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इलाहाबाद

मदारी की डपट, जमूरे का ठहाका, जनता बोली- वाह भाई वाह

इलाहाबाद में घंटाघर चौक त्रिमुहानी के पास नीम का दरख्त। आकाश में बदली, चटक तीखी धूप के बीच चिपचिपाती गर्मी वाली उमस। ऐसे में नीम की दरख्त के नीचे ठंडी-ठंडी छांव में जमूरा-मदारी का खेल-तमाशा चल रहा था। वहां जुटी तमाशबीनों की भीड़ आनंद रस में डूब-उतरा रही थी। तमाशबीन, जो भीड़ का एक हिस्सा थे, खुश होकर कभी ताली बजाते तो कभी मुंह से वाह-वाह करने लगते। वे खुश थे, पूरी तरह मगन। और जमूरा, चूंकि वो जमूरा था, इसलिए चादर ओढ़े जमीन पर लेटा पड़ा था।

इलाहाबाद में घंटाघर चौक त्रिमुहानी के पास नीम का दरख्त। आकाश में बदली, चटक तीखी धूप के बीच चिपचिपाती गर्मी वाली उमस। ऐसे में नीम की दरख्त के नीचे ठंडी-ठंडी छांव में जमूरा-मदारी का खेल-तमाशा चल रहा था। वहां जुटी तमाशबीनों की भीड़ आनंद रस में डूब-उतरा रही थी। तमाशबीन, जो भीड़ का एक हिस्सा थे, खुश होकर कभी ताली बजाते तो कभी मुंह से वाह-वाह करने लगते। वे खुश थे, पूरी तरह मगन। और जमूरा, चूंकि वो जमूरा था, इसलिए चादर ओढ़े जमीन पर लेटा पड़ा था।

वो मदारी की एक-एक बात गौर से सुनता फिर जवाब देता। जवाब भी ऐसा जो भीड़ समेत मदारी को भी संतुष्‍ट कर सके। यह मदारी और जमूरे के सालों से चले आ रहे खेल-तमाशे का एक अनिवार्य हिस्सा था। और तमाशबीन? वे भी इस खेल तमाशे के आदी बन चुके थे। तमाशा देखते और ताली बजाया करते। शायद यही उनके हिस्से में था। किस्सा कोताह यह कि मदारी, जमूरा और तमाशबीन, तीनों अपने काम में मस्त थे। पूरी तरह मगन। बहरहाल, नीम के नीचे चलने वाले खेल तमाशे में मदारी-जमूरे का संवाद कुछ इस प्रकार रहा-

मदारी-जमूरे?

जमूरा-हां, उस्ताद।

मदारी-मुझे मेरे सभी सवालों का जवाब दो।

जमूरा-उस्ताद, बात तो ऐसी ठसक से कर रहे हो जैसे ऊंची ओहदेदार सरकारी कुर्सी तोड़ने वाले, सरकारी आंकड़ों को फाइलों में सजाने और फूटी किस्मत का रोना रोने वाली, बात-बात पर ऊपर वाले को दोश देने की आदी हो चुकी जनता के बीच काम करने वाले कोई अड़ियल नौकरशाह हो।

दर्शकदीर्घा में खड़े तमाशबीनों के बीच ठहाका गूंजा। भीड़ बोली-ठीक कहा, भाई ठीक कहा। जमूरे की बात पर मदारी भी किसी खटारा ट्रक के स्टार्ट होते इंजन माफिक आवाज करते खीं-खीं-खीं हंसा। वहां खड़े लोगों ने देखा, बूढ़े नीम के दरख्त ने भी देखा कि हंसते समय मदारी की थुलथुल तोंद हिल रही थी। मदारी की तेजी से हिलती थुलथुल तोंद जमूरे ने भी देख ली। मदारी को टोंका-उस्ताद! तोंदियल पुलिस वालों की तरह तोंद काहे हिल रही है। बढ़ती तोंद का ख्याल नहीं रखते? झेंप मिटाते मदारी ने डपटा-तुम्हें सवालों के जवाब की नहीं, हमारी हिलती तोंद की चिंता क्यों पड़ी है? हाजिर जवाब जमूरा तपाक से बोल पड़ा-पुलिस के आला अफसर की तरह काहे बोल रहे हो उस्ताद?

