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‘हंस’ में नक्सली हिंसा को लेकर राजेंद्र यादव के संपादकीय पर राजीव रंजन प्रसाद का जवाब

: नक्सली हिंसा हिंसा न भवति : हंस का जुलाई  अंक पढा। संपादकीय पढने के बाद लगा कि रिटायरमेंट की एक उम्र तय होनी चाहिये।  छोडिये, सचिन ही कब रिटायर होना चाहते हैं तो राजेन्द्र यादव की पारी भी जारी रहे। चर्चा पर उतरने से पहले राजेन्द्र यादव के बस्तर विषयक ज्ञान की गहरायी को उनके ही शब्दों में बयान करते हैं – “विडम्बना यह है कि हम यहाँ दिल्ली में एक एयरकंडीशनर कमरे में बैठ कर उनके बारे में बात कर रहे हैं जिनसे हमारा सीधा सम्बन्ध नहीं रहा। आज वहाँ के हालात की जमीनी जानकारी हमें नहीं है इसलिये हमारे लिये यह बैद्धिक और वैचारिक विमर्श है”।

: नक्सली हिंसा हिंसा न भवति : हंस का जुलाई  अंक पढा। संपादकीय पढने के बाद लगा कि रिटायरमेंट की एक उम्र तय होनी चाहिये।  छोडिये, सचिन ही कब रिटायर होना चाहते हैं तो राजेन्द्र यादव की पारी भी जारी रहे। चर्चा पर उतरने से पहले राजेन्द्र यादव के बस्तर विषयक ज्ञान की गहरायी को उनके ही शब्दों में बयान करते हैं – “विडम्बना यह है कि हम यहाँ दिल्ली में एक एयरकंडीशनर कमरे में बैठ कर उनके बारे में बात कर रहे हैं जिनसे हमारा सीधा सम्बन्ध नहीं रहा। आज वहाँ के हालात की जमीनी जानकारी हमें नहीं है इसलिये हमारे लिये यह बैद्धिक और वैचारिक विमर्श है”।

जी महोदय तो हाथी का कौन सा अंग दिखा सींग पकड़ में आयी या खुर देखे? यह ठीक है कि राजेन्द्र यादव माओवाद के समर्थक हैं और इस लिये वे बस्तर के दरभा में हुए हत्याकाण्ड को जस्टीफाई करना चाहते हैं लेकिन घडियाली ही सही दो आँसू अपने सम्पादकीय में उनके लिये भी बहा लेते जो निर्दोष मारे गये। राजेन्द्र यादव लिखते हैं तो सर्वज्ञ की तरह जबकि वे स्वीकारते हैं कि जमीनी हकीकत में टांय टांय फिश हैं लेकिन दावा देखिये निर्णायक स्टेटमेंट – “सलमा जुडुम को कभी आदिवासियों का समर्थन नहीं मिला, कर्मा और विश्वरंजन इसके मेन इंजीनियर थे”।

कर्मा और विश्वरंजन की बात बाद में करते हैं पहले यह तो बतायें राजेंद्र जी आपके जुडुम में यह “सलमा” कौन है? हमने बस्तर में सलमा जुडुम जैसा कुछ सुना नहीं अलबत्ता सलवा जुडुम अवश्य सक्रिय रहा था। पहले “सलमा” पर ही बात हो जाये क्योंकि वास्तविक तथ्य सामने रखे नहीं कि आप कहेंगे अरे यह मामला था, हमने समझा कि वहाँ का कोई लोकल जलसा होगा और नचनिया सलमा को यूपी से बुलवाये रहे होंगे।  
 
