: कारपोरेट मीडिया का सच -3 : फिलहाल मीडिया की एबीसी इस प्रकार की हो चुकी है- ए माने एडवरटाइजमेंट, बी माने बॉलीवुड, सी माने क्रिकेट। यही वजह से क्रिकेट में हुए एक भी घोटाले को मीडिया ने उजागर नहीं किया। सिर्फ राजनीतिक ही नहीं, मीडिया घराने भी परिवारवाद और एकाधिकारवाद के शिकार हो रहे हैं। उनके बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में कंपनियों के नुमाइंदे घुस आए हैं। बंगाल में दो साल के भीतर 7 नए अखबार खुले। असल में ये चिटफंड कंपनियों के सेल्स काउंटर थे। सुदीप्तो सेन का घोटाला सामने आने के बाद सबके सब औंधे मुंह गिरे। दैनिक जागरण के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में रियल एस्टेट, मैक्डोनल्ड्स, टैक्स कंसल्टेंट्स और सीए नजर आएंगे।
एक बड़े हिंदी अखबार समूह के बोर्ड में मीडिया गुरु और विज्ञापन एजेंसियों के प्रतिनिधि रखे गए हैं। इन सभी को खबरों और आम लोगों के सरोकार से कोई लेना-देना नहीं। जब स्विट्जरलैंड के दावोस में हुए वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में भारतीय उद्योग परिसंघ और देश का वाणिज्य मंत्रालय 200 चुनिंदा पत्रकारों को प्रायोजित कर सकता है तो यह समझना मुश्किल नहीं कि कॉर्पोरेट्स आज किस हद तक मीडिया में एजेंडा सेट करने में जुटे हैं। लोकतंत्र के चौथे खंबे में विज्ञापन और कंटेंट में कोई फर्क नहीं रह गया है।
टीवी पर भी तकरीबन हर कार्यक्रम कोई न कोई कॉर्पोरेट घराना एंडोर्स करता है। हर चैनल पर आपको बिजनेस लीडर अवार्ड जैसे प्रायोजित कार्यक्रम चलते मिलेंगे। आने वाले समय में मीडिया में कॉर्पोरेट मोनोपॉली (एकाधिकारवाद) की स्थिति बन जाएगी। मुकेश अंबानी के रिलायंस ग्रुप ने इनाडु, सीएनबीसी, नेटवर्क-18 और सीएनएन-आईबीएन जैसे चैनलों को खरीदकर इसकी शुरुआत कर दी है। आने वाले दिनों में अगर शेयर बाजार लुढ़के तो हालत और बिगड़ेगी। तो जनाब, टमाटर के भाव ऐसे ही सुर्ख होंगे, लेकिन मीडिया सवाल नहीं उठाएगा और न ही पत्रकार कुछ बोलेंगे। कहां से बोलें? सभी मीडिया घराने तो पत्रकारों को अनुबंध पर नौकरी देने लगे हैं। पत्रकारों की आजादी दांव पर है। पत्रकारों के यूनियन तेजी से बंद हो रहे हैं। अगर किसी अखबार ने पत्रकार को नौकरी से निकाला तो सिवाय उसके सामने चुप रहने के और कोई विकल्प नहीं है।
हालात पर काबू पाने के दो तरीके हैं : एक मीडियाकर्मियों को अपना कौशल, तकनीकी समझ और नेटवर्किंग को मजबूत करना होगा, ताकि वे अपनी बात कहने के लिए डिजिटल फोरम में विकल्पों तलाश सकें। इसी से जुड़ा दूसरा तरीका मीडिया में रहकर ही कॉर्पोरेट के एकाधिकारवाद से जूझने का है। इसके बिना पत्रकारिता को बचा पाना मुश्किल है। किसान खुदकुशी करेंगे, बच्चे भूख और कुपोषण से मरते रहेंगे और सरकार कॉर्पोरेट्स को पांच लाख करोड़ की टैक्स छूट देगी, पर मीडिया सवाल नहीं उठाएगा। इसलिए, क्यों कि हमारा मीडिया राजनीतिक रूप से आजाद तो है, पर मुनाफे के फंदे में कैद है।
जाने-माने पत्रकार पी. साईनाथ द्वारा विकास संवाद की तरफ से आयोजित मीडिया संवाद में दिए गए भाषण का अंश.
प्रस्तुति- सौमित्र राय
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