Qamar Waheed Naqvi : बहुत से लोगों ने इस विषय में कई बार सवाल पूछे हैं कि सम्भावना सही है या संभावना? सम्बन्ध लिखना ठीक है या संबंध? हिन्दी या हिंदी, उत्तराखण्ड या उत्तराखंड? दरअसल, यह सवाल काफ़ी पुराना है. और सच कहें तो यह सवाल भी हिन्दी को "आधुनिक", सरल (यानी Less Complicated) व "टेक्नाॅलाॅजी फ़्रेण्डली" (वैसे मैं फ़्रेंडली भी लिख सकता था) बनाने के दौर में ही शुरू हुआ. यह भी तर्क दिया गया कि "आधा म" या "आधा न" के मुकाबले अनुस्वार कम स्थान लेता है, इसलिए शीर्षक लगाने, कैप्शन लिखने में तो आसानी होगी ही, साथ ही "बाॅडी काॅपी" में भी कुछ जगह बचेगी, जिससे उसी स्थान में अपेक्षाकृत ज़्यादा सामग्री दी जा सकेगी.
इसी स्कूल के लोगों ने उस समय उर्दू शब्दों में नुक़्ता न लगाने की पुरज़ोर वकालत भी की और अपने प्रयास में सफल भी हुए. इसी तरह, टाइपराइटर के की बोर्ड में "बटनों" की संख्या को सीमित रखने के इरादे से "हाॅकी" को "हाकी", "डाॅक्टर" को "डाक्टर", "आँटी" को "आंटी", "पाँव" को "पांव", "अँधेरा" को "अंधेरा" और "अन्धेर" को "अंधेर" लिखे जाने की शुरुआत हुई. "हँस" (Laugh) और "हंस" (पक्षी) का भेद समाप्त हो गया और यह पाठक की बुिद्ध पर छोड़ दिया गया कि वह सन्दर्भ के अनुसार तय करे कि बात हँसने के बारे में हो रही है या हंस पक्षी की. इसी तरह, उर्दू शब्द "राज़" (RAAZ) और हिन्दी शब्द "राज" (RAAJ) में नुक़्ते की अनुपस्थिति में अन्तर कर पाना असम्भव हो गया.
हिन्दी भाषा देवनागरी लिपि में लिखी जाती है, जो अपने आप में अत्यन्त वैज्ञानिक लिपि है.
"कवर्ग" (यानी क ख ग घ ङ के अन्त में "ङ"), "चवर्ग" (यानी च छ ज झ ञ के अन्त में "ञ"), "टवर्ग" (यानी ट ठ ड ढ ण के अन्त में "ण"), "तवर्ग" (यानी त थ द ध न के अन्त में "न") और "पवर्ग" (यानी प फ ब भ म के अन्त में "म") से ही परम्परागत देवनागरी में अनुनासिक ध्वनि को व्यक्त किया जाता है.
जैसे यदि हमें घण्टा लिखना हो तो "आधा ण" से अनुनासिक ध्वनि आयेगी, क्योंकि "घण्टा" में "ट" अक्षर "टवर्ग" का है. इसी तरह, इस वर्ग के बाक़ी अक्षरों से बनने वाले शब्दों में भी अनुनासिक ध्वनि के लिए आधा "ण" आयेगा. जैसे: डण्डा, खण्ड, कण्ठ, पण्ढरपुर आदि.
इसी तरह "तवर्ग" के शब्दों में आधा "न" से अनुनासिक ध्वनि आयेगी. जैसे: अन्त, चिन्ता, मन्थर, कन्द, मन्द, अन्धड़, बन्धन, सन्देह आदि.
"पवर्ग" से बनने वाले शब्दों में आधा "म" से अनुनासिक ध्वनि आयेगी. जैसे कम्पन, चम्बल, कम्बल, दम्भ, चम्पा, खम्भा आदि.
अब "सम्बन्ध" शब्द को लें. इसे अगर रोमन स्क्रिप्ट में लिखें तो लिखेंगे: SAMBANDH. लेकिन जब हम इसी शब्द को "संबंध" लिखते हैं, तो निस्सन्देह "सम्बन्ध" के मुकाबले यह कम स्थान घेरता है, लेकिन "संबंध" में हम M और N दोनों ध्वनियाँ अनुस्वार से ही व्यक्त करते हैं जो तकनीकी रूप से ग़लत है.
चूँकि अब "ङ" और "ञ" प्रायः सभी "की बोर्ड" से बाहर हैं और इनकी अनुनासिक ध्वनि अनुस्वार से काफ़ी निकटतम रूप से व्यक्त हो सकती है, इसलिए "कवर्ग" और "चवर्ग" के शब्दों जैसे गंगा, पंजाब, चंचल आदि शब्दों का सही उच्चारण अनुस्वार से निकल सकता है. इसलिए मेरे विचार से यहाँ अनुस्वार से काम चल सकता है.
लेकिन मैं इस मत का हूँ कि "टवर्ग", "तवर्ग" और "पवर्ग" के लिए क्रमशः "ण", "न" और "म" के प्रयोग को वापस लाया जाना चाहिए. क्योंकि इन वर्गों में अनुस्वार के प्रयोग से हम बहुत मामूली जगह बचाते हैं, पर बड़े उच्चारण दोष का ख़तरा उठाते हैं.
दूसरी बात यह कि इन वर्गों में अनुस्वार के प्रयोग से हम "की बोर्ड" के बटनों की संख्या भी नहीं घटा पाये क्योंकि आधा ण, आधा न और आधा म को "की बोर्ड" से हटाया ही नहीं जा सकता. हिन्दी के बहुत से शब्द इनके बिना लिखे ही नहीं जा सकते. जैसे: उम्मीद, निकम्मा, पुण्य, अरण्य, उन्नीस, उन्हें, पन्ना, संन्यासी आदि.
और अब टेक्नाॅलाॅजी ने भी यह सम्भव कर दिया है कि हम चन्द्र बिन्दु, नुक़्ता आदि का इस्तेमाल आसानी से कर सकते हैं तो अपनी समृद्ध उच्चारण क्षमता के लिए जानी जाने वाली हिन्दी को उसकी पुरानी गरिमा और शान-शौकत लौटाने की कोशिश क्यों न की जाय. देर आयद, दुरुस्त आयद.
अनुस्वार से जगह बच सकती है, इस तर्क से मैं क़तई सहमत नहीं हूँ. अगर आप अच्छे सम्पादक हैं तो अपने कुशल सम्पादन से आप कहीं ज़्यादा जगह बचा सकते हैं और काॅपी को कहीं ज़्यादा चुस्त बना सकते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी के फेसबुक वॉल से.






