Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

प्रिंट-टीवी...

कबीर से कई अर्थों में चार कदम आगे थे अदम

डेढ़-दो दशक पहले की बात है। प्रदेश की ग्राम पंचायतों के चुनाव हुए थे और उन्हें आर्थिक अधिकार भी दिए गए थे। जनपद फैजाबाद के नवनिर्वाचित प्रधानों ने वहाँ मुख्यालय स्थित सभागार नरेन्द्रालय में एक सम्मेलन किया और आयोजकों ने उसमें ‘अदम’ जी को भी आमंत्रित किया था। उन्हें आशीर्वचन देने के लिए जब आयोजकों ने मंच पर बुलाया तो माइक पकड़ते ही ‘अदम’ जी ने जो दो पंक्तियाँ पढ़ी थीं वो अदम जैसे अदम्य साहस और आग से भरे हुए आदमी से ही सुनी जा सकती थीं -‘‘जितने हरामखोर थे पुरवो-जवार में, प्रधान बनके आ गए अगली कतार में।’’ जिसने बुलाया हो उसी के घर में बैठकर उसकी बुराइयों पर गरियाना! अदम के सिवा और कौन कर सकता था ऐसी हिमाकत! कहने की आवश्यकता नहीं, सभागार में बैठे प्रधानों ने कितना हल्ला मचाया था।

डेढ़-दो दशक पहले की बात है। प्रदेश की ग्राम पंचायतों के चुनाव हुए थे और उन्हें आर्थिक अधिकार भी दिए गए थे। जनपद फैजाबाद के नवनिर्वाचित प्रधानों ने वहाँ मुख्यालय स्थित सभागार नरेन्द्रालय में एक सम्मेलन किया और आयोजकों ने उसमें ‘अदम’ जी को भी आमंत्रित किया था। उन्हें आशीर्वचन देने के लिए जब आयोजकों ने मंच पर बुलाया तो माइक पकड़ते ही ‘अदम’ जी ने जो दो पंक्तियाँ पढ़ी थीं वो अदम जैसे अदम्य साहस और आग से भरे हुए आदमी से ही सुनी जा सकती थीं -‘‘जितने हरामखोर थे पुरवो-जवार में, प्रधान बनके आ गए अगली कतार में।’’ जिसने बुलाया हो उसी के घर में बैठकर उसकी बुराइयों पर गरियाना! अदम के सिवा और कौन कर सकता था ऐसी हिमाकत! कहने की आवश्यकता नहीं, सभागार में बैठे प्रधानों ने कितना हल्ला मचाया था।

‘अदम’ जन्म से ठाकुर यानी क्षत्रिय थे। उनका गाँव भी ठाकुरों का ही था। वहीं वे आजीवन रहे भी। अव्यवस्था, शोषण और अन्याय के प्रति उनकी रगों में  खौलता हुआ खून ही था जो उन्हें व्यवस्था की भीड़ में घुसकर मारकाट करने पर आमादा कर देता था। प्रधानों की सभा का वाकया ही नहीं, ऐसे दर्जनों अवसर थे जब उन्होंने अत्याचारियों के मुंह पर थूका। कल्पना कीजिए कि- ‘‘दिन-दहाड़े इनको डंडों से सुधारा जाएगा, ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा।’’ अपनी मशहूर नज़्म ‘‘मैं चमारों की गली में ले चलूँगा आपको’’ में यह पंक्तियाँ  लिखकर वे किस तरह अपने ठाकुर पट्टीदारों के बीच में रहते रहे होंगें? यह अनायास नहीं कि उनकी जाति-बिरादरी के जमे-जमाये लोग उन्हें सनकी कहते थे!

