यह इस प्रदेश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी इस प्रदेश के भ्रष्ट अफसरों के चंगुल में फंस गये। उन्होंने प्रदेश के सभी आईएएस और पीसीएस अफसरों को तैनात करने की कमान उस दागी अफसर को सौंप दी है जिसे भ्रष्टाचार के आरोप में पहले ही तीन साल की सजा हो चुकी है। इन प्रमुख सचिव नियुक्ति राजीव कुमार और तीन अन्य अफसरों के खिलाफ अब ग्रामीण अभियंत्रण सेवा के विशेष सचिव हरिशंकर पाण्डेय ने मुकदमा भी दर्ज करा दिया है।
उल्लेखनीय है सरकार बनने के बाद प्रमुख सचिव नियुक्ति के पद पर राजीव कुमार को तैनात किये जाने से सरकार पर तमाम उंगलियां उठीं थीं। कुछ महीने बाद ही सीबीआई कोर्ट ने नोएडा प्लाट आवंटन घोटाले में राजीव कुमार को तीन साल की सजा सुना दी। सजा सुनाने के बाद सरकार ने उन्हें कुछ दिन के लिये हटाया और जब राजीव कुमार अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए हाईकोर्ट गये और स्टे लाये तो सरकार ने उन्हें फिर प्रमुख सचिव नियुक्ति बना दिया।
सभी लोग इस बात से हैरान थे कि पारदर्शिता की बात करने वाले मुख्यमंत्री आखिर इस भ्रष्ट अफसर पर इतने मेहरबान क्यों हैं। इन लोगों को कहना था कि भले ही राजीव कुमार को कोर्ट से स्टे मिला हो मगर उन्हें बेदाग साबित नहीं किया गया है। ऐसे में एक दागी और बेईमान अफसर प्रदेश के सभी अफसरों को कैसे तैनात कर सकता है।
इस मामले को लेकर उच्च न्यायालय में एक याचिका भी दायर की गयी। इस याचिका में कहा गया कि जब दो साल की सजा पाने के बाद कोई व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता तो तीन साल की सजा पाने के बाद कोई आईएएस नौकरी कैसे कर सकता है। इस लिए राजीव कुमार को नौकरी से बर्खास्त किया जाना चाहिए। सरकार की तरफ से कई अधिवक्ताओं ने सामूहिक रूप से कहा कि चूंकि इस मामले में स्टे हो गया है इसलिए इस याचिका को खारिज किया जाना चाहिए।
मगर अदालत ने राज्य और केन्द्र सरकार दोनों को इस मामले में नोटिस जारी कर दी है। राजीव कुमार ने इस दौरान प्रदेश में छांट-छांट कर भ्रष्ट अफसरों को तैनात करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जो अफसर पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के समय में पैसे देकर प्राइम पोस्टिंग पाते रहे वही अफसर इस सरकार में भी सबसे मलाईदार पद पर तैनात कर दिये गये। क्योंकि वह प्रमुख सचिव नियुक्ति के दुलारे थे और उन्हें आर्थिक रूप से फायदा पहुंचाते थे।
इस दौरान जिस-जिस अफसर ने ईमानदारी से काम करने की कोशिश की उसे उसका नुकसान भी उठाना पड़ा। ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के विशेष सचिव हरी शंकर पाण्डेय ने ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के एक हजार करोड़ से अधिक घोटाले का खुलासा किया था और सरकार को रिपोर्ट भेजी थी। पहले तो हरीशंकर पाण्डेय पर ही इस रिपोर्ट को बदलवाने का दबाव डाला गया और जब वह नहीं माने तो उनके विरूद्ध ही चार्जशीट दे दी गयी। हरीशंकर पाण्डेय की छवि ईमानदार अफसर की है। उन्होंने प्रमोशन होने के बावजूद आईएएस सेवा में न जाने का निर्णय लेकर सनसनी फैला दी थी।
जब राजीव कुमार ने उन्हें नोटिस भेजा तो उन्होंने नौकरी से ही त्यागपत्र दे दिया। मगर इस त्यागपत्र को स्वीकार करने की जगह उनको नोटिस दे दिया गया कि जब कोई जांच चल रही हो तो त्यागपत्र नहीं दिया जा सकता। इन आला अफसरों की बेशर्मी और निरंकुशता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस नोटिस को तामील कराने के लिए पचास पुलिस कर्मी हरीशंकर पाण्डेय के निवास पर भेज दिये गये। सरकार के इस फैसले से सनसनी फैल गयी। लोगों ने कहा कि इस तरह के काम तो मायावती सरकार में होते थे मगर अब अखिलेश सरकार भी मायावती सरकार की राह पर जाती दिखाई दे रही है।
इन सबसे दबाव में आने की जगह हरीशंकर पाण्डेय थाना गोमती नगर में प्रमुख सचिव नियुक्ति राजीव कुमार, प्रमुख सचिव समाज कल्याण संजीव दुबे और प्रमुख सचिव ग्रामीण अभियंत्रण सेवा अशोक कुमार पर कागजों में हेराफेरी करने और फंसाने का आरोप लगाते हुए गोमतीनगर थाने में इन लोगों के खिलाफ एफआईआर लिखने के लिए प्रार्थना पत्र दिया है। जिसके बाद हड़कंप मच गया है।
विभिन्न संगठनों ने मांग की है कि प्रमुख सचिव नियुक्ति के पद से राजीव कुमार जैसे भ्रष्ट अफसर को तत्काल हटाया जाये क्योंकि प्रमुख सचिव नियुक्ति ही प्रदेश के सभी उपजिलाधिकारी, अपर जिलाधिकारी, मुख्य विकास अधिकारी,
जिलाधिकारी जैसे प्रमुख पदों पर तैनाती का प्रस्ताव तैयार करता है। ऐसे में जब वह खुद दागदार होगा तो किसी ईमानदार अधिकारी की तैनाती कैसे कर पायेगा। पूरी नौकरशाही में इस बात की भी जबर्दस्त चर्चा है कि मुख्यमंत्री कड़ा फैसला लेकर राजीव कुमार को हटायेंगे या इन भ्रष्ट अफसरों के दबाव में आ जायेंगे।
लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और वीकएंड टाइम्स हिंदी वीकली के प्रधान संपादक हैं.
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