वीरभद्र सिंह द्वारा छठी बार हिमाचल के मुख्यमंत्री का पद सँभालने से रिक्त हुए मंडी संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव में उनकी पत्नी व कांग्रेस की प्रत्याशी प्रतिभा सिंह की विजय को अप्रत्याशित विजय तो कतई नहीं कहा जा सकता. मैंने अपने अनेक आलेखों में उनकी विजय के साथ उनके द्वारा उनके पिछले आंकड़े को पार करने की सम्भावना व्यक्त की थी. हाँ, इस विजय में विशेष बात यह रही कि जहाँ २००४ में पूर्व सांसद प्रतिभा सिंह ने इस क्षेत्र से ६६ हजार मतों से विजय प्राप्त की थी, वहीँ २००९ में स्वयं वीरभद्र सिंह मात्र १३ हजार मतों की बढ़त लेकर लोकसभा की सदस्यता मिलना संभव हुआ था.
इस उपचुनाव में प्रतिभा सिंह ने लगभग १ लाख ३६ हजार मत की बढ़त लेकर सभी को हैरत में डाल दिया है. ११ लाख २३ हजार मतदाताओं वाले इस संसदीय क्षेत्र से पांच बार मुख्यमंत्री रहनेवाले वीरभद्र सिंह की मात्र १३ हजार की बढ़त से विजय प्राप्त करने के बाद से ही उनके अपने ही दल में उनके विरोधियों ने उनको कुंदधार वाला नेता समझ समेटने का प्रयास करना आरम्भ किया था. यही नहीं विगत वर्ष उनके पुत्र विक्रमादित्य जो प्रदेश युवाकांग्रेस के सीधे चुनाव में विजय प्राप्त कर चुके थे, का चुनाव भी निरस्त करवाया. अपने ही दल में विरोधियों की मार झेल रहे वीरभद्र सिंह ने चुनाव से पूर्व प्रदेश के संगठन की कमान जिस प्रकार प्राप्त की और अपने कुशल नेतृत्व से सत्तासीन भाजपा को पराजित करते हुए कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाया यह किसी से छुपा नहीं है.
देवभूमि हिमाचल के अधिकतर मतदाता कांग्रेस और भाजपा में बंटे हुये हैं जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने-अपने दल के पक्ष में ही मतदान की परम्परा को निभाते आये हैं. शेष रहे तटस्थ मतदाताओं द्वारा निर्णायक भूमिका निभाते हुए विभिन्न कारणों से इधर-उधर मतदान करने से ही प्रदेश में सरकार बनती और बदलती हैं. अपने बलबूते पर चुनावों से पूर्व प्रदेश के संगठन की कमान और प्रदेश की सत्ता पर छठी बार काबिज होनेवाले वीरभद्र सिंह के लिए व्यक्तिगत रूप से यह उपचुनाव अवश्य ही प्रतिष्ठा और भविष्य की इबारत लिखने वाला साबित होगा. मंडी संसदीय क्षेत्र के इस उपचुनाव में विजय प्राप्त कर वीरभद्र सिंह एकसाथ अनेक राजनीतिक लक्ष्य भेदने में सफल रहे हैं.
सिराज को छोड़ शेष सभी १६ विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त लेकर एक ओर जहाँ वीरभद्र सिंह अपने विरोधियों को पटखनी देते हुए यह सन्देश देने में सफल रहे हैं कि प्रदेश में उनके मुकाबले का एक भी ऐसा नेता नहीं है जिसे मासलीडर की संज्ञा दी जा सके. वहीँ इस संसदीय क्षेत्र पर अपनी तगड़ी पकड़ बना भविष्य में भी इस संसदीय क्षेत्र को अपने परिवार के सदस्य के लिए सुरक्षित क्षेत्र बताने में सफल रहे हैं. इसके साथ ही हिमाचल की राजनीति के कुशल खिलाड़ी वीरभद्र सिंह ने इस उपचुनाव द्वारा दो विधायकों की नींद अवश्य ही उड़ाई है. अपने ही दल के विरोधी गुट के नेता जो विधानसभा के चुनावों के दौरान अपने ही क्षेत्र में कैद रहकर स्वयं के लिए महज २ हजार की बढ़त ही जुटा पाए थे, वहीँ से अब कांग्रेस ने ९ हजार छः सौ की बढ़त ली है. यह वीरभद्र सिंह के व्यक्तित्व का ही करिश्मा है कि वहां से वीरभद्र सिंह के नाम पर बढ़त का आंकड़ा १० हजार के करीब तक गया. दूसरी खतरे की घंटी जोगिन्दर नगर विधानसभा क्षेत्रों से भाजपा के स्तम्भ कहे जानेवाले विधायक के लिए है, जो अभी महज छह माह पूर्व साढ़े पांच हजार से अधिक मतों से विजयी हुए थे, के क्षेत्र से अब कांग्रेस ने बढ़त लेते हुए २०१४ के चुनावों की दिशा सुदृढ़ करने का प्रयास किया है.
