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मीडिया विमर्श में नीलाभ मिश्र ने अभिव्यक्ति की चुनौतियों के प्रति किया सचेत

 आगरा। ''पत्रकारिता पेशा है या मिशन, इस तरह की बहस अब बेमानी लगती है। पत्रकारिता के पेशे में, पेशेवर होने में दक्षता  और ईमानदारी निहित है। लेकिन अब पत्रकारिता धंधा बन रही है और चीजें धंधेबाजी तक गिर गई हैं। लूट और शोषण अभिव्यक्ति को प्रभावित कर रहे हैं। सूचना का अधिकार अभिव्यक्ति के अधिकार से जुड़ा है, क्योंकि बिना सूचना के अभिव्यक्ति नहीं होती। सूचना और समाचार अपने आप में अभिव्यक्ति हैं।  पूंजीवाद आज सटोरिये के रूप में समाज व्यवस्था के लिए नई परेशानियां खड़ी कर रहा है , जिसके कारण विचार, सिद्धांत और मूल्यों का क्षरण हो रहा है। अभिव्यक्ति की चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। चारों ओर लूट मची है और इस लूट की कोई सीमा नहीं है। विचार, सिद्धांत और मूल्यों का तेजी से क्षरण हो रहा है। पत्रकारिता इससे अछूती नहीं हैं।''

 आगरा। ''पत्रकारिता पेशा है या मिशन, इस तरह की बहस अब बेमानी लगती है। पत्रकारिता के पेशे में, पेशेवर होने में दक्षता  और ईमानदारी निहित है। लेकिन अब पत्रकारिता धंधा बन रही है और चीजें धंधेबाजी तक गिर गई हैं। लूट और शोषण अभिव्यक्ति को प्रभावित कर रहे हैं। सूचना का अधिकार अभिव्यक्ति के अधिकार से जुड़ा है, क्योंकि बिना सूचना के अभिव्यक्ति नहीं होती। सूचना और समाचार अपने आप में अभिव्यक्ति हैं।  पूंजीवाद आज सटोरिये के रूप में समाज व्यवस्था के लिए नई परेशानियां खड़ी कर रहा है , जिसके कारण विचार, सिद्धांत और मूल्यों का क्षरण हो रहा है। अभिव्यक्ति की चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। चारों ओर लूट मची है और इस लूट की कोई सीमा नहीं है। विचार, सिद्धांत और मूल्यों का तेजी से क्षरण हो रहा है। पत्रकारिता इससे अछूती नहीं हैं।''

ये विचार शनिवार को 'कल्पतरु एक्सप्रेस' द्वारा प्रति माह आयोजित होने वाली मीडिया विमर्श शृंखला के तहत हिन्दी पत्रिका 'आउटलुक' के संपादक नीलाभ मिश्र ने व्यक्त किए। श्री मिश्र ने बदलती परिस्थितियों  में अभिव्यक्ति के सामने मौजूद चुनौतियों की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि आज पत्रकारिता के सामने दूसरी तरह की स्थितियां हैं। आज विचारधारा की शून्यता है। विचारधारा की शून्यता भी एक विचार है, जिसका अर्थ है निष्क्रियता।

देश में संसाधनों की बेहताशा लूट  का जिक्र करते हुए श्री मिश्र ने कहा कि देश में संसाधनों की लूट मची हुई है।  स्पेक्ट्रम यानी हवा, पानी और जमीन के रूप में पंच तत्वों का निजीकरण इस लूट का प्रमाण है। इस लूट से हवा, पानी और जमीन ही नहीं बच रहे तो अभिव्यक्ति कैसे बचे?  चारों ओर मुनाफे का खेल जारी है । मुनाफे की हवस की कोई सीमा तय नहीं है। अभिव्यक्ति जितनी राज्य के दमन से प्रभावित होती है उतनी ही लूट से प्रभावित होती है। पत्रकारिता में अभिव्यक्ति की  आजादी पर खतरे तेजी से बढ़ रहे हैं।

