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बिहार

आम्‍बेदकर ने ओबीसी को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया!

भारतीय शासन व्यवस्था में बौद्धिक जगत के हस्तक्षेप का लंबा इतिहास रहा है। ब्राह्म्णवादियों द्वारा रचित धर्म ग्रंथ इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। जब देश में अंग्रेजों का शासन का दौर चल रहा था तब महात्मा जोतिराव फ़ूले ने पहली बार बौद्धिक जगत में ओबीसी का हस्तक्षेप पूरी मजबूती से स्थापित किया और नतीजतन अंग्रेजों को शिक्षा नीति में मौलिक परिवर्तन करते हुए शुद्रों को पढ़ने का अधिकार देना पड़ा। यह एक बहुत बड़ी जीत थी। लेकिन बाद के दिनों में ओबीसी जागरुकता का यह आंदोलन कुंद पड़ने लगा।

भारतीय शासन व्यवस्था में बौद्धिक जगत के हस्तक्षेप का लंबा इतिहास रहा है। ब्राह्म्णवादियों द्वारा रचित धर्म ग्रंथ इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। जब देश में अंग्रेजों का शासन का दौर चल रहा था तब महात्मा जोतिराव फ़ूले ने पहली बार बौद्धिक जगत में ओबीसी का हस्तक्षेप पूरी मजबूती से स्थापित किया और नतीजतन अंग्रेजों को शिक्षा नीति में मौलिक परिवर्तन करते हुए शुद्रों को पढ़ने का अधिकार देना पड़ा। यह एक बहुत बड़ी जीत थी। लेकिन बाद के दिनों में ओबीसी जागरुकता का यह आंदोलन कुंद पड़ने लगा।

बाबा साहब आम्बेदकर ने ओबीसी के संघर्ष को दलित संघर्ष के रुप में स्थापित कर दिया और परिणाम यह हुआ कि जब देश का संविधान बनाया गया तब बाबा साहब ने दलितों और आदिवासियों के लिए आरक्षण की मुकम्मिल व्यवस्था संविधान में कर दिया और जब ओबीसी ने अपना हक मांगा तब बाबा साहब ने एक आयोग बनाने की वकालत कर दी। जिसके जिम्मे ओबीसी की सामाजिक, शैक्षणिक और राजनीतिक स्थिति का आकलन करने की जिम्मेवारी थी।

यह वह कदम था जिसने देश में ओबीसी समुदाय को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया। अगर दलितों और आदिवासियों के जैसे इस समुदाय को भी संवैधानिक सुविधायें मिल जातीं तो आज इस समुदाय की स्थिति कुछ और होती। यह मजाक नहीं तो और क्या था कि कांग्रेसी हुक्मरानों ने पिछड़ों के लिए आयोग बनाया भी तो उसकी जिम्मेवारी काका साहेब कालेलकर जैसे कट्टर ब्राह्म्ण को दे दी। इससे अधिक हास्यास्पद स्थिति तो तब हुई जब कालेलकर आयोग ने अपनी अनुशंसायें तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु को दिया। उसी समय काका कालेलकर ने 8 पन्ने का एक पत्र पंडित नेहरु को लिखा जिसमें आयोग की अनुशंसाओं को न मानने का अनुरोध किया गया।

खैर, सत्ता के मजे ले रहे सवर्णों को ओबीसी से कोई लेना-देना नहीं था। लेकिन दलित समाज अपनी जगह बना चुका था। आंबेदकर के समय ही बाबू जगजीवन राम कांग्रेसी सत्ता के मुख्य स्तंभ बने रहे। बाद में जब इस देश में समाजवादी आंदोलन शुरु हुआ तब ओबीसी समुदाय में हरकत शुरु हुई। हालांकि आजादी के पहले वर्ष 1935 में जब देश में पहली बार अंतरिम सरकार के गठन के लिए चुनाव हुए तब त्रिवेणी संघ के बैनर तले पहली बार राजनीतिक संगठन के रुप में ओबीसी ने साहस दिखाया। लेकिन उन दिनों मतदान की प्रक्रिया सवर्णों के पक्ष में थी। सवर्णों के पक्ष में होने का मतलब यह कि वोट देने का अधिकार सभी को नहीं था। केवल वही वोट कर सकते थे जो या तो पढे़ लिखे थे या फ़िर साल में कम से कम 2 रुपए लगान दिया करते थे। उन दिनों ओबीसी समुदाय में ऐसे लोगों की संख्या कितनी रही होगी इसका अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि त्रिवेणी संघ बिहार जैसे ओबीसी बाहुल्य राज्य में भी जीतना तो दूर की रही इतने वोट भी न हासिल कर सका कि इतिहास में उसका कोई नाम हो।

