आतंकवाद! shabd dene ke liye dhanyavad.
 
Shambhunath Shukla माफ कीजिएगा, कुछ लोगों ने मेरी इस पोस्ट पर मुझे फोन किया है और धमकाया है कि अकेले वसुंधरा ही नहीं वैशाली , इंदिरापुरम और कौशांबी का नाम भी इसमें जोडि़ए। साथ में यह भी कि यह क्षेत्र सिर्फ पत्रकारों का ही नहीं कविगणों और कथाकारों का भी है। मैं इसके लिए माफी चाहता हूं और इस क्षेत्र का विस्तार कर रहा हूं ठीक तपन राय भारती की तरह। इसे आप लोग वैशाली, वसुंधरा, इंदिरापुरम ही न समझें बल्कि पूरा का पूरा ट्रांस हिंडन और ट्रांस जमना इलाका समझिए। नानक दुखिया सब संसार सारे दुखिया जमना (हिंडन) पार।
 
Mohd Haris होने दो नाराज़ आख़िर इन्सान जो है जो खुद ख़ुश न रहना चाहे को कोई भी ख़ुश नही रख सकता– ख़ुश करना है किसी को तो कोई पालतु जानवर पाल लो सर जी
 
Samit Mathur padosihain ?

Shambhunath Shukla Ambrish Kumar: यहां सारे पूर्व जनसत्ताइयों को लाकर बसाने के जिम्मेदार तो आप ही हैं अंबरीष जी। जनसत्ता अपार्टमेंट आपने बसाया और इसके बाद इस पूरे क्षेत्र में पत्रकार ही पत्रकार भर गए। यहां तक कि छोले भठूरे की दूकान चलाने वाले से लेकर प्रापर्टी डीलर भी अपने यहां पत्रकारों को विशेष सुविधा का बोर्ड लगाए हैं। रिक्शे वाले भी जनसत्ता अपार्टमेंट का नाम सुनकर कुछ सेवा फ्री कर देते हैं। हमारे एक मित्र जो वैशाली मेट्रो उतरे और वहां से जनसत्ता अपार्टमेंट का आटो किया तो उसने 50 की बजाय 40 रुपये लिए और कहा कि पत्रकार वहां पहुंचकर इतना भी दे दें तो समझो बहुत मिल गया।
 
Ambrish Kumar हमने हिंदी अंग्रेजी कई संपादकों के साथ काम किया जिनमे प्रभाष जी ने तो कई पत्रकारों को बनाया .एक संपादक ने पत्रकार तो नहीं बनाया पर भक्त बहुत बनाए .एक संपादक को इन दोनों में कोई रूचि नहीं रही.
 
Nitin Thakur मैं कई बार सोचा करता हूं कि वो 'फेसबुक सेलिब्रिटीज़' जिनके एक स्टेटस पर मिनट में 50 लाइक्स आते हैं क्या वो एक-एक लाइक का हिसाब रख भी पाते होंगे? फेसबुक पर लाइक ना करना जिनके लिए नाराज़गी का सबब हो जाए वो राह चलते नमस्ते ना करने पर,किसी के घर गए तो चाय ना पूछने पर,नाम के पीछे सर ना लगाने पर किस कदर कुपित हो जाते होंगे!!
 
Ambrish Kumar शम्भू जी एक जानकारी दे दूँ जब इसे बनवा रहा था तो गाजियाबाद के एसएसपी का फोन आया और कहा -आप क्यों यहाँ एपार्टमेंट बनवाने पर आमादा है इस जगह को हमने बदमाशो को मुठभेड में मारने के लिए छोड़ रखा है . श्री प्रकाश शुक्ल को यही पास में मारा गया था और मै उसी समय वहां से गुजर रहा था .अब इस पुण्यस्थली का महत्व समझ में आता है .

Alok Kumar खुद हालत पर प्रहसन का रोचक प्रसंग है। शंभूनाथ जी ने अम्बरीश जी को यही आकर बसने का आग्रह क्यों डिलीट कर दिया। खौफ और ऐसा खौफ Shambhunath Shukla : ab aap bhi yahi.n aakar base.n
 
Sanjaya Kumar Singh आपने बौद्धिक आतंकवाद की बात की और अंबरीष जी ने यमुना व हिंडन के बीच की इस जगह पर पुलिसिया आतंकवाद की कहानी सुनाई। वाकई हमलोग जहां रह रहे हैं वह साधारण नहीं है।

