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सेलरी न मिलने से नाराज महुआ खबर वालों ने एचआर को घेरा

एक तरफ महुआ नया चैनल खोल रहा है, वहीं पुराने कर्मचारियों को समय पर महीने की सेलरी भी नहीं मिल पा रही है. जी हां, ऐसा ही हाल है बाबा पीके तिवारी के 'महुआ खबर' का. पिछले दो महीने से समय से सेलरी नहीं मिलने से टेंशन में दिन गुजार रहे हैं 'महुआ खबर' के लाचार और बेबस कर्मचारी. परेशान कर्मियों ने सेलरी को लेकर एचआर को घेरा. हो हल्‍ला हुआ पर एचआर ने अपनी मजबूरी बता दी, मामला खतम हो गया.

एक तरफ महुआ नया चैनल खोल रहा है, वहीं पुराने कर्मचारियों को समय पर महीने की सेलरी भी नहीं मिल पा रही है. जी हां, ऐसा ही हाल है बाबा पीके तिवारी के 'महुआ खबर' का. पिछले दो महीने से समय से सेलरी नहीं मिलने से टेंशन में दिन गुजार रहे हैं 'महुआ खबर' के लाचार और बेबस कर्मचारी. परेशान कर्मियों ने सेलरी को लेकर एचआर को घेरा. हो हल्‍ला हुआ पर एचआर ने अपनी मजबूरी बता दी, मामला खतम हो गया.

महुआ के बांग्ला न्यूज चैनल 'महुआ खबर' की स्थिति यह है कि अक्‍टूबर महीने की सेलरी 23 नवम्‍बर को मिली, जबकि नवम्‍बर की सेलरी का अब तक अता-पता नहीं है. ऐसे में महुआ खबर के कर्मचारियों में गहरी हताशा छा गई है. क्‍योंकि चैनल को बचाने के नाम पर कम सेलरी पर काम करने वाले सैकड़ों लोगों को बाहर किया गया वहीं चैनल को लूट कर मटियामेट करने वाले लुटेरों को बाबाजी बड़े शान से पाल रखे हैं, जिनकी सेलरी लाखों में है.

'महुआ खबर' के स्ट्रिंगरों ने खबर भेजना बंद कर दिया है. एनएनआई से फीड आनी बंद हो गई है. कैसेट लाने वाले राइडर के मोटरबाइक में तेल नहीं होती है और लुटेरे महुआ खबर की इज्‍जत और धन लूट रहे हैं. इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी कर्मचारियों से बात करने वाला कोई नहीं है. यहां तक की इनपुट और आउटपुट देखने वाला कोई नहीं है. सब भगवान भरोसे चल रहा है.

चैनल बचाने की कवायद में लगातार कम सेलरी वाले और मेहनत करने वाले लोगों को निकाला जा रहा है. ऐसे में लोगों को समझ में नहीं आ रहा कि लोग करें तो क्‍या करें? स्थिति यह है कि जिन लोगों ने अपने खून-पसीने से चैनल को खड़ा किया वे भी हाशिए पर कर दिए गए हैं, जबकि पूरे महुआ में नए लोगों को मुंह मांगा रकम दिया जा रहा है. लड़कियों के मामले में कुछ ज्‍यादा ही उदारता बरती जा रही है. लड़कियों की सेलरी उनकी सुंदरता के आधार पर तय की जा रही है.

पुराने लोग आज भी कुछ सेलरी बढ़ने की आशा में जी रहे हैं क्‍योंकि महुआ में पुराने लोगों को जो पैसा दिया जाता है, उससे इस महंगाई के दौर में परिवार चलाना मुश्किल है. चौबीस घंटे की खबरिया चैनलों की प्रतिस्‍पर्धा में टिकने के लिए ओबी वैन कितना महत्‍वपूर्ण है, इसके बावजूद ओबी तो छोडि़ए स्ट्रिंगरों को भी पैसे नहीं दिए जा रहे हैं. पिछले छह माह से स्ट्रिंगरों को पैसा नहीं दिया गया है. अगर दिया भी जाता है तो कुल बिल का 75 प्रतिशत काट लिया जा रहा है.

भड़ास के माध्‍यम से महुआ के कर्मचारी अपनी आवाज महुआ कर्ताधर्ताओं के साथ शिरोमणि पीके बाबा तक पहुंचाना चाहते हैं, क्‍योंकि इस तरह कुछ लोग तो करोड़पति हो रहे हैं लेकिन सैकड़ों लोग सड़क पर आने की स्थिति में हैं. अगर चैनल बंद ही करना है तो साफ क्‍यों नहीं बता दिया जा रहा है. लोगों के घूंट-घूंटकर जीने से तो बेहतर है कि लोग अभी से ही अपने दाने-पानी की तलाश में लग जाएं. बाबाजी अब तो आंख खोलिए बड़ी कृपा होगी.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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