खैर, डा राममनोहर लोहिया ने ओबीसी समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ाई छेड़ दिया। उनमें भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि वे सीधे-सीधे ओबीसी के हितों की लड़ाई लड़ते। उन्होंने बीच का रास्ता अपनाया। जहां एक ओर ब्राह्म्णवाद की प्रशंसा की तो दूसरी ओर गांधी का भी अनुसरण किया। सिद्धांतविहीन राजनीति का परिणाम रहा कि ओबीसी समुदाय को न तो लोहिया के सप्तक्रांति का लाभ मिल सका और न ही जेपी के संपूर्ण क्रांति का।

हां संपूर्ण क्रांति का एक परिणाम यह अवश्य हुआ कि बड़ी संख्या में ओबीसी के युवा राजनीति में आये। उनकी सशक्त उपस्थिति का परिणाम रहा कि बाद के दिनों में बिहार और यूपी में ओबीसी युवाओं ने अपने आपको स्थापित किया। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद, सुशील कुमार मोदी और नीतीश कुमार सब उन दिनों के नायक थे। कुल मिलाकर देश में ओबीसी समुदाय की राजनीति में पकड़ पूर्व की तुलमा में मजबूत हुई है। हालांकि सबसे अधिक चिंतनीय है कि यह समुदाय इक्कीसवीं सदी में भी एक दिशा के लिए तरस रहा है जिसकी कमी दलित समुदाय के लिए कांशीराम राणा ने पूरी कर दी थी। अर्जक संघ की स्थापना कर उत्तरप्रदेश के पूर्व वित्त मंत्री रामस्वरुप वर्मा ने प्रयास किया है, लेकिन अभी भी यह शैशवावस्था में ही है। कारण यह कि आज ओबीसी के जितने भी कर्णधार है, वे सब कहीं न कहीं ब्राह्म्णों और सामंतों के आगे घुटने टेकते नजर आ रहे हैं। क्रीमी लेयर के प्रावधान के रुप में रास्ते बंद किये जा रहे हैं।

1990 के दशक में जब देश में मंडल कमीशन की अनुशंसाओं को लागू किया गया तो इसकी मूल वजह यह रही कि उन दिनों पहली बार ओबीसी देश की राजनीति में एक ताकत बनकर उभरा था। तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी साहस दिखाते हुए इसे लागू किया। इससे सरकारी नौकरियों और सरकारी शिक्षण संस्थानों में ओबीसी को आरक्षण दिये जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ। लेकिन संवैधानिक संस्थाओं यथा संसद और विधानसभाओं में ओबीसी को आबादी के अनुरुप आरक्षण दिये जाने संबंधी अनुशंसा को किनारे कर दिया गया। नतीजतन समाज में पिछड़े होने के बावजूद यह समाज विधायिका में सामान्य की श्रेणी में गिना जाता है।

भारतीय समाज में ओबीसी को अन्य शुद्रों से अलग-थलग करने के लिए तरह-तरह के प्रपंच किये जा रहे हैं। मसलन बिहार में नीतीश कुमार ने दलितों को महादलित बनाकर विभाजित कर दिया तो उन्होंने पिछड़ा वर्ग में अति पिछड़ा वर्ग बना दिया। इसका राजनीतिक फ़ायदा नीतीश कुमार को भले ही मिल गया हो लेकिन वह समाज जिसे अति पिछड़ा वर्ग का नाम दिया गया है, उसकी हालत आज भी वैसी ही है। इसके अलावा सवर्ण बुद्धिजीवी ने मध्यवर्ती जातियों का राग अलापना शुरु कर दिया है। उनका कहना है कि ओबीसी में शामिल कुछ जातियां पिछड़ेपन की परिभाषा को पार कर चुकी हैं। बिहार में यादव, कोईरी, कुशवाहा और कुर्मी समाज को नवसामंत के रुप में पेश किया जा रहा है। यह केवल एक साजिश है ताकि ओबीसी को आपस में तोड़कर वे अपनी राजनीतिक रोटी सेंक सकें। जबकि वैश्वीकरण का सबसे अधिक लाभ सामंती ताकतों को ही मिला है। बिहार में इसका एक प्रमाण यह कि बिहार उद्योग परिसंघ यानी बीआईए में शामिल 93 फ़ीसदी उद्योगपति सवर्ण हैं।

बहरहाल, आवश्यकता इस बात की है कि ओबीसी अपनी ताकत को पहचाने और अपना अधिकार हासिल करे। इसके लिए ओबीसी नेताओं को अपना व्यक्तिगत स्वार्थ का त्याग कर समुदाय हित को प्राथमिकता देनी होगी। तभी ओबीसी को वह हक मिल सकेगा जो उसे अबतक नहीं मिला है।

लेखक नवल किशोर कुमार पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं तथा अपना बिहार पोर्टल का संचालन करते हैं.

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