Shambhunath Shukla Ambrish Kumar: जनसत्ता के लोगों को बसेरा दिलाने के लिए जो पहल शुरू की गई थी उसकी सात सदस्यों की अस्थायी समिति का एक सदस्य यह नाचीज भी था। आधा जनसत्ता अपार्टमेंट बनने के बाद यहां जिस तरह वाद विवाद प्रतियोगिता शुरू हुई थी और जनसत्ता के लोगों के बीच राज्य सीमा विवाद शुरू हुआ था, उससे मुझे लगा था कि पत्रकारों किसी सोसाइटी में रहने से अच्छा है कि कनावनी मौजा में कुछ जमीन लेकर एक झोपड़ी बनवा ली जाए इसलिए मैने स्वेच्छा से त्यागपत्र दे दिया था। पर वह आप थे कि आपने मेरा एक फ्लैट यहां रहने दिया। पर आप खुद इस सीमा विवाद से घबड़ाकर चले गए।
 
Sanjaya Kumar Singh मैंने भी छोड़ दिया था और वहां फ्लैट लिया होता तो आधे पैसे में हो जाता। अभी तक यह सोच कर संतोष कर लेता था कि वैशाली में हूं दिल्ली से करीब पर आपने तो हिन्डन और यमुना के बीच की पूरी जगह को एक कर दिया।
 
Sanjay Singh Sir ji e bahut khatarnak aatankwad hota h,suna hu iski chapet me jo aa jata h unka dimagi santulan asantulit ho jata h,isliye sir ji khisak lijiye aisi jagah se,dimag rhega to kahi b likh k gujara ho sakta h…
 
Shambhunath Shukla मैने लिखा था कि फिलहाल जहां मैं रह रहा हूं यानी मेरा स्थायी निवास तो यह है नहीं इसलिए मुझे तो इसकी खास चिंता नहीं करनी अलबत्ता अगर आप परेशानी में हों तो तलाश लें।
 
Anurag Bhaskar बौद्धिक आतंकवाद! haha…
 
Sanjay Singh Sir ji aisi jagah pe aasthayi(temporary) roop se b mat rha kijiye,bheje ki bhajiya ban jati h aisi jagaho pe..
 
Sanjaya Kumar Singh संजय सिंह जी गुलाब की जगह अपना गुलाब सा चेहरा चस्पा करें तो आपसे चर्चा करने में कुछ मजा आए।
 
Ambrish Kumar वैसे प्रभाष जोशी की टीम का हिस्सा रहे पत्रकार किसी बौद्धिक आतंकवाद की कभी परवाह करते नहीं है दूसरे नही मिलते तो खुद से ही लड़ने भिड़ने लगते है .
 
Sanjaya Kumar Singh पंगा किसने लिया। इसी से साफ है।
 
Ambrish Kumar और पत्रकारों से जयादा विवाद साहित्कार वाले पत्रकारों में होता है ,.पर शम्भू जी इसे विस्तार देकर लिखे तो यह एक रोचक कहानी क्या उपन्यास भी बन जाएगा .एक कामरेड किस्म के पत्रकार साथी ने ऊपर की मंजिल पर रहने वाले कामरेड कवि पत्रकार के लिए गजब की टिपण्णी की .यहाँ देना ठीक नहीं है
 
Sanjaya Kumar Singh मेल बॉक्स में बता दीजिए।
 
Sanjay Singh Sanjaya kumar singh ji aas rakhiye,nirash nhi honge…
 
Sanjaya Kumar Singh टेलीग्राम बंद हो रहा है, दो मिनट में मैगी नूडल्स और इंटरनेट के जमाने में आस का क्या है। कौन जाने कब ना रहे।
 
Sukhdev Bhardwaj Babu gi sab aapko dhamkate hai es bat par vishvas karna to bhaut he mushkil hai
 
Uma Singh ok
 
Rajendra Katiyar it is good living in atank.
 
Rai Krishnadev …मैने आपको लाइक किया, अब देखता हूं गाजियाबादको कौन साहित्यकार या फिर पत्रकार मुझसे नाराज होता है। वैसे नाराज होकर भी करेगा क्या, मै तो वाराणसीमें रहता हं। कोई गाली देने वाराणसी तो आयेगा नहीं। फेसबुक पर गाली सुननेकी आददसी हो गयी है। सो कोई बात नहीं। अब आप मौसम हाल लिखोगे तो भी मै लाइक करूंगा, देखता हूं कौन रोक लेता है।
 
Manoj Misra wah! ye hui na kuchh bat
 
Kr Ashok S Rajput हरदम आप एक आतंक के साये में रहते हैं और यह आतंक है बौद्धिक आतंकवाद…
 
Ankur Agarwal सवाल । गंभीर और प्रासंगिक है ।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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