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यूपी में अपने ही डूबाएंगे भाजपा की नैया

उत्तर प्रदेश की चुनावी जंग में जब सभी राजनैतिक दलों ने तमाम अस्‍त्र-शस्‍त्रों से लैस अपने योद्धा रणभूमि में उतार दिए और सूबे की नंबर तीन पार्टी भाजपा ने दिसंबर के दूसरे हफ्ते तक अपने प्रत्याशी घोषित नहीं किये तो राजनैतिक हलकों में ये कयास लगाये जा रहे थे कि भोजन-बैठक और विश्राम वाली ये पार्टी 2012 के विधानसभा चुनावों को लेकर काफी हद तक गंभीर है, और प्रत्याशियों के चयन में खासी मशक्कत कर ऐसे प्रत्याशियों को मैदान में उतारने जा रही है जो केसरिया पताका को विधानसभा क्षेत्रों में मजबूती से लहरा सकेंगे, लेकिन 13 दिसंबर 2011 को 143 प्रत्याशियों की जो सूची जारी की गई है, उस पर भाजपा कार्यकर्ताओं एवं नेताओं समेत विरोधी दल के नेता तक भौचक्के हैं.

उत्तर प्रदेश की चुनावी जंग में जब सभी राजनैतिक दलों ने तमाम अस्‍त्र-शस्‍त्रों से लैस अपने योद्धा रणभूमि में उतार दिए और सूबे की नंबर तीन पार्टी भाजपा ने दिसंबर के दूसरे हफ्ते तक अपने प्रत्याशी घोषित नहीं किये तो राजनैतिक हलकों में ये कयास लगाये जा रहे थे कि भोजन-बैठक और विश्राम वाली ये पार्टी 2012 के विधानसभा चुनावों को लेकर काफी हद तक गंभीर है, और प्रत्याशियों के चयन में खासी मशक्कत कर ऐसे प्रत्याशियों को मैदान में उतारने जा रही है जो केसरिया पताका को विधानसभा क्षेत्रों में मजबूती से लहरा सकेंगे, लेकिन 13 दिसंबर 2011 को 143 प्रत्याशियों की जो सूची जारी की गई है, उस पर भाजपा कार्यकर्ताओं एवं नेताओं समेत विरोधी दल के नेता तक भौचक्के हैं.

भाजपा के अंदरुनी हालातों की चर्चा करने से पहले एक दृष्टि उन बयानों पर भी ड़ाल लेते हैं जो राजनैतिक दलों के प्रमुख नेताओं द्वारा भाजपा की सूची पर दिए गए. प्रदेश के मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी का कहना है कि भाजपा की सूची हमारे इस आरोप की पुष्टि करती है कि बसपा एवं भाजपा का गुप्त समझौता हो गया है और इसीलिए जानबूझ कर पार्टी ने लंगड़े घोड़ों पर दांव लगाया है. कांग्रेस मीडिया सेल के प्रभारी एवं बुंदेलखंड से विधायक विवेक सिंह का कहना है कि भाजपा के तमाम बड़े नेता अपने निहित स्वार्थों को लेकर खुले आम सपा और बसपा के लोगों से संपर्क में हैं और भाजपा के प्रत्याशियों की स्क्रीनिंग 7 विधान सभा मार्ग पर न होकर विक्रमादित्य मार्ग और काली दास मार्ग पर हो रही है.
 
अब बात भारतीय जनता पार्टी की, जो पार्टी विद डिफ़रेंस का दंभ भरते तथा वंशवाद एवं परिवारवाद की आलोचना करते नंही थकती, लेकिन मौका देख कर इसका अनुसरण करने में पीछे भी नहीं रहती. अकेले जनपद फर्रुखाबाद एवं कन्नौज की 7 विधानसभा सीटों की ४ विधान सभाओं में पार्टी नेताओं दयाराम शाक्य (पूर्व सांसद), चंद्रभूषण सिंह (पूर्व सांसद), रामप्रकाश त्रिपाठी (पूर्व मंत्री), ब्रह्म दत्त दुबे (पूर्व मंत्री के पुत्र अथवा भतीजा) के पुत्र-पुत्रियों को टिकट थमाए गए हैं. यह भी सनद रहे कि इनमें दयाराम शाक्य के पुत्र (एक बार विधायक रहे, उसके बाद लगातार लगातार चुनाव हारे) के अतिरिक्त कोई भी व्यक्ति कभी जनप्रतिनिधि नहीं रहा है.

