लोकसभा के चुनाव में भले अभी 10 महीने का समय बाकी हो, लेकिन प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपने चुनावी तीर-तुक्कों की तैयारी युद्ध स्तर पर करनी शुरू कर दी है। खास तौर पर कांग्रेस और प्रमुख विपक्षी दल भाजपा के उस्ताद तरह-तरह की रणनीतियां तैयार करने में जुट गए हैं। राजनीतिक विचारधारा पर किसी का ज्यादा जोर नहीं है। बस, लक्ष्य एक ही है कि किसी तरह 2014 में केंद्र की सत्ता हासिल हो जाए। भले ही कैसे भी हथकंडे अपनाने पड़ें? कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार पिछले नौ सालों से सत्ता में है। लेकिन, 2009 से इस सरकार की जो दूसरी पारी शुरू हुई है, वह राजनीतिक रूप से सुकूनभरी नहीं रही।
रिकॉर्ड महंगाई बढ़ने के साथ ही सरकार बड़े-बड़े घोटालों और महाघोटालों के खुलासों की मार से बहुत ‘लहूलुहान’ हो चुकी है। इसके बाद भी कांग्रेस नेतृत्व उम्मीद बांधे हुए है कि जैसे-तैसे यूपीए ही सत्ता की तीसरी पारी खेलने में कामयाब हो जाएगा। क्योंकि, मजबूत विकल्प की दावेदारी करने वाले एनडीए के अंदर आपस में ही लठ्ठम-लठ्ठ की स्थिति बनती जा रही है।
यानी, कांग्रेस नेतृत्व को रणनीतिक रूप से अपने किए-धरे पर कम, भाजपा की कमजोरियों पर ज्यादा उत्साह दिखाई पड़ता है। दरअसल, पिछले कई महीनों से एनडीए के अंदर विवादित नेता नरेंद्र मोदी की संभावित नई भूमिका पर बहस चलती आ रही है। संघ नेतृत्व की खास पहल पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अगले चुनाव में ‘पीएम इन वेटिंग’ का चेहरा बनवाने की कवायद शुरू हुई। इसको लेकर एनडीए के प्रमुख घटक जदयू ने अल्टीमेटम दे दिया था। क्योंकि, धुर हिंदुत्ववादी छवि वाले मोदी को लेकर जदयू नेतृत्व की आशंका यही रही है कि इसके चलते बिहार में उनका मुस्लिम वोट बैंक खिसक सकता है। कई महीनों तक इस मुद्दे पर दोनों दलों के बीच खींचतान चलती रही। अंतत: भाजपा और जदयू का गठबंधन मोदी मुद्दे पर ही टूट गया। जबकि, पिछले 17 सालों से दोनों दलों के बीच गठबंधन चला आ रहा था।
भाजपा नेतृत्व ने जदयू के अल्टीमेटम की परवाह न करके मोदी को चुनाव अभियान समिति की कमान सौंप दी थी। इसी के बाद ये साफ हो गया कि मोदी के मुद्दे पर भाजपा नेतृत्व दबाव में नहीं आएगा। गुजरात में दंगों के दौरान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि पर तमाम दाग-धब्बे लगे। इन दंगों के बाद ही उनकी छवि ‘हिंदुत्ववीर’ वाली बनी थी। संघ परिवारियों ने उन्हें ‘हिंदू ह्रदय सम्राट’ भी कहना शुरू किया था।
दंगों के बाद गुजरात में जबरदस्त सामाजिक ध्रुवीकरण की राजनीति हुई। इसके चलते मोदी वहां पर लगातार तीन चुनाव जीतकर, जीत का सिकंदर बन गए। उनके नेतृत्व में भाजपा ने यहां तीसरी बार धमाकेदार जीत हासिल की, तो दबाव बढ़ गया कि अब उनकी सेवाएं राष्ट्रीय राजनीति में बड़े किरदार के रूप में ली जाएं। हालांकि, मोदी को ‘चेहरा’ बनाने के मुद्दे पर भाजपा के अंदर ही काफी मतभेद रहे हैं। यहां तक कि पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी भी मोदी के बढ़े कद को पचा नहीं पा रहे।
आडवाणी को मनाने में संघ प्रमुख मोहन भागवत की भूमिका खास रही है। संघ प्रमुख की मनुहार के बाद भी मोदी को लेकर आडवाणी आज भी सहज नहीं माने जा रहे। लेकिन, इतना जरूर हुआ है कि कई दिनों तक ‘कोपभवन’ में विराजने के बाद, अब वे पार्टी के कार्यक्रमों में एक बार फिर सक्रिय हो गए हैं। दूसरी तरफ, तमाम दबावों को धता बताकर मोदी अपनी नई भूमिका के लिए एकदम तैयार हो गए हैं। 18 जून को उन्होंने पार्टी के मुख्यालय में संगठन के महासचिवों के साथ मंत्रणा की थी। इसमें मोटे तौर पर बातचीत हुई थी कि लोकसभा चुनाव के लिए क्या खास-खास राजनीतिक फंडे अपनाए जाएं? जिनके जरिए कांग्रेस नेतृत्व को करारी राजनीतिक मात दी जा सके।
