गुजरात के बहुचर्चित इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ प्रकरण में अब भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक जंग तेज होने के आसार हैं। क्योंकि, संकेत यही हैं कि इस मामले में सीबीआई गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सिपहसालार अमित शाह को लपेटने जा रही है। विवादित मुठभेड़ प्रकरण में सीबीआई गुजरात उच्च न्यायालय में अगले सप्ताह आरोप पत्र दाखिल करने जा रही है।
नरेंद्र मोदी की भूमिका पर शक की सुई घूमने से भाजपा के वरिष्ठ नेता खफा हो गए हैं। इन लोगों ने मनमोहन सरकार और कांग्रेस नेतृत्व को जमकर कोसना शुरू कर दिया है। मोदी ने भी चुनौती के अंदाज में कह दिया है कि कांग्रेस नेतृत्व उनके खिलाफ जी भरकर सीबीआई का दुरुपयोग कर ले, वे इस तरह की बातों से डरने वाले शख्स नहीं हैं।
उल्लेखनीय है कि जून, 2004 में मुंबई की 16 वर्षीय छात्रा इशरत जहां और तीन अन्य लोगों को पुलिस मुठभेड़ में मार गिराया गया था। पुलिस ने यही दावा किया था कि ये लोग मुख्यमंत्री की हत्या की साजिश के तहत अहमदाबाद पहुंचे थे। राज्य की पुलिस को केंद्रीय खुफिया ब्यूरो (आईबी) के विशेष निदेशक राजेंद्र कुमार ने इस आशय की खुफिया सूचना दी थी। उस समय राजेंद्र कुमार, आईबी में संयुक्त निदेशक के तौर पर कार्यरत थे। इस मुठभेड़ को लेकर शुरुआती दौर से ही आरोप लगने लगे थे कि राज्य सरकार और पुलिस ने एक साजिश के तहत इन लोगों को मरवा दिया है। मानवाधिकार संगठनों ने भी इस मामले को लेकर अदालत के दरवाजे खटखटाए थे। इस पर उच्च न्यायालय ने विशेष जांच दल (एसआईटी) से मामले की तहकीकात कराई थी। इस रिपोर्ट में मुठभेड़ को लेकर कई सवाल उठाए गए। इसके बाद उच्च न्यायालय ने इस मामले में सीबीआई जांच के आदेश दे दिए थे।
हालांकि, उच्च न्यायालय के इस आदेश को राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। लेकिन, उच्च न्यायालय के आदेश पर सर्वोच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। सीबीआई ने अपनी पड़ताल में पाया है कि इशरत जहां और उसके साथ मारे गए लोगों की मुठभेड़ एकदम फर्जी थी। इन्हें एक नियोजित साजिश के तहत मरवाया गया। ताकि, राजनीतिक संदेश यही जाए कि एक खास समुदाय से जुड़े लोग दंगों का बदला लेने के लिए मोदी की हत्या कराना चाहते हैं।
सीबीआई को आईबी के वरिष्ठ अधिकारी राजेंद्र कुमार की भूमिका आपराधिक लगी है। ऐसे में, उसने इस अधिकारी के खिलाफ आपराधिक जांच के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय से अनुमति मांगी थी। लेकिन, कई कारणों से मंत्रालय ने यह अनुमति नहीं जारी की। क्योंकि, इस प्रकरण को लेकर सीबीआई और आईबी के बीच मतभेद गंभीर हो जाने का खतरा पैदा हुआ है। राजेंद्र, 1979 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं। वे 2001 से 2005 तक अहमदाबाद में ही तैनात थे। आरोप है कि राजेंद्र कुमार ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से काफी नजदीकी बना ली थी। इसीलिए वे भी इस साजिश में हिस्सेदार बन गए थे। दरअसल, इस मामले की जांच कर रहे सीबीआई के अधिकारी राजेंद्र कुमार पर लंबे समय से दबाब डाल रहे थे कि वे अपने उस सूत्र की जानकारी दें, जिसके जरिए उन्हें सूचना मिली थी कि इशरत जहां और उनके साथी मोदी की हत्या की साजिश के तहत अहमदाबाद पहुंच गए हैं। तमाम दबाव के बावजूद उन्होंने सीबीआई को अपने सूत्र की पहचान नहीं बताई। इस पर सीबीआई ने उन्हें आरोपी बनाने की तैयारी की। इसी के तहत गृह मंत्रालय से अनुमति मांगी गई थी।
लेकिन, इस प्रकरण में सीबीआई और आईबी के बीच टकराव बढ़ने लगा तो मंत्रालय ने अनुमति के मामले में चुप्पी साध ली। हालांकि, कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता चाहते रहे हैं कि सीबीआई को खुलकर अपना काम करने दिया जाए। अब तैयारी की जा रही है कि राजेंद्र कुमार के रिटायरमेंट का इंतजार कर लिया जाए। उल्लेखनीय है कि वे 31 जुलाई को सेवानिवृत होने वाले हैं। इसके बाद सीबीआई को मुकदमा चलाने के लिए किसी अनुमति की जरूरत नहीं पड़ेगी। सीबीआई सूत्रों के अनुसार, तत्कालीन गृह राज्य मंत्री अमित शाह को पहले से ही जानकारी थी कि फर्जी मुठभेड़ के नाम पर क्या किया जाने वाला है? इस संदर्भ में सीबीआई अमित शाह से भी यह जानना चाहती है कि उन्होंने मुठभेड़ के पहले अपने मुख्यमंत्री मोदी को जानकारी दी थी या नहीं? उल्लेखनीय है कि बहुचर्चित सोहराबुद्दीन के विवादित मामले में अमित शाह पहले से ही शक के दायरे में हैं। उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। अदालत के निर्देश के चलते उन्हें ‘तड़ीपार’ होकर गुजरात के बाहर लंबे समय तक प्रवास करना पड़ा था। लेकिन, अब उन्हें अदालत से ही काफी राहत मिल गई है।
