राजीव शुक्ला ने 200 में राजनीति में धमाकेदार प्रवेश किया और उत्तर प्रदेश से राज्यसभा चुनाव में उन्हें उनकी पार्टी के विधायकों की संख्या से दुगने वोट मिले. उनकी पार्टी लोकतांत्रिक कांग्रेस पार्टी के पास 20 विधायक थे और 7 निर्दलियों का भी उन्हें समर्थन मिला था. 11 राज्यसभा सीटों के लिए 15 उम्मीदवार थे और राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना था कि वे अंतिम नंबर पर आएंगे, लेकिन वे सभी विश्लेषण झुठलाते हुए 51 वोटों के साथ सबसे आगे रहे। इसमें बीजेपी में हुई क्रॉस वोटिंग और शुक्ला के छोटी पार्टियों में मधुर संबंथों ने महती भूमिका निभाई.
दैनिक जागरण के लखनऊ ब्यूरो चीफ होने के नाते उन्होंने लंबे समय तक चुनाव की रिपोर्टिंग की. शुक्ला ने कहा कि मैं हमेशा मानता था कि पत्रकार की आड़ में राजनीति करने से बेहतर है कि सीधे सीधे राजनीति में ही कूदा जाए. शुक्ला 1983 में पूर्व में प्रकाशित होने वाली पत्रिका रविवार के रिपोर्टर की हैसियत से दिल्ली आए. उन्होंने तत्कालीन वित्त मंत्री वीपी सिंह के बारे में एक स्टोरी ब्रेक की थी कि कैसे वे अपने चमचों को लैंड सीलिंग एक्ट का उल्लंघन करते हुए जमीन बांट रहे हैं. इसके बाद उन्होंने संडे पत्रिका और संडे ऑब्जर्वर में काम किया. शुक्ला ने बताया कि उस समय उनके पास पीएमओ बीट थी औऱ रिपोर्टर प्रधानमंत्री के साथ घरेलू दौरों में भी साथ में जाते थे. इस तरह उनकी राजीव गांधी से नजदीकियां बढ़ गईं। 2002 में शुक्ला एनडीए छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए. शुक्ला ने कहा कि उस समय किसी को भी अंदेशा नहीं था कि कंग्रेस सत्ता में लौट कर आएगी, लेकिन राजीव गांधी से बेहतर संबंधों के आधार पर मैंने उस मुश्किल समय में कांग्रेस में शामिल होना ठीक समझा.
…समाप्त…
(ईटी में छपी स्टोरी का भावार्थ)
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