वहीँ दूसरी ओर प्रदेश की सत्ता के संघर्ष में पराजित हुई भाजपा अभी तक सत्ता जाने के दुःख से ही उभर नहीं पाई है. विधानसभा चुनावों तक चलते रहे पार्टी की अंतर्कलह और अंतर्द्वंद में उलझी रही प्रदेश भाजपा आज तक उन कारणों को समझ उसके निराकरण के कारगर उपाय करने में अक्षम रही है. उसके ईमानदार और कर्मठ कार्यकर्त्ता आज भी असमंजस और उहापोह की स्थिति में हैं. सत्ता में रहते हुये भी जो दल इस संसदीय क्षेत्र के पांच विधानसभा क्षेत्रों पर सिमट कर रह गया हो, उसने इस उपचुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस का किस बूते पर मुकाबला किया होगा यह नतीजों से स्पष्ट होता है. महेश्वर सिंह जैसे कद्दावर नेता के भाजपा से जाने के बाद इस लोकसभा क्षेत्र में पैदा हुई शून्यता को भरने के लिए भाजपा के पास कोई ऐसा नेता नहीं है जो कांग्रेस का मुकाबला करने में सक्षम हो. हाँ, यदि विपक्षी दल भाजपा ने जनवरी माह में ही अपना प्रत्याशी तय करके उसे दल-बल के साथ प्रचार में उतारा होता तो आज परिस्थिति कांग्रेस के लिए इतनी सरल ना होती.
एक बात तो हमें समझ लेनी चाहिए कि लोकतंत्र में चुनाव जीतने के लिए लड़े जाते हैं ना कि कोई रस्म अदा करने के लिए. पूर्व सांसद और भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रहे कुल्लू के महेश्वर सिंह और सुन्दरनगर से भाजपा के पूर्व मंत्री रूपसिंह द्वारा भाजपा से अलग अपनी राह चुनने का खामियाजा भाजपा विगत विधानसभा के चुनावों में भुगत चुकी है, जब उसके मिशन रिपीट को उसके ही नेताओं के विद्रोह के कारण डिफीट में बदल दिया गया था. देश की राजनीतिक परिस्थिति के सर्वे चाहे जो भी हों, हिमाचल की राजनीतिक बयार अभी भी कांग्रेस के पक्ष या यूँ कहिये कि वीरभद्रसिंह के पक्ष में ही बहती दिखाई देती है.
कांग्रेस व भाजपा के नेताओं को इतना तो समझ लेना चाहिए कि नामांकन पत्र दाखिल करते समय या रैली में एकत्रित भीड़ से प्रत्याशियों की हारजीत सुनिश्चित नहीं की जा सकती. विजय सुनिश्चित होती है कुशल नेतृत्व और कर्मठ कार्यकर्ताओं के अनथक प्रयासों से जिनके चलते मतदान केन्द्रों के बाहर लगी लंबी कतारों को स्वपक्षीय मतों में तब्दील करना संभव होता है. सत्ता प्राप्ति के पश्चात् जुगाड़ या पैराशूट के माध्यम से पदों पर काबिज कार्यकर्ता सत्ता से मिलने वाले लाभ के हकदार तो हो सकते हैं, परन्तु मतदाताओं से दूर का भी रिश्ता बनाने में वह असफल सिद्ध होते हैं. पांच माह पूर्व बनी कांग्रेस की सरकार के कारण जहाँ उसके कार्यकर्ताओं का जोश स्पष्ट दिखाई देता है, वहीँ सत्ताच्युक्त भाजपा के कार्यकर्ताओं में अभी भी जोश के बनिस्पत रोष अधिक दिखाई देता है. भाजपा के नेताओं को यह समझना होगा की कार्यकर्ताओं में जोश भरे बिना २०१४ की वैतरणी पार करना असम्भव है.
लेखक विनायक शर्मा साप्ताहिक 'अमर ज्वाला' के संपादक हैं.