छिबरामऊ विधान सभा में पिछली बार भाजपा तीसरे स्थान पर रही थी और अब उन्हीं पूर्व मंत्री क़ी पुत्री को चुनाव मैदान में उतारा गया है. कमोवेश यही स्थिति पूर्वांचल में है. कुशीनगर क़ी तमकुही राज सीट पर नंदकिशोर मिश्र एवं रुद्रपुर से जय प्रकाश निषाद, जो कि कई बार चुनाव हार चुके हैं, पर फिर से किस्मत आजमाई गई है. सिद्धार्थ नगर क़ी शोहरतगढ़ में पिछली बार चौथे स्थान पर रही साधना चौधरी और आजमगढ़ क़ी मेहनगर सीट से तीसरे स्थान पर रहे कल्पनाथ सोनकर को भी टिकट थमाया गया है. सबसे मज़ेदार स्थिति लखनऊ पूर्व और सिसवा विधानसभा में है, जहां क्रमशः सांसद कलराज मिश्र और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तथा एमएलसी रमापति राम त्रिपाठी को चुनाव लड़ाने के लिए वर्तमान विधायकों विद्यासागर गुप्ता और महंत दुबे क़ी टिकट काट दी गई है. वहीं दो पूर्व मंत्रियों सतीश महाना और हुकुम सिंह, जो 15व़ी लोकसभा का चुनाव खासे अंतर से हार गए थे, को भी विधायक का चुनाव लड़ाया जा रहा है.
 
संघ के शीर्ष प्रचारको क़ी राय को भी टिकट वितरण में अनसुना कर दिया गया है, जिससे प्रचारक भी नाराज़ बताये जा रहे हैं किन्तु एक अनुशासित संगठन होने के कारण कुछ भी पूछे जाने पर प्रान्त प्रचारक स्तर के प्रचारक झुंझलाहट में यह कह कर कन्नी काट रहे हैं कि भाजपा के कामों में संघ दखल नहीं देता. भाजपा के एक प्रदेश महामंत्री ने नाम न छापने कि शर्त पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में जिन लोगों को चुनाव लड़ाने की जिम्मेदारी दी गई है वे सिर्फ तमाशबीन हैं, उनके पास खोने को कुछ भी नहीं है. वे सभी वर्तमान में भी लाभ के पदों पर है और विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी लाभ के पदों पर बने रहेंगे और अगर भाजपा को केंद्र में सरकार बनाने का मौका मिला तो मंत्री भी बन जायेंगे, लेकिन असल दुर्गति कार्यकर्ताओं क़ी है, जो विधानसभा या लोकसभा चुनावों के लिए काम करता है. पांच-पांच साल इंतज़ार करता है और चुनाव का मौका आने पर टिकट या तो नेता पुत्र-पुत्रियों को पकड़ा दिया जाता है जिनका कोई जनाधार नहीं या उन्हीं नेताओं को जो लगातार चुनाव हार कर वरिष्ठ हो गये हैं.
 
कल्याण सिंह क़ी लोधी राजपूत बिरादरी को साधने के लिए शीर्ष नेतृत्व ने उमा भारती को चुनावी समर में उतारने क़ी योजना बनाई थी, किन्तु उत्तर प्रदेश के लाबिंग में मज़बूत अगड़े और पिछड़ी जातियों के नेताओं क़ी खतरनाक मंसूबा बंदी के आगे उमा भारती ने भी घुटने टेक दिए और स्वयं अपना नाम बुंदेलखंड क़ी बबीना विधानसभा से कटवा दिया. जहां एक तरफ सभी पार्टियां जिताऊ उम्मीदवार क़ी तलाश में दिन-रात एक किये हुए हैं, वहां भाजपा जैसी पार्टी में टिकट बंटवारे में ओब्लाइज़ करने क़ी रणनीति बनाई जा रही है. ऐसे में दगे हुए कारतूस कितना बड़ा विस्फोट कर पाएंगे यह तो कहना मुश्किल है, पर इतना तय है कि कार्यकर्ताओं का नैराश्य आगामी चुनावों में एक बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा.

लेखक क्रांति किशोर मिश्रा लखनऊ में टीवी पत्रकार हैं.

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