: चौबीस साल में यूपी में तो उबर नहीं सकी, अब बिहार-झारखंड में रसातल की ओर : लगता है, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अपनी प्रतिद्वन्दी दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी के लिए जमीन को अधिक उपजाऊ बनाकर स्वयं रसातल में जाने की ऐसी मनोदशा की शिकार है, जिसकी अनुभूति शायद उसे स्वयं नहीं होती। जिस कांग्रेस की नींव 1858 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के बाद ब्रिटिश हुकूमत के प्रति भारतीयों में बफादारी का बीजारोपण करने के लिए इटावा में तत्कालीन ब्रिटिश कलक्टर ए.ओ. ह्यूम ने रखी थी, वही पार्टी जंग-ए-आजादी का प्रमुख स्तंभ बनी, और ह्यूम के मन्तव्य सहित समूचे ब्रिटिश हुकूमत को रसातल में पहुंचाने वाली हुई।
आजादी के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को भारतीय गणराज्य में लम्बे समय तक एकछत्र साम्राज्य रहा। इस बीच वामपंथ और दक्षिणपंथ के अंकुर प्रस्फुटित होने लगे थे, क्षेत्रीय समस्याओं और विचारों के आधार पर क्षेत्रीय दल प्रभुत्व में आने लगे थे, आज हालात ये हो गये हैं कि वयोवृद्ध भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस क्षेत्रीय दलों का सहारा बनने के नाम पर खुद ‘असहाय’ बनकर गिर रही है। फलस्वरूप दक्षिणपंथी भरतीय जनता पार्टी के लिए उपजाऊ धरातल मिल जाता है। इसका मुख्य कारण मनोभाव का सही ढंग से मूल्यांकन न कर पाना है।
भारत का हृदय कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश में 1989-1990 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने मुलायम सिंह यादव (क्षेत्रीय दल) को सहारा (समर्थन) देकर ऐसा उपकृत किया कि आज 24 साल में भी कांग्रेस नहीं उभर पाई है। भाजपा को उर्वरा जमीन तो मिली ही, अंततोगत्वा तमिलनाडु में डीएमके और अन्नाडीएमके की तरह यूपी में सपा-बसपा पारस्परिक विकल्प के रूप में स्थापित हुए। यूपी की तर्ज पर अब बिहार और झारखंड कांग्रेस का ताजा प्रयोग भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित होगा।
बिहार में 17 वर्षीय राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के बिखराव का सियासी लाभ लेने के लिए नितीश सरकार का कांग्रेस द्वारा समर्थन तथा अप्रत्यक्ष रूप से सहयोगी राजद नेता लालू प्रसाद से विश्वासघात, आखिर बिहारियों के मनोभावों को किस दिशा में ले जायेगा। बिहार की जनता की विचारधारा कांग्रेस, यूजद, राजद के सशक्त विकल्प भाजपा के प्क्ष में स्वतः बनती दिख रही है, जो वक्त आने पर लहर बनकर सियासी सुनामी लायेगी। विहार का विभाजित भूखंड ‘‘झारखण्ड’’ में कांग्रेस की मौजूदा रणनीति भी आत्मघाती साबित होगी। झामुमो के साथ लोकसभा सीटों के सौदेबाजी के साथ होने वाला करार झाारखंडियों के चिन्तन को नई दिशा देगा।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में भाव-प्रवाह वोट के रूप में जनादेशात्मक अभिव्यक्ति देता है, जिसे भांपना स्वार्थ और महत्वाकांक्षा से लवरेज राजनेताओं की समझ से परे है।
देवेश शास्त्री का विश्लेषण.





