Balendu Swami : आयरलैंड में एक बार मेरे पास एक चर्च का 70 वर्षीय पादरी आया, बोला कि "धार्मिक कारणों से औरत की समीपता संभव नहीं थी, इसलिए मैं समलैंगिक हो गया". वैसे तो धर्म समलैंगिकता की इज़ाज़त भी नहीं देता और सेक्स की वर्जना और दमन करके विकृति को उत्पन्न करता है. इसीलिये समर्थ साधू सन्यासी चेलियाँ रखकर अपनी कामपिपासा शांत करते हैं और जिन्हें नहीं मिलती वो समलैंगिक हो जाते हैं. हमारे शहर वृन्दावन के बहुत से आश्रमों में रहने वाले साधु संत आपस में ही एकदूसरे को यौनसुख देने के लिए प्रख्यात हैं.
समझ में नहीं आता आखिर क्यों धर्म अथवा धर्म से प्रभावित संघ जैसी संस्थाएं अविवाहित अथवा यौनसुख न लेने का दुराग्रह करती हैं, जोकि सबसे जादा अप्राकृतिक कृत्य है. इतिहास और वर्तमान साक्षी है प्राकृतिक इच्छाओं का इस प्रकार दमन करने वालों का चारित्रिक पतन सुनिश्चित है, तथा वह और भी विकृत रूप में सामने आता है. सत्ता और शक्ति का मद तो फिर करेला और नीम चढ़ा हो जाता है. हाँ ये बात और है कि किसी की सीडी आ जाती है तो किसी की बात दबी रह जाती है.
मध्यप्रदेश के वित्तमंत्री राघव जी के ताज़ा प्रकरण में मीडिया में कहा जा रहा है कि उन्होंने अपने नौकर के साथ अप्राकृतिक सेक्स किया. पता नहीं क्यों हमारे देश में समलैंगिक सम्बन्धों को अक्सर 'अप्राकृतिक' कहा जाता है, जबकि वैज्ञानिक कहते हैं कि 8% मनुष्य आनुवांशिक (जीन) कारणों से समलैंगिक होते हैं, और स्वभावतः प्राकृतिक रूप से उन्हें समलिंगी के प्रति ही आकर्षण होता है. असल में समलैंगिकता अप्राकृतिक नहीं बल्कि प्राकृतिक काम इच्छाओं का दमन अप्राकृतिक है.
बालेंदु स्वामी के फेसबुक वॉल से.





