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राहुल बनाम मोदी : अब तैयारी ‘फाइनल’ की

कांग्रेस नेतृत्व लंबे अरसे बाद इन दिनों कुछ राजनीतिक राहत महसूस कर रहा है। ऐसे में, उसने आक्रामक तैयारियों की रणनीति बना ली है। इसी के तहत संगठन और सरकार में कई बड़े बदलाव कर दिए गए हैं। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने एक बार फिर पार्टी के ‘युवराज’ राहुल गांधी की जमकर सराहना कर डाली है। इससे उन्होंने यह राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है कि ‘10 जनपथ’ और ‘7 आरसीआर’ के बीच कोई शीतयुद्ध नहीं चल रहा। प्रधानमंत्री खुद खुशी-खुशी से ‘सिंहासन’ खाली करने को तैयार बैठे हैं।

कांग्रेस नेतृत्व लंबे अरसे बाद इन दिनों कुछ राजनीतिक राहत महसूस कर रहा है। ऐसे में, उसने आक्रामक तैयारियों की रणनीति बना ली है। इसी के तहत संगठन और सरकार में कई बड़े बदलाव कर दिए गए हैं। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने एक बार फिर पार्टी के ‘युवराज’ राहुल गांधी की जमकर सराहना कर डाली है। इससे उन्होंने यह राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है कि ‘10 जनपथ’ और ‘7 आरसीआर’ के बीच कोई शीतयुद्ध नहीं चल रहा। प्रधानमंत्री खुद खुशी-खुशी से ‘सिंहासन’ खाली करने को तैयार बैठे हैं।

दूसरी तरफ, नरेंद्र मोदी ने गोवा के फैसले के बाद अपनी सक्रियता तेजी से बढ़ा दी है। अब वे सोनिया गांधी से ज्यादा राहुल गांधी पर निशाना साधने लगे हैं। इस तरह से वे संकेत दे रहे हैं कि 2014 के ‘फाइनल’ में उन्हें मुकाबला कांग्रेस के ‘युवराज’ से ही करना है। मुख्य विपक्षी दल, भाजपा नेतृत्व इस दौर में अपने अंदरूनी संघर्षों को सुलझाने में लग गया है। नरेंद्र मोदी के बहुचर्चित मुद्दे पर पार्टी में अंदर ही अंदर कई तरह का अंत:संघर्ष जारी है। पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी तो मुखर होकर मोदी के ‘प्रमोशन’ का विरोध कर चुके हैं। उन्होंने पार्टी पर दबाव बनाने के लिए इस्तीफे का कार्ड भी चला दिया था। लंबी मनुहार के बाद उन्होंने अपना इस्तीफा वापस ले लिया है। लेकिन, मोदी के मुद्दे पर आडवाणी आज भी सहज नहीं हो पाए। यहां तक कि आडवाणी के करीबी समझे जाने वाले कई भाजपा दिग्गज भी अंदर ही अंदर मोदी मुहिम की हवा निकालने के अभियान में जुट गए हैं। माना जा रहा है कि ये लोग उपयुक्त अवसर के इंतजार में बैठे हैं।

दरअसल, पिछले दिनों भाजपा की गोवा कार्यकारिणी की बैठक में मोदी को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाने का फैसला हुआ था। इस फैसले से पार्टी नेतृत्व ने यह संदेश साफ तौर पर दे दिया है कि 2014 के चुनाव में पार्टी का ‘चेहरा’ मोदी ही बनेंगे। यह अलग बात है कि औपचारिक रूप से पार्टी का स्टैंड यही है कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम संसदीय बोर्ड की बैठक में तय होगा। लेकिन, मोदी को बड़ी भूमिका में लाने की तैयारियां अब खुलकर सामने आ गई हैं। संघ नेतृत्व ने मोदी की अगुवाई के लिए पूरी ताकत लगा दी है।

