विश्व हिंदू परिषद ने ऐलान किया है कि अगामी मानसून सत्र में अगर राममंदिर निर्माण के लिए कानून नहीं बना तो वह देश भर में व्यापक आंदोलन शुरू करेगी। अगस्त माह से अयोध्या में साधु संतों को इकट्ठा करके इसके लिए माहौल बनाने की शुरुआत की जायेगी। यह कुछ नया नहीं है। जब-जब चुनाव पास आते हैं तब-तब विहिप जैसे संगठन अपने नापाक इरादों को पूरा करने के लिए ऐसा ड्रामा करते रहते हैं। इस बार भी पूरे प्रदेश में यही माहौल बनाने की तैयारी की जा रही है। दुःख की बात यह है कि देश के साधु-संत भी राजनेताओं की तरह यह घिनौना आचरण करने लगे हैं।
राम मंदिर के नाम पर एक बार सत्ता के सिंहासन तक पहुंच चुकी भाजपा जानती है कि राम नाम का सहारा ही उसे एक बार फिर सत्ता तक पहुंचा सकता है। लिहाजा वह हर चुनाव से पहले इसका प्रयोग करती रहती है। यह बात दीगर है कि अब इस कार्ड को जनता भलीभांति समझ चुकी है, लिहाजा वह इनके झांसे में नहीं आती। मगर यह लोग अपने इस खेल को खेलने से बाज नहीं आते। उनको लगता है कि उनके इस दांव से ही लोग सब कुछ भूल कर उनके समर्थन में जुट जायेंगे। दरअसल उनकी यह सोच उनके हिसाब से कुछ हद तक सही भी है। यह लोग कई बार देख चुके हैं कि इस देश में जब धर्म का रंग चढ़ता है तब बाकी सारे रंग फीके पड़ जाते हैं। देश के सामने कितने भी गंभीर मुद्दे क्यों न हो मगर धर्म का मुद्दा हर बात पर भारी पड़ जाता है।
बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद विश्व हिंदू परिषद यह घिनौना खेल खेल चुकी है। विध्वंस के पहले और विध्वंस के बाद पूरे देश भर में यह नारे लिखे नजर आते थे कि सौगंध राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनायेंगे या फिर जिस हिंदू का खून नहीं खौला खून नहीं वह पानी है। स्वाभाविक था कि इस तरह के नारों ने पूरे देश में नफरत का वातारण तैयार कर दिया था। हिंदू और मुसलमान एक दूसरे से नफरत करने लगे थे। संघ और विहिप को यह वातावरण बहुत लुभाता है। हकीकत यही है कि ऐसे ही वातावरण से उनकी दुकान चलती है। लिहाजा यह सभी लोग वातावरण में और उत्तेजना फैलान में लग गये। राम मंदिर निर्माण के लिए अयोध्या में पत्थर तराशने का काम जोर-शोर से शुरू कर दिया गया। छोटी-छोटी शीशियों में गंगाजल के नाम पर सड़क की टंकियों से पानी भरकर बेचा जाने लगा। पत्थर तराशने और मंदिर निर्माण के लिए देश और विदेश से अरबों रुपया इन संगठनों को मिलने लगा। तब इनको लगा कि राम नाम को बेचने से बेहतर धंधा कोई दूसरा नहीं हो सकता।
इस बीच लोकसभा चुनावों में इसी उन्माद के सहारे भाजपा अपने सहयोगियों के दम पर सत्ता तक भी पहुंच गयी। मगर सत्ता संभालने के साथ ही भाजपा नेताओं को पूरी तरह एहसास हो गया कि अब अगर मंदिर की बात की तो दिल्ली का सिंहासन दूर हो जायेगा। लिहाजा भाजपा नेताओं ने राम से ज्यादा कुर्सी को महत्व दिया और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पूरे पांच साल तक राममंदिर को भूले बैठे रही। तब संघ या विहिप के किसी नेता ने नहीं कहा कि आपने भगवान राम की सौगंध खायी है कि मंदिर वही बनायेंगे। अब तो मौका आ गया है कि मंदिर बनवा दिया जाये। जाहिर है संघ और विहिप के साथ भाजपा के लिए राममंदिर सिर्फ तक माध्यम था जिसके जरिये दिल्ली की सत्ता हासिल की जा सकती थी। इसके बाद हुए चुनाव में जनता ने भाजपा को सबक भी सिखा दिया। पिछले दो लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने सहयोगी दलों के साथ सरकार बनाई।
भाजपा अपने नये सहयोगियों की तलाश करती रही। इस दौरान संघ परिवार बेहद बैचेन हो गया क्योंकि देश भर में संघ की शाखाओं में बेहद कमी होती जा रही थी। इसी बीच नरेन्द्र मोदी का उदय उग्र हिंदू नायक की तरह हुआ। गुजरात दंगों के बाद हिंदू कट्टरपंथी ताकतें उन्हें बेहद पसंद करने लगी थी। इन्हीं लोगों ने माहौल बनाया कि अगर मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया जाये तो भाजपा अपने दम पर चुनाव जीत सकती है। नतीजे में गोवा में मोदी को प्रचार समिति का प्रमुख बनाने के साथ ही उग्र हिंदुवाद की नींव फिर तैयार होने लगी। विहिप अयोध्या में फिर से साधु-संत इकट्ठा करने के साथ ही अपना पुराना नाटक खेलने की पटकथा तैयार कर रहा है। मोदी के सबसे दुलारे अमित शाह यूपी में आकर संघ के मददगार की भूमिका अपना रहे हैं।
विहिप के लोगों को लग रहा है कि मोदी यूपी में आकर मंदिर बनाने की हुंकार भरेंगे और देश के लोग खुद-ब-खुद मंदिर बनाने के लिए जुट जायेंगे क्योंकि माहौल बनाने का बाकी काम तो संत समुदाय कर चुका होगा। यूपी में इन संगठनों की राह आसान भी लगती है। समाजवादी पार्टी मुसलमानों को लुभाने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है। भाजपा की इन कोशिशों को यह कहकर प्रचारित करेगी कि सपा अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के लिए सभी ताक पर रख रही है। इस तरह के आरोप लगाकर वह हिन्दुओं को एक मंच पर लाने की कोशिश करेगी। तो बदले में सपा मुसलमानों को लुभाने के लिए और आगे आयेगी। नतीजा यही होगा कि धर्म के नाम पर लोगों में दूरिंया बढेंगीं।
काश इन लोगों को समझ में आ जाता कि लोग अब इनकी बातों में आने वाले नहीं हैं। लोग जागरुक हो गये हैं। उन्हें पता है कि संघ और विहिप ने केवल दिल्ली दरबार तक पहुंचने के लिए राम मंदिर का सहारा लिया लिहाजा अब उनकी दाल
गलने वाली नहीं है। पिछले काफी समय से यह हो रहा है कि जब यह लोग राममंदिर का नाम भी लेते हैं तो लोगों को चिढ़ होने लगती है। मगर कुछ लोगों को अभी भी लगता है कि कुछ जगह हिंदू और मुसलमानों के बीच दंगे हो जायें तो उनके लिए काफी अच्छा माहौल बन सकता है। लिहाजा लोकसभा चुनाव से पहले एक बार फिर जमीन को लाल खून से रंगने की तैयारी की जा रही है। काश इस देश के लोग धर्म के नाम पर नाटक करने वालों को इतना कड़ा संदेश दें कि भविष्य में कभी भी कोई यह खेल खेलने को सोच न सके।
लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और वीकएंड टाइम्स हिंदी वीकली के प्रधान संपादक हैं.





