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चैनल ने किया कमाल, रिपोर्टर से पूछा मृतक का हाल!

दूसरे तो क्या, खुद टीवी में काम करने वाले पत्रकार मानते हैं कि टेलिविज़न सिर्फ पत्रकारिता नहीं है. लेकिन वो शून्य के स्तर को पार कर कितनी नीचे जा सकती है एक टीवी न्यूज़ चैनल पे चली खबर इसका प्रमाण है. ये कारनामा अंजाम दिया कोकाकोला के पंजाब फ्रेंचाइज़ी कंधारी के चैनल डेएंडनाईट ने. बुधवार की दोपहर तकरीबन साढ़े तीन बजे. बुलेटिन पंजाबी में था और खबर चंडीगढ़ में एक अस्पताल के कल से लापता मालिक की आज लाश मिलने की. लाश चंडीगढ़ से दूर एक गाँव के पास मिलने की बात बताई गयी.

दूसरे तो क्या, खुद टीवी में काम करने वाले पत्रकार मानते हैं कि टेलिविज़न सिर्फ पत्रकारिता नहीं है. लेकिन वो शून्य के स्तर को पार कर कितनी नीचे जा सकती है एक टीवी न्यूज़ चैनल पे चली खबर इसका प्रमाण है. ये कारनामा अंजाम दिया कोकाकोला के पंजाब फ्रेंचाइज़ी कंधारी के चैनल डेएंडनाईट ने. बुधवार की दोपहर तकरीबन साढ़े तीन बजे. बुलेटिन पंजाबी में था और खबर चंडीगढ़ में एक अस्पताल के कल से लापता मालिक की आज लाश मिलने की. लाश चंडीगढ़ से दूर एक गाँव के पास मिलने की बात बताई गयी.

उस पे फ़ोनों देने वाला रिपोर्टर दोनों में से किसी जगह नहीं था. न उसने लाश ही देखी. वो खुद कह रहा था कि लाश नीली हो जाने की बात उसे बताई गई है. उसके दिए पूरे विवरण से कहीं दूर दूर तक भी नहीं लग रहा था कि उसकी इस घटना के बारे में किसी पुलिस अधिकारी से भी कोई बात हुई है. उसने अपने पूरे फ़ोनों में किसी अधिकारी को 'कोट' नहीं किया. खैर फिर भी उस के साथ फ़ोनों क्यों किया गया और करना ही था तो उसको पहले से बता के क्यों नहीं रखा गया ये उनकी अपनी अंदरूनी समस्या है. लेकिन इस नाटकीय पत्रकारिता की असली नायिका वो आउटपुट या प्रोग्रामिंग टीम है जो एंकर के चेहरे के पीछे छुपी होती है.

आइये बताते हैं कि हमेशा इयरफोन के ज़रिये एंकर से जुडी डे&नाईट की टीम ने क्या गुल खिलाया. उसने एंकर के द्वारा रिपोर्टर पवन से वो सवाल तो पुछ्वाये ही जिन के जवाबों के लिए वो तैयार नहीं था. अपने आप में बोलते हुए कोई शाट भी नहीं थे चैनल के पास. फिर भी रिपोर्टर ने जैसे तैसे बता दिया कि ऑक्सफोर्ड हास्पिटल का मालिक दीपक कल से गायब था. आज एक गाँव के पास उसकी लाश मिली. उस से पूछा गया कि पुलिस कारवाई क्या कर रही है?

अब किसी पुलिस वाले से कोई बात की होती तो कुछ बताता वो. ऐसे में उसने वही किया जो ऐसी अवस्था में डाल दिया गया कोई भी रिपोर्टर करता है. प्रिंट पत्रकारिता की परिभाषा में इसे टेबल स्टोरी कहते हैं. उस में से डेटलाइन आप हटा दें तो उसे सम्पादकीय के रूप में भी छापा जा सकता है. मगर टीवी मीडिया में उसे भाषण कहते हैं. उस ने वही देना शुरू किया. उसने सलाह देनी शुरू कर दी. बोला कि लाश नीली है तो पुलिस को ज़हर देकर मारने की थ्योरी पर काम करना होगा. उस से पूछा गया कि क्या दीपक की किसी से कोई दुश्मनी थी. रिपोर्टर बोला उसके स्टाफ से उसके सम्बन्ध बहुत अच्छे थे.

यहाँ तक भी चलो कुछ गनीमत थी. लाश नीली होने से चिंतित एंकर ने रिपोर्टर से पूछा कि (दीपक नहीं) मृतक की ये हालत किस ने की? इस पर सोने पे सुहागा ये कि एंकर ने अंत में धन्यवाद अपने रिपोर्टर का ही नहीं, मृतक दीपक का भी किया. कहा- ये थे हमारे रिपोर्टर दीपक…फिर हल्का सा पाज़…फिर एकदम दिमाग में आया कि नाम तो इस सवाल जवाब में पवन का भी आया था…तो पूरा बोला…ये थे हमारे रिपोर्टर दीपक पवन.

बता दें कि आम तौर पर साढ़े तीन के आसपास वाला कोई भी बुलेटिन कभी लाइव नहीं होता. ये भी नहीं था. ये सारी गलतियां चैनल में तब भी गईं कि जब वो प्री-रिकार्डेड था और इन गलतियों को सुधारने का मौका भी. खबर फिर भी ऐसे ही चली तो मान ही लेना पड़ेगा कि इस सब को गलती माना ही नहीं गया होगा. मगर फिर भी दर्शक, खासकर टीवी में काम करने वाले लोग ये चैनल ज़रूर देखा करें. ये दुनिया का पहला और अकेला ऐसा न्यूज़ चैनल है जिसमें खबर से सम्बंधित व्यक्ति की बाईट नहीं, बल्कि उसका भाषण चलता है. खबर एंकर रीड के साथ शुरू होती और अगले एंकर रीड के साथ ख़त्म हो जाती है. बीच में स्क्रिप्ट या वायस ओवर जैसा कुछ नहीं होता. और फीचर वगैरह में तो ये भी है कि इंट्रो से लेकर साइन आफ तक लगातार एक ही आवाज़ सुनाई देती रहती है. एक ही टोन में. वहां स्क्रिप्ट होती है. पढ़ कर बोली जाती है. लेकिन फिर भी अक्सर अटक अटक कर. ये चैनल टीवी पत्रकारों का ज्ञानवर्धन न भी कर सके तो भी देखें. कम से कम तनाव के कुछ पलों में थकान मिटाने के काम तो आएगा!

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