श्री मिश्र ने मानवाधिकार, अभिव्यक्ति और सूचना के अधिकार के अंतरसबंधों को विश्लेषित करते हुए कहा कि मानवाधिकार अविभाज्य और सार्वभौमिक है। जन्म के साथ जो अधिकार मिलते हैं, वे मानवाधिकार हैं और वे एक दूसरे पर परस्पर निर्भर हैं। अभिव्यक्ति का अधिकार जीवन के अधिकार से भिन्न नहीं हैं। जीवन का अधिकार मिले और बोलने की आजादी न मिले तो काहे का मानवाधिकार! उसी तरह अभिव्यक्ति यदि जीवन, स्वतंत्रता और समानता के अधिकार की पक्षधर न  हो तो कैसी अभिव्यक्ति? मानवाधिकार को ही संविधान में मौलिक अधिकारों का नाम दिया गया है। बिना सूचना के  कोई अभिव्यक्ति नहीं कर सकता।  सूचना का अधिकार आपकी अभिव्यक्ति के साथ जुड़ा है। यह बात पत्रकारों को समझनी होगी। सूचना का अधिकार जीवन का भी अधिकार है। भ्रष्टाचार का सिर्फ यह अर्थ नहीं कि किसी ने अपना घर भर लिया है। उसका एक मतलब यह है कि उसने दूसरे का घर उजाड़कर अपना घर भर लिया।

बहुराष्ट्रीय पूंजी के खेल की चर्चा करते हुए नीलाभ मिश्र ने कहा कि  खेती किसानी इस पूंजी के प्रभाव से बर्बाद हो रही है। जिंसों की ट्रेडिंग का मसला किसानों की आत्महत्या से जुड़ा है। आज सटोरिया पूंजीवाद का दौर है जो क्रिकेट से लेकर अनाज तक दांव खेल रहा हैं। इन बदलावों के पीछे के जमीनी सचों को समझने के लिए पत्रकारों को अपनी बौद्धिक क्षमता बढ़ानी होगी। एक तरह से यह बौद्धिक लूट का मामला भी है। इनकी सारी कड़ियों को जोड़कर देखना होगा। ।

नीलाभ मिश्र के व्याख्यान से पहले कल्पतरु एक्सप्रेस के समूह संपादक पंकज सिंह ने श्री मिश्र का परिचय देते हुए कहा कि एक संपादक के पीछे के इतिहास को जानना जरूरी है ताकि उसके सरोकार, संघर्ष,  मूल्यों और  प्रतिबद्धता को जाना और समझा जा सके। नीलाभ मिश्र पत्रकारिता के क्षेत्र में अलग तरह का व्यक्तित्व हैं। नीलाभ जी  ने एक सामाजिक मनुष्य के नाते अपनी प्रतिबद्धता को लेकर पत्रकारिता की है। नीलाभ जी उन बिरले लोगों में हैं जिन्होंने अपने विचार, सरोकार और सपनों को पूरी ईमानदारी के साथ जिया है। मानवाधिकारों के लिए पूरी तरह दृढ़ता से काम किया है और अपने मूल्य और सपनों को शब्दों में ढाला हैं।

कल्पतरु एक्सप्रेस के कार्यकारी संपादक अरुण कुमार त्रिपाठी ने कहा- सच को प्रस्तुत करने के रास्ते में बहुत बाधा है, जिसमें राज्य और कॉरपोरेट जगत भी है। दुनिया भर में सूचनाओं का  जो संजाल विकसित हुआ उसमें भ्रामकता ज्यादा है। ऐसे में सच को खंगालना भी एक बड़ी चुनौती है। सच के स्रोतों को विश्वनीयता के साथ -साथ अविश्वस की नजर से भी देखना और परखना होगा। इस कार्यक्रम में  कल्पतरु एक्सप्रेस के वरिष्ठ अधिकारी और पत्रकारों सहित ब्यूरो से आये हुए जिला प्रभारियों ने भी शिरकत की।

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