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लखनऊ

पीसीएस हरि शंकर पांडेय मामले में सरकार के दावे झूठे, ये रहे सही तथ्य

: मेरे आवास पर प्रेस कांफ्रेंस में प्रस्तुत तथ्य (साक्ष्य और अभिलेख सहित) :  हरि शंकर पाण्डेय द्वारा ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के घोटालों और विभाग के निदेशक उमा शंकर के उम्र घटाने सम्बंधित जांच पर राज्य सरकार आधिकारिक रूप से बयान दे कर उन्हें गलत और तथ्यों से परे बताया है. मैं इस सम्बन्ध में सरकार के दावे और वास्तविकता को आपके सामने रख रही हूँ-

: मेरे आवास पर प्रेस कांफ्रेंस में प्रस्तुत तथ्य (साक्ष्य और अभिलेख सहित) :  हरि शंकर पाण्डेय द्वारा ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के घोटालों और विभाग के निदेशक उमा शंकर के उम्र घटाने सम्बंधित जांच पर राज्य सरकार आधिकारिक रूप से बयान दे कर उन्हें गलत और तथ्यों से परे बताया है. मैं इस सम्बन्ध में सरकार के दावे और वास्तविकता को आपके सामने रख रही हूँ-

1. सरकारी दावा- पाण्डेय ने कैग के रिपोर्ट की बात कही जबकि यह कैग की नहीं महालेखाकार उत्तर प्रदेश इलाहाबाद की रिपोर्ट है   
   
सच्चाई-  जैसा कि रिपोर्ट के पहले पन्ने पर ही लिखा है यह भारत के नियंत्रक महालेखाकार परीक्षक की रिपोर्ट है. भारत के नियंत्रक महालेखाकार परीक्षक  को ही अंग्रेजी में Comptroller and Auditor General अर्थात कैग कहते हैं. कैग की प्रत्येक राज्य में एक शाखा होती है तथा उत्तर प्रदेश में यह शाखा इलाहाबाद में है. अतः यह रिपोर्ट पूरी तरह कैग की रिपोर्ट हुई.

2. सरकारी दावा-  इस रिपोर्ट में या 21 दिसंबर 2012 को महालेखाकार की अध्यक्षता में हुई बैठक के कार्यवृत्त में घोटाला शब्द का उल्लेख नहीं है
   
सच्चाई-  कैग रिपोर्ट घोटाला शब्द का अलग से प्रयोग नहीं करता. इस रिपोर्ट में मात्र लेखा परीक्षण के बाद आये तथ्य अंकित किये जाते हैं. इन तथ्यों से ही तमाम घोटालों की बातें आगे चल कर सामने आती हैं. अतः यह कहना कि यदि “घोटाला” शब्द का प्रयोग नहीं है तो घोटाला नहीं है, पूरी तरह गलत और भ्रामक है. वैसे भी कैग ने अपने रिपोर्ट के सार संक्षेपण में कई बार “आदेशों के विपरीत कार्य करना”, “भारत सरकार के निर्देशों का उल्लंघन करना”, वित्तीय अधिकारों के उल्लंघन में कार्य करना, समयपूर्व तकनीकी स्वीकृति गलत ढंग से देना, अनियमित ढंग से कार्य आवंटन, फर्जी सेक्युरिटी डिपोजिट का प्रयोग होना, गलत ढंग से शर्तों में ढील देना, अनियमित खर्च होना, ठेकेदारों को गलत लाभ दिया जाना जैसे शब्दों का बार-बार प्रयोग किया है. ये सभी शब्द घोटाले के ही पर्याय हैं. इसके अलावा कैग रिपोर्ट में कई स्थानों के भैतिक सत्यापन और वहाँ पायी गयी अनियमितताओं का विस्तार से विवरण भी दिया गया है और कई मामलों में तस्वीरें भी रिपोर्ट में लगाई गयी है. जाहिर है यही सब घोटाला होता है, अलग से घोटाला शब्द का प्रयोग करने की जरूरत नहीं होती है.