राजेन्द्र यादव बस्तर में हुई दरभा घाटी की घटना पर इंटरव्यू शैली में आँखों देखा हाल धकेल मारते हैं और साफ करते हुए लिखते हैं कि “कर्मा इस हमले का टारगेट था क्योंकि उसने सलमा जुडुम चलाया था। एक और बात दिखाई देती है कि छत्तीसगढ सरकार नें इस दल का रूट बदलवाया था; बदले हुए रूट की जानकारी कहाँ से निकली है?……मारे गये लोगों में तीस लोग बताये जाते हैं जिसमे पाँच-छ: कांग्रेस के बडे नेता हैं। इनमे कुछ सुरक्षा गार्ड भी जरूर हताहत हुए होंगे”। पहली बात कि “मारे गये होंगे” का क्या मतलब है? देश भर में पढी जाने वाली पत्रिका के सम्पादक हैं आप, तो जिम्मेदारी से कोई तथ्य प्रस्तुत करते दिक्कत क्यों है? इस लिये कि सुरक्षा कर्मियों को गाली देते-देते तो प्रगतिशील राजनीति बीत गयी अब वो मारे भी गये तो क्या? किसी छोटे से छोटे अखबार को भी उठा कर एयरकंडीशनर ऑन करने के बाद पढने की जहमत उठाते तो विस्तार से जानकारी मिल जाती।

मेरा प्रश्न इससे बड़ा है। क्या राजेन्द्र यादव जानते हैं कि परिवर्तन यात्रा अगर दूसरे मार्ग से निकली होती तब भी उस पर हमला हुआ होता और शायद और भी भयावह तरीके से? लगभग सौ सागवान के पेड़ राजेन्द्र यादव जी के पर्यावरण प्रिय क्रांतिकारियों ने काट कर इस दूसरे रास्ते में एन घटना के समय गिरा दिये गये थे। इस रास्ते में भी एम्बुश लगाया गया था और दंतेवाडा तथा जगदलपुर को जोडने वाले मार्ग पर एक महत्वपूर्ण पुल को दोनो ओर से आधा आधा काट कर रखा गया था जिससे यदि यात्रा इस मार्ग से भी गुजरे तो उसका वही हश्र हो जो दरभा घाटी में हुआ था। ये सभी जानकारियाँ तो सार्वजनिक हैं लेकिन राजेन्द्र जी के घर अखबार कौन सा आता है पता नहीं; हो सकता है कोई “जनचेतना का प्रगतिशील समाचार दैनिक” हो कि जो हमको हो पसंद वही न्यूज छपेगी।  
 
अब आते हैं उन तथ्यों पर जिसे राजेन्द्र यादव विमर्श कह रहे हैं। वे लिखते हैं कि “जहाँ अन्याय होगा और कहीं सुनवाई नहीं होगी तो लोग बंदूख उठायेंगे ही” इस ब्लाईंड स्टेटमेंट के जस्टीफिकेशन में वे लिखते हैं “इसे अराजक कहना ठीक नहीं। उनकी हिंसा में एक अनुशासन है। आज अगर अनुशासन नहीं होता तो वो इतना बढ नहीं सकते थे। अरुन्धति राय, गौतम नवलखा बहुत अंदर तक उनके साथ गये हैं और कई दिन तक उनके बीच रहे हैं; उन्होंने उनके बीच देखे जिस अनुशासन की प्रसंशा की है उसके बिना शायद इतने बडे कदम उठाये ही नहीं जा सकते थे”। सही है राजेन्द्र जी आपकी बात का मायना मैं निकालता हूँ कि हंस के सम्पादक के अनुसार अनुशासित नक्सलियों ने विद्याचरण शुक्ल, महेन्द्र कर्मा, (नंद कुमार पटेल और उनके बेटे) आदि आदि कांग्रेसी नेताओं की हत्या का प्रसंशनीय बडा कदम उठाया। आपके छोडे ‘फिल इन द ब्लैंक’ का तो यही मायना निकलता है।

कई प्रगतिशील, मुख्यधारा में बहने वाले लेखकों ने भी सोशल मीडिया से ले कर अखबारों तक लगातार हत्या का कारण महेन्द्र कर्मा के लिये सलवाजुडुम को और विद्याचरण शुक्ल को इमरजेंसी का अपराधी बता कर जस्टीफाई करते रहे (पटेल और उनके बेटे की हत्या को गोल कर गये।)। राजेन्द्र जी बस्तर बढिया पिकनिक स्पॉट भी है, घूम आते एक-आध बार। क्या बार बार अरुन्धति राय और गौतम नवलखा के लिखे की धौंस जमाते रहते हैं। क्या आपने वेरीफाई किया है उनकी जानकारियों को? अच्छा लिखा हैं उन्होंने खास कर अरुन्धति का वाकिंग विद द कॉमरेड्स। बारीक जानकारी है कि नक्सली क्या खाते हैं, क्या पीते हैं, कहाँ सोते हैं, कहाँ धोते हैं आदि आदि। सम्पादक महोदय जरा इन किताबों को फिर से पलटिये और तलाशिये तो कि बस्तर के आदिवासी कैसे जी रहे हैं, किस तरह घुट घुट कर मर रहे हैं अगर कहीं दिख ही जाये आपको। आप भी तो जानें कि नक्सली और आदिवासी दो अलग अलग बाते हैं और इन्हें आप जैसे लोगों की फंतासियाँ ही एक इकाई प्रचारित करने में लगी हुई हैं।  
 
