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संगठन और सरकार में बदलाव के निहितार्थ

लोकसभा के चुनाव सिर्फ 11 महीने दूर (यदि तय समय पर हुए) हैं। ऐसे में, कांग्रेस नेतृत्व ने संगठन और सरकार का चेहरा चमकाने की कवायद तेज कर दी है। नेतृत्व को खासतौर पर चिंता मनमोहन सरकार पर लगे अनगिनत ‘दाग-धब्बों’ की है। यूपीए-2 सरकार का पूरा कार्यकाल विवादों की आफत में ही फंसा रहा है। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से सरकार बचाव की मुद्रा में आने लगी थी। 1.76 लाख करोड़ रुपए के इस महाघोटाले की तमाम परतें धीरे-धीरे खुलती रहीं।

लोकसभा के चुनाव सिर्फ 11 महीने दूर (यदि तय समय पर हुए) हैं। ऐसे में, कांग्रेस नेतृत्व ने संगठन और सरकार का चेहरा चमकाने की कवायद तेज कर दी है। नेतृत्व को खासतौर पर चिंता मनमोहन सरकार पर लगे अनगिनत ‘दाग-धब्बों’ की है। यूपीए-2 सरकार का पूरा कार्यकाल विवादों की आफत में ही फंसा रहा है। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से सरकार बचाव की मुद्रा में आने लगी थी। 1.76 लाख करोड़ रुपए के इस महाघोटाले की तमाम परतें धीरे-धीरे खुलती रहीं।

संचार मंत्री रहे ए. राजा को इस घोटाले का प्रमुख किरदार माना जाता है। वे महीनों तिहाड़ जेल में बिता चुके हैं। जांच आगे बढ़ी, तो ये तथ्य भी सामने आए कि इस खेल में प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी अपनी आंख बंद कर ली थी। वरना, इतना बड़ा घोटाला शायद ही हो पाता। इसके चलते विपक्ष ने प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका पर भी शक की सुई घुमाने की कोशिश की। यह राजनीतिक प्रक्रिया अब तक जारी है। इस बीच कई और घोटालों के खुलासों से सरकार की फजीहत होती रही है। कुछ ऐसी छवि बनने लगी कि सरकार ने कामकाज कम, घोटाले ज्यादा होने दिए। इस दागदार छवि को धोने के लिए अब ताबड़तोड़ बदलावोंं की कवायद शुरू की गई है। सवाल यही है कि क्या इतनी ‘डेंटिंग-पेंटिंग’ से चेहरे पर लगे दाग-धब्बे वाकई में साफ हो जाएंगे?

कांग्रेस आलाकमान ने पिछले दिनों संगठन में शीर्ष स्तर पर कई बदलाव किए हैं। राष्ट्रीय महासचिवों की संख्या बढ़ाकर एक दर्जन तक पहुंचा दी गई है। इस बदलाव की कवायद में पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी की अहम भूमिका मानी जा रही है। पार्टी में अब कम से कम 6 महासचिव ऐेसे हो गए हैं, जिनसे राहुल गांधी की खूब बनती है। जाहिर है कि ये लोग अपने-अपने स्तर पर ‘युवराज’ के एजेंडों को आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगे। उत्तर प्रदेश, नेहरू-गांधी परिवार के लिए इन दिनों खासतौर पर राजनीतिक प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। क्योंकि, तमाम कोशिशों के बावजूद यहां पार्टी को अपेक्षित राजनीतिक सफलताएं नहीं मिल रहीं। यहां तक कि राहुल गांधी तमाम दौड़-भाग के बावजूद कुछ खास परिणाम नहीं दे पाए।

पिछले वर्ष यहां विधानसभा के चुनाव हुए थे। इस चुनाव में अपने करिश्मे के जरिए राहुल ने बाजी पलटने की रणनीति बनाई थी। इसके लिए वे महीनों पहले से संगठन के ‘कील-कांटे’ दुरस्त करने में लगे रहे थे। एक-एक टिकट की निगरानी उनके ‘वार रूम’ ने की थी। पूरी ताकत झोंक देने के बावजूद चुनाव में कांग्रेस को भारी शिकस्त मिली थी। इस चुनाव परिणाम से राहुल के नेतृत्व पर भी सवाल उठे थे। चूंकि, कांग्रेस में लंबे समय से यह परंपरा है कि नेहरू-गांधी परिवार आलोचना से परे है। ऐसे में, ‘10 जनपथ’ के दिग्विजय सिंह जैसे वफादारों ने हार का ठीकरा अपने मत्थे मढ़ लिया। ताकि, ‘फ्लॉप शो’ की आंच से ‘युवराज’ की छवि झुलसने न पाए।

राहुल गांधी, अब सक्रिय राजनीति में काफी अनुभवी हो गए हैं। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने उन्हें हाल में स्वाभाविक राष्ट्रीय नेता करार किया है। कह दिया है कि राहुल राजनीति में इतने दक्ष हो गए हैं कि वे उनकी जगह संभाल लेने के लिए एकदम फिट हैं। प्रधानमंत्री की यह हालिया टिप्पणी इसलिए और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि सालों से चर्चा चल रही है कि अब ‘युवराज’ ही पार्टी के चुनावी चेहरे बनेंगे। यूं तो, कांग्रेस की एक उत्साही लॉबी ने तो पूरी ताकत लगा दी थी कि बीच में ही ‘युवराज’ को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने का राजनीतिक प्रयोग कर डाला जाए। ताकि, चुनावी फोकस ही बदल जाए। माना जा रहा है कि मनमोहन सरकार एक के बाद एक घोटालों के जंजाल में नहीं फंसती, तो शायद बीच में ही यह प्रयोग संभव था।