3. सरकारी दावा- ड्राफ्ट रिपोर्ट का फाइनल होना बाकी है
 
सच्चाई- यह सही है कि अभी रिपोर्ट की प्रक्रिया चल रही है पर जब ड्राफ्ट रिपोर्ट में इतनी गंभीर और स्पष्ट अनियमितताएं सामने आ गयी हैं तो फिर उनका संज्ञान क्यों नहीं लिया जा रहा है, शासन जानबूझ कर उनकी अनदेखी क्यों कर रहा है?

4. सरकारी दावा- सचिवालय की कार्यप्रणाली के इतर रिपोर्ट की प्रतियां मुख्य सचिव आदि को सौंपी
   
सच्चाई -यह शासन का आतंरिक प्रशासनिक मामला है पर एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में हमें नहीं लगता कि यदि कोई व्यक्ति किसी घोटाले की रिपोर्ट बड़े अधिकारियों को भेज देता है तो इसमें भी कोई गडबडी या अनियमितता मानी जानी चाहिए. सच तो यह है कि उस अधिकारी को अच्छे ढंग से और पूरी ईमानदारी से अपना कार्य पूरा करने के लिए पुरस्कृत करना चाहिए, ना कि किसी वरिष्ठ अधिकारी को रिपोर्ट भेजने के लिए दण्डित करना चाहिए. शासन के इन शब्दों से स्पष्ट है कि वह कभी चाहती ही नहीं थी कि यह मामला सामने आये बल्कि यह चाहती थी कि मामला नीचे के अधिकारियों में दबा रह जाए.

5. सरकारी दावा- ग्रामीण अभियंत्रण निदेशक उमा शंकर की जन्मतिथि 25/10/1957 है, उसे संशोधित या बदला नहीं गया है
   
सच्चाई–यह बात पूरी तरह गलत है. 16 जून 2009 के हरेन्द्र वीर सिंह, विशेष सचिव, ग्रामीण अभियंत्रण के आदेश से उमाशंकर की जन्मतिथि 25/10/1951 की जगह 25/10/1957 किया गया, यानि छः साल कम किया गया. इस बारे में उत्तर प्रदेश शासन  की 28 मई 1974 की उत्तर प्रदेश सेवा में भर्ती (जन्म दिनांक का अवधारण) नियमावली बहुत स्पष्ट है जिसके नियम 2 के कहा गया है- “किसी सरकारी सेवक का जन्म दिनांक जैसा कि उसके हाई स्कूल या समकक्ष परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाने के प्रमाण पत्र में अभिलिखित हो, यथास्थिति उसका ठीक जन्म दिनांक या आयु समझी जायेगी तथा ऐसे दिनांक या आयु को सही (करेक्शन) करने के बारे में कोई आवेदन पत्र या अभ्यावेदन किन्ही भी परिस्थितियों में, चाहे जो भी हों, ग्रहण नहीं किया जाएगा.” इस साफ़ नियमावली के बाद भी उमा शंकर के मामले में सेवा के कई साल बाद उनका आवेदन गलत ढंग से स्वीकार किया गया और उसमे परिवर्तन किया गया जबकि इससे पूर्व 04/01/1995 को जारी अंतिम ज्येष्ठता सूची  और पुनः 14/12/2001 को जारी अंतिम ज्येष्ठता सूची में उनकी जन्मतिथि 25/10/1957 थी और उनके द्वारा उन अवसरों पर कोई भी आपत्ति नहीं की गयी और ना ही कोई प्रत्यावेदन ही दिया गया था. यह भी जानने योग्य बात है कि उमा शंकर की मूल आयु सम्बंधित पत्रावली भी गायब है. इस प्रकार सेवा के कई सालों बाद अचानक उमा शंकर की जन्मतिथि में नियमावली के विरुद्ध छह साल का परिवर्तन सीधे-सीधे अनियमितता है जिसे हरि शंकर पाण्डेय ने उजागर किया.
 
नोट— मैंने विभाग के घोटाले के बारे में वर्तमान में जनपद न्यायाधीश के सामने एफआईआर दर्ज करने के लिए मुक़दमा कर रखा है जिसमे जल्दी ही आदेश अपेक्षित है. आयु परिवर्तन मामले में मेरे प्रार्थनापत्र को सही मानते हुए सीजेएम ने प्रकरण का संज्ञान लिया है और अभी उसमे परिवाद लंबित है.

नूतन ठाकुर
पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्त्री
लखनऊ

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