अपने मुख्यमंत्रित्व काल में सपा प्रमुख मुलायमसिंह ने अपने गृह स्थान सैफई में ‘सैफई महोत्सव’ का आयोजन शुरु किया था जो सामाजिक-सांस्कृतिक-व्यापारिक गतिविधियों का राष्ट्रव्यापी केन्द्र हुआ करता था। मुलायम सिंह जी ‘अदम’ को बहुत मानते थे और अदम की सोच भी वामपंथी-समाजवादी ही थी। 2006 या 07 की बात है ऐसे ही सैफई महोत्सव में मुलायम की मौजूदगी में मंच से ‘अदम’ ने यह शेर पढ़ा तो लोग सन्न रह गए-‘‘इस इलेक्शन में मुसलमानों से रुमाल बदलेंगें, चेहरा तो बदल लिया है अब चाल बदलेंगें।’’

‘अदम’ में एक स्वाभाविक वैचारिक आग थी जो अपने स्वार्थ के लिए किसी का भी लिहाज करना नहीं जानती थी। तमाम आलोचक आज अगर उन्हें कबीर कहते हैं तो यकीन मानिए कई अर्थो में वे कबीर से भी चार कदम आगे थे। वे अकृत्रिम थे इसलिए जीवन के झंझावातों से जूझने की कृत्रिम व्यवस्थाऐं नहीं कर पाये। कर पाते तो शायद जीवन के आखिर दौर में उन्हें पी.जी.आई. लखनऊ में उस शर्मनाक स्थिति से न गुजरना पड़ता कि उन्हें अस्पताल की एक बेड दिलाने के लिए मुलायम सिंह जैसे एक पूर्व मुख्यमंत्री को हस्तक्षेप करना पडे़। उनकी सारी सोच, सारी चेतना क्रांतिधर्मा थी और जो क्रांति करने निकलते हैं वे समझौते नहीं करते। वे कहते हैं – ‘‘ मैंने अदब से हाथ उठाया सलाम को, समझा उन्होंने इससे है खतरा निजाम को। चोरी न करें, झूठ न बोलें तो क्या करें, चूल्हे पे क्या उसूल पकायेंगें शाम को।’’ यह अदम ही थे जो इतने सपाट और बेबाक होकर कह सकते थे कि-‘‘ बगावत के कमल खिलते हैं दिल की सूखी दरिया में, मैं जब भी देखता हूँ आँखों बच्चों की पनीली है।’’

‘अदम’ आजीवन अदम ही रहे। ऐसा नहीं था कि युवावस्था के अदम ने जवानी के जोश में क्रांति की बात की हो और परिपक्व होने पर व्यवस्था से समझौते कर जिन्दगी का सुख बटोरना सीख लिया हो। एक परिपक्व उम्र तक वे जिए लेकिन जवानी के जोश में ही जिए और लिखे। अपने समय आँकलन जिस एक शे’र में उन्होंने किया वो न सिर्फ बेमिसाल और अद्भुत है बल्कि गागर में सागर भरने की कहावत को चरितार्थ करता है- ‘‘ इस व्यवस्था ने नयी पीढ़ी को आखिर क्या दिया, सेक्स की रंगीनियाँ या गोलियां सल्फास की।’’

किसी एक आदमी के न रहने से कोई काम रुक नहीं जाता लेकिन सच यही है कि दुष्यंत के बाद हमें अदम की आदत पड़ गयी थी। बहुत दूर-दूर तक देखने पर भी हमें फिलहाल अदम का विकल्प दिखता नहीं। उन्हें श्रृद्धांजलि देने के लिए उचित यही होगा कि जो उन्होंने ‘होशो-हवास’ में कहा था उसे हम भी अपने होशो-हवास में उतार लें -‘‘ जनता के पास एक ही चारा है इंकलाब, यह बात कह रहा हॅू मैं होशो-हवास में।’’

लेखक सुनील अमर लखनऊ में रहते हैं. लगभग 20 साल तक कई पत्र-पत्रिकाओं में नौकरी करने के बाद पिछले कुछ वर्षों से स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन कर रहे हैं. कृषि, शिक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा महिला सशक्तिकरण व राजनीतिक विश्लेषण जैसे विषयों से इन्हें लगाव है. देश के सभी प्रमुख हिंदी अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं व दो फीचर एजेंसियों में नियमित लेखन करते हैं. इनका लिखा उर्दू व मराठी में अनुदित होकर भी छपता है. पत्रकारिता के ही सिलसिले में ये अन्य राज्यों का भी भ्रमण करते रहते हैं. सुनील अमर से संपर्क 09235728753 के जरिए किया जा सकता है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...