मोदी के मुद्दे पर एनडीए में ही दरार पड़ गई है। भाजपा और जदयू का 17 साल पुराना गठबंधन इसी मुद्दे पर टूट गया है। जदयू के सुप्रीमो शरद यादव एनडीए के संयोजक पद की जिम्मेदारी लंबे समय से निभा रहे थे। समाजवादी रुझान के नेता शरद यादव कई सालों से कोशिश कर रहे थे कि एक बार फिर कांग्रेस के विरोध में राजनीतिक मोर्चाबंदी और मजबूत हो जाए। वे कई राजनीतिक क्षत्रपों को इस बात के लिए मनाते आए हैं कि एनडीए के नेतृत्व में लामबंदी करना ज्यादा व्यवहारिक रहेगा। वे कई सेक्यूलर दलों को यह समझाने की कोशिश करते थे कि अब भाजपा का चाल, चरित्र व चिंतन पहले की तरह घोर सांप्रदायिक नहीं रहा। लेकिन, मोदी के मुद्दे पर खुद शरद यादव का विश्वास भाजपा नेतृत्व से दरक गया है। एनडीए से अलग होने के बाद शरद यादव कहते हैं कि यदि भाजपा नेतृत्व ने उदार सोच का परिचय दिया होता, तो एनडीए में इतनी बड़ी दरार नहीं पड़ती।

शरद यादव मानते हैं कि मोदी के मुद्दे पर भाजपा नेतृत्व ने एक तरह से संघ लॉबी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। जबकि, भाजपा के कई दिग्गज अच्छी तरह से जानते हैं कि मोदी का राजनीतिक जादू भले गुजरात में चलता हो, लेकिन देश के दूसरे हिस्सों में उनकी लोकप्रियता का परीक्षण कभी नहीं हुआ। चूंकि, गुजरात के दंगों का दाग मोदी के चेहरे पर चिपका हुआ है, ऐसे में देश का मुस्लिम समुदाय मोदी नेतृत्व वाले एनडीए को कभी गले नहीं लगाना चाहेगा। इसके चलते कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए को भारी राहत मिल सकती है। यह स्थिति राजनीतिक रूप से पूरे देश के लिए कोई सुकून देने वाली नहीं है। ऐसे में, देशभर की धर्म-निरपेक्ष ताकतें कांग्रेस का मुकाबला करने के लिए नए ढंग से सोच-विचार कर रही हैं। शरद का मानना है कि बहुत संभव है, दो-चार महीने के अंदर इसके राजनीतिक फलित सामने दिखाई पड़ने लगें।

दरअसल, तृणमूल कांग्रेस, बीजू जनता दल व जदयू नेतृत्व के बीच ‘फेडरल फ्रंट’ बनाने की शुरुआती बातचीत हुई है। जदयू के वरिष्ठ नेता एवं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ममता बनर्जी के ‘न्यौते’ पर काफी दिलचस्पी दिखाई है। बीजद सुप्रीमो एवं ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने मीडिया से कहा है कि इस समय देश को कांग्रेस और भाजपा के अलावा तीसरी ताकत का एक राजनीतिक विकल्प जरूरी हो गया है। वे कोशिश कर रहे हैं कि ‘फेडरल फ्रंट’ से इसकी शुरुआत हो जाए। सूत्रों के अनुसार, जुलाई के पहले सप्ताह में नीतीश, ममता व नवीन की मुलाकात भुवनेश्वर में हो सकती है। इसके लिए नवीन पटनायक बातचीत कर रहे हैं।

राहुल गांधी को इसी साल जनवरी महीने में पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया है। उन्हें पार्टी के कई मोर्चों को संगठित और मजबूत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। नई जिम्मेदारी मिलने के बाद राहुल गांधी ने मीडिया से कुछ दूरी बना ली है। वे टीका-टिप्पणियों की सियासत से दूरी बनाकर संगठन को कई स्तरों पर मजबूती देने में लगे हैं। हालांकि, पिछले सालों में उनके कुछ राजनीतिक   परीक्षण ‘फ्लॉप’ साबित हुए हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव कांग्रेस ने उनकी ‘चौधराहट’ में ही लड़ा था। इस चुनाव के लिए ‘युवराज’ ने महीनों तक दौड़-भाग भी की थी। इसके बावजूद कांग्रेस को ‘फ्लॉप शो’ का मजा ही चखना पड़ा।

