एमजे अकबर के संपादकत्व वाले प्रतिष्ठित समाचारपत्र 'द संडे गार्जियन' के 6 जुलाई 2013 के अंक में मैंने एक लेख देखा. लेख का शीर्षक है- 'अखिलेश लुजेज ग्राउंड इन यूपी, मुलायम लुजेज होप'. इसमें लिखा था- 'पार्टी की कार्यप्रणाली में कुछ हद तक अराजकता घुस गयी दिखती है.' यह लेख अन्य बातों के अलावा मेरा भी उल्लेख करता है- 'उत्तर प्रदेश में अधिकारी भी अनुशासन को दरकिनार करते दिखते हैं. एक वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी हरि शंकर पाण्डेय ने तीन वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों पर उन्हें उत्पीड़ित करने का एफआईआर दर्ज करा दिया है. एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर एक भयावह नियमितता से सेवा नियमों के विरुद्ध पीआईएल दायर करते हैं.”
इस प्रकार यह लेख एक प्रकार से मुझे 'सेवा नियमों को दरकिनार करते हुए' निरंतर पीआईएल दायर करने को आरोपित कर रहा दिखता है. इसके विपरीत सत्यता यह है कि मेरी जानकारी के अनुसार कोई भी सेवा नियमावली अखिल भारतीय सेवा सहित किसी सरकारी अधिकारी को पीआईएल दायर करने से नहीं रोकती है. नियमों में कहीं भी पीआईएल दायर करने के पूर्व सरकार से अनुमति लेने का भी प्रावधान नहीं है. अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी अखिल भारतीय सेवा आचरण नियमावली 1968 से आबद्ध हैं जिसमे कुल 23 नियम हैं. मेरी पूरी जानकारी के अनुसार इनमे से कोई भी नियम एक अधिकारी को कोर्ट में पीआईएल दायर करने से ना तो रोकता है और ना ही कोई प्रतिरोध करता है.
यदि कोई निषेध है तो वह सेवा के सदस्यों द्वारा अपने कार्यों और चरित्र को निर्दोष स्थापित करने सम्बंधित नियम 17 में है, जो कहता है-“ सेवा का कोई भी सदस्य, बिना सरकार की अनुमति के अपने ऐसे शासकीय कार्यों जिनकी निंदा हुई हो अथवा जिनसे अधिकारी की मानहानि हुई हो, के सम्बन्ध में अपना पक्ष रखने के लिए किसी कोर्ट या प्रेस में नहीं जाएगा.”
अतः यह आचरण नियमावली मात्र शासकीय कार्यों में अपना पक्ष रखने के सम्बन्ध में निषेध करता है. यह भी ज्ञातव्य हो कि यहाँ भी एक अपवाद है जिसमे लिखा है- “ स्पष्टीकरण- इस नियम में यह निषेध नहीं होगा कि सेवा के किसी सदस्य को उसके निजी चरित्र अथवा उसकी निजी हैसियत में किये गए किसी कार्य के सम्बन्ध में वह अपना पक्ष प्रस्तुत करे, बशर्ते वह अपनी इस सफाई के विषय में सरकार को एक रिपोर्ट प्रस्तुत कर दे.”
इसका अर्थ यह हुआ कि निजी चरित्र अथवा निजी हैसियत में किये गए किसी कार्य के सम्बन्ध में अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए किसी पूर्व अनुमति की भी जरूरत नहीं है. इसके बाद भी द संडे गार्जियन जैसे जिम्मेदार समाचार पत्र ने अभिलेखों पर यह कहा कि एक आईपीएस अधिकारी द्वारा नियमित रूप से पीआईएल दायर करना सेवा नियमों के खिलाफ है, जो मेरी जानकारी के अनुसार त्रुटिपूर्ण कथन है.
संभव है बहुत सारे लोग इस बात को महत्वहीन मानें पर फिर भी मैंने समाचारपत्र को इस बारे में लिखा है कि यदि मेरी बात सही पायी जाए तो मेरे पक्ष को भी प्रकाशित किया जाए क्योंकि मेरी दृष्टि में हर बोले अथवा लिखे हुए शब्द को महत्व दिया जाना चाहिए और हमें कुछ भी बोलते और लिखते समय अपने शब्दों के प्रति अत्यंत सजग और जिम्मेदार रहना चाहिए. मेरा मानना है कि हम अपने देश में अपने शब्दों के प्रति जिम्मेदारी की भावना जितना अधिक विकसित करेंगे, उतने ही बेहतर नागरिक बन पायेंगे- मात्र अपने लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी.
लेखक अमिताभ ठाकुर वरिष्ठ आईपीएस अफसर हैं और लखनऊ में पदस्थ हैं. अमिताभ जनपक्षधर पुलिसिंग के लिए सतत संघर्षरत हैं और सत्ता-सिस्टम को आम आदमी के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए हर लोकतांत्रिक हथियार से लड़ाई लड़ते रहते हैं.