आज (4 जुलाई) पार्टी मुख्यालय में नरेंद्र मोदी एक बार फिर रणनीतिक मामलों पर पार्टी पदाधिकारियों के साथ बैठक करने वाले हैं। इसमें लोकसभा चुनाव के साथ पांच राज्यों में होने वाले चुनाव की रणनीति पर चर्चा करेंगे। दरअसल, अगले कुछ महीनों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली व मिजोरम में विधानसभा चुनाव होने है। लोकसभा चुनाव के ठीक पहले होने वाले ये चुनाव राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण समझे जाते हैं। क्योंकि, इन चुनावों के परिणामों से लोकसभा के चुनाव एक हद तक प्रभावित हो सकते हैं। इन चुनावी राज्यों में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी राजनीतिक जंग तय है। महज, मिजोरम में राजनीतिक हालात कुछ अलग हैं। विधानसभा के इन चुनावों को लोकसभा के पहले का ‘सेमीफाइनल’ भी कहा जा रहा है।
इन चुनावों की इतनी खास अहमियत को देखकर भाजपा और कांग्रेस के रणनीतिकार केंद्रीय स्तर पर तैयारियां करा रहे हैं। दोनों दलों ने तैयारियों के लिए दर्जनों उप समितियां बना दी हैं। माना जा रहा है कि पांच राज्यों के चुनाव में धन बल का कुछ ज्यादा ही बोलबाला रहेगा। क्योंकि, दोनों दलों ने एक ही लक्ष्य तय किया है कि जीत चाहिए, चाहे वह किसी कीमत पर मिले। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भाजपा की सत्ता है। जबकि, दिल्ली और राजस्थान में कांग्रेसी सरकारें हैं। चारों राज्यों की चुनावी चुनौती ने दिग्गज नेताओं की चिंता भी बढ़ा दी है। ‘सेमीफाइनल’ में जीत दर्ज कराने के लिए मोदी ने गुजरात के अपने तमाम राजनीतिक प्रयोगों को दोहराने का मन बनाया है। वे संबंधित राज्यों के क्षत्रपों का भी पूरा विश्वास जीतने में लगे हैं। जबकि, कांग्रेस धर्म-निरपेक्षता की नीति का हवाला देकर मोदी का ‘डर’ बढ़ा-चढ़ा कर प्रचारित करना चाहती है। ताकि, कम से कम अल्पसंख्यक वोट पूरी ताकत से भाजपा के विरोध में जुटे नजर आएं।
भाजपा रणनीतिकारों को यह लगने लगा है कि यदि दिल्ली की सत्ता पानी है, तो इसका रास्ता यूपी से होकर ही गुजरेगा। यहां पर लोकसभा की 80 सीटें हैं। अयोध्या आंदोलन के दौर में भाजपा को यहीं से राजनीतिक ‘संजीवनी’ मिली थी। लेकिन, अब भाजपा के लिए यहां हालात अच्छे नहीं रहे। पिछले चुनाव में यहां भाजपा को महज 10 सीटें ही मिल पाई थीं। मोदी के सिपहसालारों को अच्छी तरह मालूम है कि यदि इस प्रदेश में पार्टी के हालात नहीं सुधरे, तो प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने का सपना कभी पूरा नहीं हो सकता। पिछले दिनों दबंग नेता मोदी ने अपने खास सिपहसालार अमित शाह को इस प्रदेश का प्रभारी महासचिव बनवा दिया था। मोदी के लिए यहां राजनीतिक जमीन ‘उर्वरा’ करने के लिए शाह जुट गए हैं। वे लगातार दौरे कर रहे हैं।
दो दिन बाद वे अयोध्या भी जाने वाले हैं। माना जा रहा है कि शाह लखनऊ, अयोध्या व वाराणसी जैसी सीटों का जायजा ले रहे हैं, ताकि ‘सुरक्षित’ संसदीय क्षेत्र से मोदी को लड़ाया जा सके। रणनीति यही है कि मोदी, इस प्रदेश से चुनाव लड़ेंगे, तो एक बार फिर यहां पर पार्टी के लिए अयोध्या आंदोलन जैसे दिन देखने को मिल सकते हैं। जबकि, कांग्रेस के रणनीतिकार अपनी सरकार के कामकाज पर ज्यादा भरोसा न करके, मोदी के मुद्दे पर ज्यादा उम्मीद लगाए बैठे हैं। उनकी रणनीति यही है कि अल्पसंख्यकों को ‘मोदी खतरे’ के बारे में ज्यादा से ज्यादा चेता दिया जाए, ताकि बात बन जाए। कांग्रेसी उस्तादों को यही लग रहा है कि मौजूदा स्थितियों में तीसरे मोर्चे का विकल्प सिर्फ हवा में है। एनडीए को मोदी का ही ‘ग्रहण’ लगा है। ऐसे में, तमाम विपरीत स्थितियों में भी यूपीए को तीसरी पारी खेलने का मौका मिल सकता है। सो, सभी दिग्गजों ने अपने तीर-तुक्कों के तरकश कस लिए हैं। वे चुनावी ‘आखेट’ के लिए मौके की तलाश में हैं।
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।