लेकिन, पिछले दो सालों से हालात काफी बदल गए हैं। घोटालों और भ्रष्टाचार के तमाम मामलों की वजह से विपक्ष आक्रामक मुद्रा में रहा है। मुख्य विपक्षी दल, भाजपा नेतृत्व तो महीनों से 2जी स्पेक्ट्रम से लेकर कोयला घोटाले में प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगता आया है। संसद के हर सत्र में हंगामे दर हंगामे की स्थिति बनी रही है। इसके चलते सरकार सत्र के दौरान न्यूनतम विधाई कामकाज मुश्किल से निपटाने की स्थिति में हो पाती है। यूपीए-2 के चार सालों में महंगाई लगातार बढ़ी है। तमाम वायदों के बावजूद सरकार इसको नियंत्रित नहीं कर पाई है। पार्टी नेतृत्व के सामने महंगाई का मुद्दा एक बड़ी राजनीतिक चुनौती है।  

बस, नेतृत्व के लिए राहत की यही बात है कि इस दौर में मुख्य विपक्षी गठबंधन एनडीए में गंभीर अंतरकलह की स्थिति है। खासतौर पर नरेंद्र मोदी की ‘उम्मीदवारी’ को लेकर राजनीतिक टंटा बढ़ गया है। इसी मुद्दे पर जदयू और भाजपा का 17 साल पुराना गठबंधन टूट गया है। एनडीए से जदयू अलग हो गया है। इस तरह से एनडीए के घटकों का कुनबा अब काफी छोटा हो गया है। इसमें भाजपा के अलावा सिर्फ अकाली दल और शिवसेना बचे हैं। एनडीए की इस क्षति को लेकर कांग्रेस के रणनीतिकार कुछ जरूरत से ज्यादा उत्साहित लगते हैं। शायद, उनका अनुमान यही है कि अब मोदी के मुद्दे पर एनडीए का राजनीतिक रथ बीच में फंस जाएगा।

लेकिन, जदयू के अलगाव को लेकर एनडीए के दम तोड़ने का जैसा आकलन करना शायद एकदम गलत होगा। क्योंकि, भाजपा नेतृत्व जदयू की किसी तरह से भरापाई   कर भी सकता है, नरेंद्र मोदी ने इसके संकेत भी दे दिए हैं। सभी जानते हैं कि अन्ना द्रमुक सुप्रीमो जे. जयललिता का रुख भाजपा और मोदी के प्रति खासा नरम है। वे मोदी को अपना अच्छा मित्र बता चुकी हैं। यह भी कह चुकी हैं कि मोदी में कुशल प्रशासन की अद्भुत क्षमता है। जाहिर है कि दक्षिण भारत की ‘अम्मा’ की इन टिप्पणियों के बड़े राजनीतिक मायने हो सकते हैं। मोदी को आगे लाकर भाजपा ने साफ संकेत दे दिए हैं कि वह एक बार फिर परोक्ष रूप से ही सही हिंदुत्व कार्ड पर भरोसा करने वाली है। शायद, इसीलिए तमाम जोखिम लेकर मोदी को अगुवा बनाने का खेल शुरू किया गया है। कांग्रेस के लिए मोदी ‘दोधारी’ तलवार बन गए हैं। क्योंकि, मोदी की आक्रामक शैली ने पूरे संघ परिवार को चुनावी मोर्चे के लिए अभी से काफी उत्साहित कर दिया है।

भाजपा और जदयू के अलगाव से एनडीए को भले जोर का झटका लगा हो, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं निकाला जाना चाहिए कि महज इतने से ही यूपीए की चुनावी गाड़ी पार हो जाएगी। याद कीजिए, यूपीए से भी कई बड़Þे घटक टूट गए हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा, तृणमूल कांग्रेस व द्रमुक यूपीए से रिश्ता तोड़ चुके हैं। ऐसे में, यह कहना कि एनडीए ही कमजोर हुआ है, ठीक नहीं है। क्योंकि, असली चुनौती तो मनमोहन सरकार के प्रति लोगों की बन रही नकारात्मक अवधारणा की है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलनों में लाखों लोग सड़कों पर उतर आए थे। क्योंकि, लोगों को केंद्र सरकार की कार्यशैली से कहीं न कहीं भारी असंतोष है। इस बीच ऐसा कुछ नहीं हुआ कि लोग अचानक कांग्रेस के ‘मुरीद’ बन जाएं। इतना जरूर है कि टीम राहुल ने संगठन में नई जान डालने के लिए काफी कोशिशें की हैं। राहुल गांधी की खास पसंद राष्ट्रीय महासचिव मधुसूदन मिस्त्री को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बना दिया गया है। मिस्त्री गुजराती हैं। कर्नाटक में मधुसूदन मिस्त्री के सांगठनिक कौशल की चुनावी जीत में काफी भूमिका रही थी। सो, ‘युवराज’ उनकी जिताऊ क्षमता को यूपी में आजमा लेना चाहते हैं। लेकिन, राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे जिताऊ ‘फॉर्मूले’ वे कहां-कहां ढूंढेंगे? ये बड़ा सवाल है.

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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