पता है, अपना उत्तर प्रदेश जिसे अब प्रेम से भाई लोग उल्टा-प्रदेश बोलने लगे हैं-पचास फीसदी से ज्यादा पुलिस वाले अपनी बढ़ी तोंद को लेकर परेशान हैं। अपराधी पकड़ना भी चाहें तो उनकी तरबूज मार्का तोंद आड़े आ जाती है। अपराधी आगे-आगे, हांफती पुलिस उनके पीछे। जमूरा लगातार बोले जा रहा था। चुप होने का नाम ही न ले रहा था। बोला-उस्ताद, इसीलिए पुलिस महीनों गुडवर्क नहीं कर पाती। पापी पेट अक्सर आगे आ जाता है। घर-मोहल्लों में बच्चे उन्हें तोंदू-तोंदू बोलकर हंसी उड़ाते हैं सो अलग। बुरा न मानो तो एक बात बोलूं उस्ताद? अगल बगल टोह लेते जमूरे की बात बीच में काटते मदारी बोला-हे धूप में सूख चुके सूखे करेले, अब बीच में पुलिस को काहे लाता है। कुटम्मस कराएगा क्या? हेंऽ हेंऽ हेंऽऽ…खीसें काढ़ते जमूरा बोला-अरे नहीं उस्ताद! मेरी क्या बिसात?

मदारी ने एक बार फिर डपटा-खाकी पर इल्जाम लगा रहा है, वो भी भीड़ के सामने। बच्चू, अब तेरी खैर नहीं। सूरज देवता की तरफ हाथ उठाकर श्राप देने के अंदाज में बोल पड़ा-मेरे साथ खेल? भगवान करे तू भाजपा का आडवाणी बन जा। मदारी गुस्से में था। माया भगवान की देखिए कि जमूरा को भी ताव आ गया। अपने उस्ताद का लिहाज भूल गया। मदारी की तरह ऊपर हाथ उठाते बोला- भगवान करे तू भी कांग्रेस का ‘मौन-मोहन’ बन जा। मैडम के इशारे पर जिंदगी भर नाचता रहे, ताक धिना धिन…।

सीन तेजी से बदल रहा था। कभी सुखांत हो जाता तो कभी दुखांत। अब क्या बताएं आपसे। ये जानों कि रंगकर्मी अतुल यदुवंशी की नाट्य प्रस्तुति फेल थी। सीन एक बार फिर बदला। सड़क से सामान समेटते मदारी बड़बड़ा रहा था-अब तेरे साथ मेरी कतई न पटेगी, तू अपनी राह, मैं अपनी राह। मुझे तू छोड़, मुझे कहीं और जाने दे मेरे बाप।

सच्ची बताएं आपसे कि सीन तेजी से बदल रहा था। नीम का दरख्त दुखी था। तमाषा देखने वाली जनता भी कम दुखी न थी। अभी यह सब चल ही रहा था कि जमूरे ने चादर झटके में परे धकेली, झटपट खड़ा हो गया। रोनी सूरत बनाई और लगा गिड़गिड़ाने-उस्ताद, मेरे माई-बाप, बचपन से तेरी छांव में पला-बढ़ा हूं। मुझे छोड़ कहीं और न जा। मेरे बिना तू और तेरे बगैर मैं अधूरा हूं। इतने दिनों से चले आ रहे खेल-तमाशे को यूं ही बीच में छोड़ देना ठीक नहीं। जमूरे की बात सुन मदारी का गुस्सा काफूर हो गया। जमूरे के कंधे पर हाथ रख मदारी मुस्कराया फिर बोला-अरे काहे को बिहार में जद यू और भाजपा के खेल-तमाशे की याद दिला रहा है भाई… चल, अब तू खुश हो ले। अब हम दोनों कभी भी अलग नहीं होंगे। साथ-साथ रहकर खेल-तमाशा दिखाएंगे तमाशा देखने की आदी हो चुकी इस बेचारी जनता-जनार्दन का मुफ्त में मनोरंजन करते रहेंगे। सीना ठोंकते गर्व से बोले-हम मदारी-जमूरा हैं, कोई नेता थोड़े नहीं।

सच्ची बताएं, मदारी के इस बात पर तमाशबीनों ने भी सहमति में सिर हिलाए। एक बार फिर उनके मुंह से निकले वाह-वाह के शब्द ने माहौल बदल दिया। खिदमते पेश है मुनव्वर राना की कविता की दो लाइनें-

एक निवाले के लिए मैंने जिसे मार दिया।
वो परिंदा भी कई रोज का भूखा निकला।।

लेखक शिवाशंकर पांडेय इलाहाबाद के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. इनसे मोबाइल नं. 09565694757 के जरिए संपर्क किया जा सकता है. 

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