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बिहार के जनसूचना आयुक्‍त पद से सेवानिवृत्‍त हुए वरिष्‍ठ पत्रकार फरजंद अहमद

पटना : बिहार राज्य सूचना आयोग से वरिष्‍ठ पत्रकार तथा सूचना आयुक्‍त फरजंद अहमद सेवानिवृत्‍त हो गए. राज्य सूचना आयोग के गठन के सात साल के दौरान यह पहला मौका था जब नीतीश कुमार ने किसी पत्रकार को यह दायित्‍व सौंपा था. देश के जाने माने पत्रकार फरजंद ने अल्‍प समय में ही सूचना आयोग में अपनी अमिट छाप छोड़ी. फरजंद के रिटायर होने की कमी राज्य की जागरुक  जनता और एक्टिविस्ट भी महसूस कर रहे हैं.

पटना : बिहार राज्य सूचना आयोग से वरिष्‍ठ पत्रकार तथा सूचना आयुक्‍त फरजंद अहमद सेवानिवृत्‍त हो गए. राज्य सूचना आयोग के गठन के सात साल के दौरान यह पहला मौका था जब नीतीश कुमार ने किसी पत्रकार को यह दायित्‍व सौंपा था. देश के जाने माने पत्रकार फरजंद ने अल्‍प समय में ही सूचना आयोग में अपनी अमिट छाप छोड़ी. फरजंद के रिटायर होने की कमी राज्य की जागरुक  जनता और एक्टिविस्ट भी महसूस कर रहे हैं.

जाने माने व्‍हीसल ब्‍लोअर शिव प्रकाश राय ये कहते हैं कि 30 अगस्त 2011 को जब श्री अहमद ने पटना स्थित सूचना भवन में पहला कदम रखा था, तब से लेकर अबतक उनके काम करने के ढंग को हर जगह, यहां तक कि स्कूली बच्चों ने भी सराहा और वो धीरे धीरे लोगों में चर्चा का विषय बन गए. यहां तक कि उनकी चर्चा बिहार के गांव खेत खलिहानों में भी काफी हुई क्योंकि सूचना मांगने वालों में लगभग 80% गांव, कस्बों और छोटे शहरों से ही आते हैं. फरजंद अहमद बतौर राज्य सूचना आयुक्त अपने अनूठे अंदाज से एक तरह से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गुड गवर्नेन्स, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की मुहीम में जनता का विश्वास मजबूत किया.

जब फरजंद अहमद से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने अपने पुराने पत्रकारिता वाले अंदाज में इसका जवाब दिया. उन्होंने कहा कि जिस तरह से पत्रकारिता उनके लिए एक मिशन की तरह थी, ठीक उसी तरह से उन्होंने जनता को सूचना पहुंचाने का काम भी मिशन के तौर पर किया है. जिस दिन वो सेवानिवृत्‍त हो रहे थे, राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त आरजेएम पिल्लई के सामने उन्होंने इस बात को माना भी की हो सकता है कि कानून की हदों से बाहर निकल के लोगों के बीच सूचना दिलाया हो, मगर इस बात का उन्हें कोई मलाल भी नहीं, क्योंकि कभी कभी सीधी उंगली से घी नही निकलती.
श्री पिल्लई ने उसी समारोह में इस बात को माना भी कि उनके सूचना दिलाने के अंदाज के कारण ही अधिकतर आवेदक उनकी ही पीठ में अपनी अर्जी ले जाना चाहते थे. बिहार के राज्य सूचना आयुक्त एस विजयराघवन जो बिहार सूचना आयोग फरजन्द अहमद के सहयोगी थे, ने भी माना कि अहमद कानून के जानकार न होते हुए भी कानून की बारीकियों को अच्छी तरह निभाते हुए अधिकतर मामलों को सामाजिक आयाम भी दिए.

फरजंद अहमद के आर्डर कई काफी क्रूर भी होते थे और अधिकारियों को अक्सर इस तरह के आदेश नागवार ही गुजरते थे, मगर जनता का हक उनके लिए उन्‍होंने वही किया जो उन्‍हें सही लगा. उनके इस कड़े अंदाज की वजह से ही बिहार में कई बडे भ्रष्टाचार का भी पर्दाफाश भी हुआ. आज भी सोलर लाईट की योजना में भ्रष्टाचार, हाई मास्ट लाईट, मनरेगा, इंदिरारा आवास योजना औऱ पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम जैसे कार्यकर्मों में भ्रष्टाचार के पर्दाफाश को लोग याद करते हैं.

इतना ही नहीं उन्होंने धारा 18 (3) के तहत सूचना आयुक्तों को दिए गए अधिकार (जो सूचना आयुक्तों को डिस्ट्रिक्ट जज का अधिकार देता है और राज्य सूचना आयोग को हक देता है कि वो कोड ऑफ सिविल प्रासीजर, 1908 को कड़ाई से लागू करें) लोक सूचना पदाधिकारी पर सूचना देने का दबाव दिया कि वो जनता को सही सूचना दें. कई बार उन्होंने कोड ऑफ सिविल प्रासिजर का इस्तेमाल करके जिलाधिकारियों से वारंट जारी करवा के कई लोक सूचना पदाधिकारीयों को पुलिस हिरासत में पेशी भी करवाई और सूचना भी दिलवाया. 

नितिन श्रीवास्‍तव की रिपोर्ट.

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