आपको व्यवस्था से शिकायत है तो हमे भी है लेकिन हमें नक्सलियों से भी शिकायत है और आप उनके सिद्ध हिमायती हैं इसलिये मुझे आपके लिखे को इतिहास ज्ञान के साथ टटोलना ही होगा। राजेन्द्र जी लिखते हैं कि आदिवासी-इलाकों से निकाले जाने वाले खनिजों के लिये करोडो अरबों का को लेन देन होता है, उसमे आदिवसियों का किसी तरह से भी कोई लेना देना नहीं होता। एक सौ प्रतिशत सत्य (राजेन्द्र जी सही कहें तो सहमत होना फर्ज है मेरा)।

आपका संपादकीय दरभा घाटी की घटना पर केन्द्रित है अत: मैं बस्तर से इतर बात नहीं करूंगा। वहाँ बैलाडिला आईरन ओर परियोजना है जिसकी नींव तो अंग्रेजों के समय ही रखी गयी थी लेकिन प्रारंभ हुई 1968 से। इस परियोजना का मुख्यालय हैदराबाद बनाया गया अर्थात तत्कालीन नक्सलगढ आन्ध्रप्रदेश के हृदय क्षेत्र में; हमने तो इसके खिलाफ उनकी कोई हूक तब नहीं सुनी? 1966 में बस्तर के मान्य जनप्रतिनिधि प्रवीर चन्द्र भंजदेव की हत्या हुई, हमे कोई जानकारी नहीं कि तब वारंगल को अपना गढ बना चुके नक्सलियों ने प्रतिरोध का स्वर भी बुलंद किया था। सत्तर के दशक में बस्तर मे किरंदुल गोलीकांड हुआ और बैलाडिला में कार्यरत सैंकडो मजदूरों पर गोली चालन किया गया; कोई जानकारी हो नक्सलियों की ओर से प्रतिरोध की तो साझा कीजिये?

अस्सी का दशक आने से पहले अबूझमाड़ को ले कर बस्तर के तत्कालीन कलेक्टर ब्रम्हदेव शर्मा नें निर्णय लिया कि इसे जिन्दा मानव संग्रहालय में बदल दिया जाये। न कोई भीतर जायेगा न बाहर आयेगा। उन्हें जीने दो उनकी जिन्दगी। ठीक है बहुत से प्रगतिशीलों को उनका निर्णय सही लगता होगा लेकिन फिर आन्ध्र प्रदेश में जब नक्सलियों के खिलाफ दमनात्मक कार्यवाईयाँ आरंभ हुई और वहाँ से कैडर अबूझमाड मे छिपने-भरने लगे तब आपके विरोध के स्वर कहाँ थे? क्यों यह आवाज़ नहीं आई कि मानव संग्रहालय है क्रांतिकारी महोदयो इसे छोड कर भी बहुत सी जगह खाली है बस्तर में? बस्तरिया हूँ इस लिये मेरी मत पढिये अरुन्धति की ही पढिये, नन्दिनी सुन्दर की ही पढिये और तभी भी यही आप जानेंगे कि कोंडापल्ली सीतारमैया नें पीपुल्स वार ग्रुप के गुरिल्लों को बस्तर इस लिये नहीं भेजा था कि “वीर गुरिल्लाओं वहाँ बहुत शोषण और अत्याचार है चलो उनके लिये लडते हैं”। यहाँ नक्सली इसलिये घुसे क्योंकि वे सुरक्षित पनाह चाहते थे जिसकी आधारशिला अबूझमाड में उनके स्वागत के लिये ही रखी गयी थी।  
 
