Qamar Waheed Naqvi : मित्र रामदत्त त्रिपाठी ने एक बहुत ही गम्भीर और ज्वलन्त प्रश्न उठाया है. उन्होंने लिखा है कि 'कभी-कभी मुझे लगता है कि मीडिया आजकल कुछ ज़्यादा ही नकारात्मक हो गया है. क्या आपको भी ऐसा ही लगता है?' जी, बिलकुल लगता है. कारण क्या है? त्रिपाठी जी की वाल पर जो जवाब मैंने लिखा है, वह यहाँ भी दे रहा हूँ:
— नकारात्मकता भ्रष्टाचार, अपराध, अत्याचार, सामाजिक तनाव, ऊंच-नीच, संघर्ष, आर्थिक विषमताओं और मूल्यों के पतन की ख़बरों में नहीं होती. नकारात्मकता होती है सोच में. इन घटनाओं को हम किस प्रकार रिपोर्ट करते हैं और रिपोर्ट करते समय क्या कहते हैं, कैसे जुमले इस्तेमाल करते हैं और अपनी संस्थाओं के प्रति आस्थाओं को किस प्रकार ध्वस्त करते हैं, इन बातों से फैलती है नकारात्मकता.
वरना तो समाज में बुराइयाँ हर समय, हर युग में ऐसी ही रही हैं, लेकिन समाज इतना नकारात्मक पहले कभी नहीं था. आजकल ऐसे जुमले रोज़ फ़ेसबुक पर सुनता हूँ— सब साले चोर हैं; जब तक पकड़े न जायँ, तभी तक ईमानदारी है; भाई वह ईमानदार इसीलिए हैं कि अब तक पकड़े नहीं गये. यह नकारात्मकता हमारी चेतना में गहरे तक पसरी बैठी है, इसलिए जब हम पत्रकार के तौर पर कुछ रिपोर्ट करते हैं तो उससे केवल नकारात्मकता ही फैलती है.
दूसरी बात यह कि हम यह मानने लगे हैं कि जो भी पुराना है, वह सब बकवास और बेकार है. इसलिए हमारे मनों को साँत्वना देने और आशा जगाने के लिए हमारे पास कुछ बचा नहीं क्योंकि उजास दे सकने वाले सारे दीयों को हमने आउटडेटेड, ओल्ड फैशंड, अनुपयोगी, अप्रासंगिक मान कर विसर्जित कर दिया है. इसलिए अब जब बात अँधेरे की होती है तो उसके बीच उजाले की कहीं कोई क्षीण-सी किरण भी नहीं दिखती और अगर कहीं दिखती भी है तो हम उसको मक्कार, बगुलाभगत और ईमानदारी का चोगा पहने ढोंगी घोषित कर नकार देते हैं. फिर कहाँ से आयेगी सकारात्मकता?
वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी के एफबी वॉल से साभार.