इधर, भाजपा की राजनीति में शाह के ‘गॉड फादर’ माने जाने वाले मोदी का रुतबा काफी बढ़ गया है। कोशिश हो रही है कि अगले लोकसभा चुनाव में उन्हें एनडीए के तरफ से प्रधानमंत्री पद का चेहरा बना दिया जाए। यह अलग बात है कि इस पहल को लेकर पार्टी के अंदर भी मतभेद चल रहे हैं। खासतौर पर वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और उनका गुट, मोदी के बढ़े रुतबे को पचा नहीं पा रहा है। गोवा में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मोदी को चुनाव प्रचार अभियान समिति की कमान सौंप दी गई है। इससे साफ हो गया है कि भाजपा नेतृत्व ने अगले चुनाव के लिए मोदी को अपना ‘चेहरा’ बनाने का स्पष्ट संकेत दे दिया है।
पार्टी में ‘पॉवरफुल’ होते ही मोदी ने अपने खास सिपहसालारों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दिला दी हैं। इसी के तहत पूर्व गृह राज्य मंत्री अमित शाह को पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनवाकर उन्हें उत्तर प्रदेश का संगठन प्रभार दिला दिया है। जबकि, अमित शाह विवादित छवि के नेता हैं। मोदी की तरह उनकी भी छवि धुर हिंदुत्ववादी नेता की है। 2002 के गुजरात दंगों में उनकी भूमिका को लेकर तमाम आरोप लगते रहे हैं। उत्तर प्रदेश संगठन का प्रभार मिलते ही शाह ने तेजी दिखाई है। इसी बीच इशरत जहां मुठभेड़ कांड सुर्खियों में आ गया है। 4 जुलाई को सीबीआई अपना आरोप पत्र भी दाखिल करने जा रही है। सूत्रों के हवाले से मीडिया में कई दिनों से इस आशय की खबरें तैर रही हैं कि इस मामले में सीबीआई अमित शाह के साथ मोदी को भी लपेटने वाली है। इसके लिए प्राथमिक तौर पर कुछ साक्ष्य मिलने का दावा किया जा रहा है। जिसके आधार पर मोदी से पूछताछ की इजाजत मिल सके।
भाजपा के वरिष्ठ नेता रविशंकर प्रसाद कहते हैं कि कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता एक बड़ी साजिश के तहत इस मामले में सीबीआई का दुरुपयोग कर रहे हैं। ताकि, उनके लोकप्रिय नेता मोदी को बदनाम कराया जा सके। रविशंकर प्रसाद का सवाल है कि यदि इशरत जहां निर्दोष थी, तो फिर उसका नाम आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की सूची में कैसे था? क्योंकि, इशरत जहां की मौत पर लश्कर-ए-तैयबा की वेबसाइट में उसे ‘शहीद’ बताया गया था। यह सारी जानकारी सीबीआई को भी है। लेकिन, अब राजनीतिक साजिश के तहत इन तथ्यों को नकारा जा रहा है। क्योंकि, कांग्रेस नेतृत्व मोदी के खिलाफ घृणा प्रचार के अभियान में लगी है।
सीबीआई ने इशरत जहां मामले में गुजरात पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक पीपी पांडे को भी आरोपी बनाया है। वे इन दिनों सीबीआई से बचते घूम रहे हैं। सीबीआई ने फर्जी मुठभेड़ मामले में पांडे को मुख्य किरदार माना है। कहा जा रहा है कि पांडे ने मोदी और शाह के प्रति अतिरिक्त वफादारी दिखाने के लिए फर्जी मुठभेड़ की व्यूह रचना की थी। भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय की फटकार लगने के बाद भी यूपीए सरकार सीबीआई का दुरुपयोग करने से बाज नहीं आ रही। सरकार की इसी भूमिका से नाराज होकर अदालत ने सीबीआई को पिंजरे में बंद तोता करार किया था। फटकार खाने के बाद कैबिनेट ने ‘तोते’ को मुक्त करने की बात कही है। लेकिन, उन्हें शक है कि वास्तव में सीबीआई को सरकार अपने चुंगल से मुक्त करेगी?
दरअसल, मुठभेड़ मामले में सीबीआई की जांच टीम ने एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की गवाही को काफी महत्वपूर्ण माना है। इस अधिकारी ने अपनी गवाही में कहा है कि सफेद दाढ़ी वाले एक और काली दाढ़ी वाले एक नेता को मुठभेड़ के पहले ही सब कुछ पता था। काली दाढ़ी से आशय अमित शाह से लगाया गया, जबकि सफेद दाढ़ी का आशय नरेंद्र मोदी से समझा गया। इन बातों से चिढ़कर भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि सरकार एक बार फिर ‘तोते’ का इस्तेमाल
कर रही है। क्योंकि, उसे नरेंद्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता से डर लगने लगा है। केंद्रीय राज्यमंत्री मनीष तिवारी ने कहा है कि पहले भाजपा नेतृत्व यह तय कर ले कि उसे सीबीआई में भरोसा है या नहीं? क्योंकि, ये लोग अलग-अलग अवसरों पर सीबीआई के बारे में भिन्न राय बताते हैं। सफेद दाढ़ी और काली दाढ़ी वाले प्रकरण से चिढ़कर भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने यहां तक कटाक्ष कर डाला कि काली दाढ़ी वाले राहुल गांधी भी हो सकते है और सफेद दाढ़ी वाले मनमोहन सिंह भी तो हो सकते हैं? इस तरह से इशरत जहां प्रकरण को लेकर दोनों दलों के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है।
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।