छोडिये इतिहास में क्या रखा है? राजेन्द्र यादव जी कह रहे हैं तो बस्तर में चार-पाँच सौ खदाने तो जरूर होंगी? नहीं!! तो सौ पचास तो पक्का? इतनी भी नहीं? तो फिर? बैलाडिला तो दुनिया जानती है, रावघाट रिजर्व ओर है लेकिन अभी उत्पादन नहीं हुआ इसलिये अगले संपादकीय तक इसे भी छोडिये। अब मुझे केरल राज्य से भी बडे क्षेत्र बस्तर संभाग की खदाने गिनवाईये। ग्रेनाईट और लाईमस्टोन की कुछ गिनती की क्वेरिया अवश्य हैं लेकिन हमने तो यहाँ से नहीं सुना कि डिन, बॉक्साईत, हीरा, जस्ता अथवा यूरेनियम निकाला जा रहा हो। यह सब कुछ है बस्तर की धरती में।

बोधघाट परियोजना अर्थात इन्द्रावती पर बांध बनने वाला था वह भी कुछ गैर सरकारी संगठनो और पर्यावरणवादियों के विरोध के कारण बंद हुआ और इसमे भी नक्सलियों की कोई भूमिका नहीं थी (आज जरूर वे नहीं बनने देंगे जैसे नारे लगाते पाये जाते हैं)। एक महोदय ने लिखा कि टाटा के साथ एमओयू हुआ इस कारण नक्सलवाद प्रबल हुआ। महाज्ञानी आन्ध्रप्रदेश में उसी समय चन्द्रबाबू नायडू के चलाये जा रहे अभियान को भूल जाते हैं जिसके दबाव में बहुत बडी संख्या में वहाँ के कैडर लाल-आतंकवाद की बनाई सुरक्षित पनाहगाह अबूझमाड में प्रविष्ठ हुए। राजेन्द्र जी बस्तर के भीतर भी उसकी अपनी आवाज़ जिन्दा है और वहाँ से भी शोषण, दमन और कॉरपोरेट दखल के खिलाफ आवाज़े उठती रही हैं लेकिन शस्त्र उठाने की नौबत क्यों? अगर टाटा बस्तर में काम नहीं कर पा रहा तो इसके लिये स्थानीय दबाव को धत्ता बता कर पूरा श्रेय आप नक्सलियों को दे देंगे; हद है?  
 
क्या आप जानते हैं कि सलवा जुडुम को ले कर बस्तर के भीतर भी कई स्वर पनप रहे थे। यह भी सच है कि सलवा जुडुम शुरु पहले हुआ और उसका नेतृत्व महेन्द्र कर्मा ने लपक लिया और बाद में प्रदेश की सरकार का भी समर्थन इसे प्राप्त हुआ। इस समय एक धडा अगर महेन्द्र कर्मा के साथ था तो दूसरा खिलाफ भी। इनकार नहीं कि सलवा जुडुम की परिकल्पना आदिवासियों की नक्सलियों के खिलाफ लामबंदी थी लेकिन विभीषिका यह कि दोनो ओर से आदिवासी ही एक दूसरे को मार काट रहे थे जिसका तमाशा नक्सलियों ने और व्यवस्था ने खूब देखा (राजेन्द्र जी इन समयों में आपके संपादकीयों की कमी बडी खली कहाँ गायब रहे?)।