इससे संदेश यही गया कि दावे चाहे जितने किए जाएं, लेकिन राहुल गांधी में करिश्माई व्यक्तित्व नहीं है। इसके पहले बिहार विधानसभा में भी राहुल गांधी की काफी सक्रियता रही थी। उन्हीं की निगरानी में चलने वाले ‘वार रूम’ से रणनीतियां बनती थीं। लेकिन, यहां कांग्रेस को बुरी तरह से शिकस्त मिली थी। यूपी-बिहार के नकारात्मक अनुभव के बाद भी राहुल गांधी ने अपना आत्मविश्वास बनाए रखा। टीम राहुल के एक युवा सांसद कहते हैं कि असफलताओं के अनुभव ने भी उनके नेता को और मजबूत बनाया है। अब पहले के मुकाबले उनमें राजनीतिक माद्दा काफी बढ़ गया है। उन्होंने पूरे देश में अपनी सक्रियता बढ़ाकर पार्टी कार्यकर्ताओं का भरोसा भी जीत लिया है।

संगठन में शीर्ष स्तर पर हुए ताजा बदलावों में टीम राहुल का ही बोलबाला बढ़ा है। संगठन में केंद्रीय स्तर पर युवाओं की भागीदारी बढ़ा दी गई है। आलम यह है कि यहां कांग्रेस पदाधिकारियों की औसत आयु का आंकड़ा 52 का हो गया है। इसी साल पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं। दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला होना है। चूंकि, ये इलेक्शन लोकसभा चुनाव के ठीक पहले होने हैं। ऐसे में, राजनीतिक रूप से इनका महत्व राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी खास मायने रखेगा। ऐसे में, दोनों दलों का नेतृत्व चुनाव जीतने के लिए हर तरह के दांव आजमाने के लिए तैयार हो रहा है।

यूं तो मोदी को लोकसभा चुनाव की अभियान समिति का ही प्रमुख बनाया गया है। लेकिन, पहली ‘अग्नि परीक्षा’ तो चार राज्यों के चुनाव में ही होनी है। ऐसे में, मोदी के सिपहसालारों ने इस ‘सेमीफाइनल’ के लिए जोर लगाना शुरू कर दिया है। मोदी चाहते हैं कि चुनावी राज्यों में उनकी निर्णायक भूमिका बढ़ाई जाए। जबकि, लालकृष्ण आडवाणी ने दबाव बनाया था कि विधानसभा चुनाव के लिए एक अलग समिति बना दी जाए। वे इसकी जिम्मेदारी नितिन गडकरी को दिलाना चाहते थे। लेकिन, कहीं दो समितियों से जटिलताएं न पैदा हो जाएं, इसको देखते हुए आडवाणी की सलाह को दरकिनार कर दिया गया। आडवाणी बनाम मोदी की किचकिच पार्टी के अंदर कई स्तरों पर गुपचुप ढंग से चल रही है। इससे निजात पाना भी पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है।

दूसरी तरफ, कांग्रेस में राहुल गांधी के नाम पर कोई विवाद नहीं है। कोशिश हो रही है कि अगले चुनाव के चेहरे के रूप में राहुल की तैयारी मुकम्मल हो जाए। लेकिन, रणनीतिक वजहों से पार्टी चुनाव के पहले उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करना चाहती। आकलन यही है कि यदि अकेले दम पर कांग्रेस 200 से ज्यादा सीटें फिर ले आती है, तो ‘युवराज’ के लिए सत्ता-सिंहासन का इंतजाम आसान हो जाएगा। कांग्रेस के रणनीतिकार इस बात को लेकर खासे खुश हैं कि एनडीए में मोदी के विवाद के चलते राजनीतिक एजेंडे का फोकस ही बदल रहा है।