सलवा जुडुम और नक्सलवाद दोनो ओर से हुई हत्याओं का विस्तार से वर्णन करने के लिये तो यह आलेख छोटा है लेकिन यह भी आप जाने कि सलवा जुडुम के खिलाफ जो लडाई मुखर हुई है वह उन स्थानीय पत्रकारों के द्वारा लाये निकाले गये समाचारों के कारण ही हुई जिसने इस आन्दोलन कहे जाने वाली आदिवासी लामबंदी के राजनीतिक और अराजक पक्षों से सभी को परिचित कराया। एसी घटनायें हाथो हाथ अखबारों की सुर्खियाँ बनी और कई प्रगतिशील मासिकों ने इन्हें खूब प्रसारित किया। राजेन्द्र जी उन्हीं पत्रकारों ने नक्सलियों की करतूतो को भी अनेको बार सामने लाने का कार्य किया। कैसे हर घर से बच्चों को शामिल किया गया, महिलाओं की क्या स्थिति है, आदिवासियों के कैसे उन्होंने घर जलाये, किस तरह जन अदालतों में सजा देने के नाम पर जन-भय व्याप्त करने के लिये नृशंसता से गले काटे गये। ये वो खबरे थी जो दिल्ली में एयरकंडीशनर में विमर्श करने वालों के लिये मायने नहीं रखती थीं और उसपर प्रगतिशील फतबाधारी कि जागते रहो सब ठीक चल रहा है।

राजेन्द्र यादव किस आधार पर लिखते हैं यह तो पता नहीं लेकिन उनके अनुसार “नक्सली जिन क्षेत्रों पर कब्जा करते हैं वहाँ विकास, शिक्षा, संगठन उनकी प्राथमिकता होती है”। जी सर जी समझ गये हम; आपने सुदूर संवेदन तकनीक से यह जान लिया होगा या हमे जानकारी नहीं मिली होगी और कभी आप “टेरर टूरिज्म” पर हो ही आये होंगे बस्तर। आपकी मासूमियत का तो मैं कायल हो गया, कितनी सफेदपोशी से आप नक्सली हिंसा को जस्टीफाई करते हुए लिखते हैं – “नक्सलियों के लिये यह अधिकारों और सिद्धांतो की लडाई है। लडाई कैसी भी हो इसमे मारे तो मासूम और निरीह भी जाते हैं”। राजेन्द्र जी कमाल की आईडियोलॉजी है न मौतो को जस्तीफाई करने वाली? पुलिसिया कार्यवाई में भी निरीह और मासूम मारे जा रहे हैं और उसकी हम पुरजोर भर्तसना करते हैं और हम एसा कर पाते हैं क्योंकि हम नक्सली हत्याओं की भी भर्त्सना करते हैं।

वैसे आप ही सही हैं, कहते हैं पुराना चावल स्वादिष्ट होता है, रसीला भी होता ही होगा। आप अपने संपादकीय में मानते हैं कि इसी देश का एक वर्ग दूसरे हिस्से में चल रही जमीनी लडाईयों के बारे में कुछ भी नहीं जानता” और फिर आप ही सार्टिफिकेट भी बाँटते हैं कि “नक्सलियों की लडाई जल, जंगल और जमीन की सामूहिक लडाई है”। राजेन्द्र जी यह वाक्यांश सुनने में बडा ही ओजस्वी लगता है (काश एसा ही होता)। आपने कुछ और लडाईयाँ नहीं सुनी जैसे माओवादियों का ओडिसा कैडर, आन्ध्र कैडर से असंतुष्ट है या एमसीसी और पीडब्ल्युजी जैसे खांचे अभी भी मजबूत हैं। छोडिये आप साहित्यकार हैं इसलिये किताब ही पढिये। इसी कोलकाता पुस्तक मेले में शोभा मांडी नाम की एक पूर्व नक्सली महिला की पुस्तक “एक नक्सली की डायरी” सामने आयी थी; पढिये इसे भी, बलात्कार और शोषण की परिभाषा फिर चाहे नयी गढ लीजियेगा। फस्ट हैंड इंफॉर्मेशन है।

…..और अगला संपादकीय भी बस्तर पर ही लिखिये; चाहें तो तरुण भटनागर जैसे किसी युवा कहानीकार की रचनात्मकता का गला दबाईये अगर वह जंगल के भीतर का कोई सच लिख लाये (पिछले साल का सपादकीय आपका ही)। कोई “जुडुम” महफिल सजाईये राजेन्द्र जी और जरा जोर से बजवाईये – सज रही देखो “सलमा” चुनर गोटे में पर ध्यान से, ढोल फट न जाये, पोल खुल न पाये। सही ही मानते हैं आप कि “नक्सली हिंसा हिंसा न भवति”।

राजीव रंजन प्रसाद का विश्लेषण.

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