पिछले सालों में घोटालों दर घोटालों की चर्चा से मनमोहन सरकार राजनीतिक रूप से ‘लहू-लुहान’ होती रही है। पिछले दो सालों में संसद का ऐसा कोई सत्र नहीं गया, जिसमें भारी हंगामे न हुए हों। 2जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेल, आदर्श सोसायटी घोटाला, हैलीकॉप्टर घोटाला, कोयला घोटाला व रेल रिश्वत जैसे मामलों से सरकार की फजीहत होती आई है। इसी माहौल में गैर-राजनीतिक संगठनों ने भी भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी मुहिम चलाई है। लोकपाल के मुद्दे पर गांधीवादी समाजसेवी अन्ना हजारे ने कांग्रेस नेतृत्व को संकट में डाल दिया था। अन्ना के आंदोलन से कांग्रेस नेतृत्व एक दौर में सहम भी गया था।

अब देखना यह है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अन्ना हजारे और योगगुरु रामदेव जैसे लोगों ने जो माहौल बनाया है, उससे कांग्रेस को कितना राजनीतिक झटका लगता है? हालांकि, कांग्रेसी रणनीतिकारों को लगता है कि यहां जनता की याददाश्त बेहद कमजोर होती है। वे साल-छह महीने में जरूरी से जरूरी मुद्दे भी अतीत मानकर बिसार देते हैं। बहरहाल, राहुल की अगुवाई में संगठन और सरकार में नए रंग-रोगन के जरिए कुछ ताजापन का अहसास दिलाने की कोशिश की गई है।

मनमोहन मंत्रिमंडल में 8 नए मंत्रियों को शामिल किया गया है। लेकिन, नई भर्तियां विशुद्ध रूप से चुनावी समीकरणों को देखते हुए की गई हैं। कर्नाटक के नेता ऑस्कर फर्नांडिस को कैबिनेट दर्जा मिल गया है। वे यूपीए-1 की सरकार में भी मंत्री रह चुके हैं। इसी राज्य के मल्लिकार्जुन खड़गे को रेल जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंप दिया गया है। उनके पास पहले श्रम मंत्रालय का प्रभार था। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ी जीत हासिल हुई थी। ऐसे में, उम्मीद बंधी है कि कर्नाटक में इस बार फिर लोकसभा के चुनाव परिणाम बेहतर रह सकते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए ऑस्कर और मल्लिकार्जुन को भारी भरकम मंत्रालयों की जिम्मेदारी दी गई है।

राजस्थान में लोकसभा की 25 सीटें हैं। पिछली बार कांग्रेस ने यहां 21 सीटें जीती थीं। लेकिन, कांग्रेस की गहलोत सरकार से राज्य का जाट समुदाय नाराज माना जा रहा है। खास तौर पर वरिष्ठ जाट नेता महिपाल सिंह मदेरणा के मामले को लेकर यह नाराजगी बढ़ी है। उल्लेखनीय है कि बहुचर्चित भंवरी देवी कांड में महिपाल मदेरणा फंस गए हैं। मदेरणा, गहलोत की सरकार में मंत्री थे। यह संदेश चला गया है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जाट नेता मदेरणा को बचाया नहीं। इसी वजह से इस मामले में पूरे समुदाय की भी किरकिरी हो गई है। ‘डैमेज कंट्रोल’ के लिए 84 वर्षीय शीश राम ओला को कैबिनेट में जगह दी गई है। ओला भी प्रभावशाली जाट नेता हैं। कांग्रेस ने राहुल गांधी की मंजिल आसान बनाने की कवायद तेज की है, तो दबंग नेता मोदी ने भी भाजपा में अपनी ‘छाप’ बढ़ाने की मुहिम तेज कर दी है।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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