आगामी लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने नए सहयोगियों की तलाश तेज कर दी है। इसी कार्य योजना के तहत पहला राजनीतिक प्रयोग झारखंड से किया जा रहा है। यहां पर झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) और कांग्रेस के बीच राजनीतिक समझदारी बन गई है। इसके तहत राज्य में कांग्रेस और जेएमएम की साझा सरकार बनने का रास्ता साफ हो गया है। लोकसभा चुनाव की रणनीति को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने एक बार फिर जेएमएम सुप्रीमो शिबु सोरेन से हाथ मिला लिया है। सोरेन के बेटे हेमंत सोरेन का राज्य का नया मुख्यमंत्री बनना तय हो गया है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस, झारखंड के अलावा पश्चिमी बंगाल, ओडिशा, बिहार व छत्तीसगढ़ में भी सोरेन से हाथ मिलाकर चुनाव लड़ेगी। ताकि, आदिवासी इलाकों में खास राजनीतिक फायदा लिया जा सके।
‘आया राम, गया राम’ की राजनीति के चलते झारखंड में लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता का दौर चलता आया है। जेएमएम नेतृत्व की राजनीतिक साख बहुत अच्छी नहीं रह गई। लेकिन, इस दल के प्रमुख शिबु सोरेन की प्रतिष्ठा देशभर के आदिवासी इलाकों में है। खांटी नेता सोरेन आदिवासी हितों की लड़ाई सड़क से संसद तक करते आए हैं। कांग्रेस नेतृत्व का राजनीतिक दांव यही है कि जेएमएम को साथ लेकर छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में अपनी राजनीतिक पैठ बना ली जाए। अगले कुछ महीनों में ही आदिवासी बाहुल्य छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव की चुनौती है। यहां पर कांग्रेस का मुख्य मुकाबला भाजपा से होना है। आदिवासी इलाकों में अपनी पकड़ बढ़ाने के लिए पार्टी ने जेएमएम से हाथ मिला लिया है। कांग्रेसियों का दावा है कि इस नई राजनीतिक पहल से छत्तीसगढ़ में पार्टी के लिए अच्छी संभानाएं बन जाएंगी। ओडिशा में भी इसका खास लाभ मिलेगा।
2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने झारखंड में जेएमएम से हाथ मिलाया था। यहां चुनावी गठबंधन में सीपीआई और लालू यादव की पार्टी राजद को भी साथ लिया गया था। इस गठबंधन ने राज्य की 14 में से 13 सीटें जीत ली थीं। लेकिन, 2009 के चुनाव में कांग्रेस और जेएमएम ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में कांग्रेस को केवल एक सीट मिली थी। जबकि, जेएमएम को महज दो सीटें मिल पाई थीं। यहां पर भाजपा को सबसे ज्यादा फायदा हुआ था। उसने आठ सीटें जीती थीं। कांग्रेस के रणनीतिकारों ने 2004 का राजनीतिक इतिहास दोहराने के मंसूबे से सोरेन से हाथ मिलाया है। यहां पर राजद से भी अंदरखाने बातचीत चलाई जा रही है। लेकिन, जदयू से संभावित समझदारी बनाने के मुद्दे पर कुछ दुविधा की स्थिति है। इसीलिए राजद के बारे में कांग्रेस की रणनीति साफ नहीं हो पाई है।
यह अलग बात है कि झारखंड में बनने जा रही साझा सरकार में राजद को भी साथ लिया जा रहा है। क्योंकि, राजद के बिना साझा सरकार का अस्तित्व में आना मुश्किल है। यहां साधारण बहुमत के लिए 42 विधायकों का समर्थन चाहिए। जबकि, जेएमएम के पास 18 और कांग्रेस के पास महज 13 विधायकों की ताकत है। ऐसे में, सरकार बनाने के लिए इन्हें 11 और विधायकों के समर्थन की दरकार है। राजद के यहां पर 5 विधायक हैं। सीपीआईएमएल, मार्क्सिस्ट कॉर्डिनेशन पार्टी, झारखंड पार्टी (एकता), झारखंड मंच व जय भारत समता पार्टी जैसे दलों के पास भी एक-एक विधायक की ताकत है। कोशिश की जा रही है कि इन सभी छोटी पार्टियों के विधायकों का समर्थन साझा सरकार को मिल जाए। हेमंत सोरेन, तो यहां कांग्रेस के आला नेताओं को बता गए हैं कि लालू यादव के वादे के बाद निर्दलीय विधायकों के समर्थन की पक्की जुगाड़ उन्होंने कर ली है।
कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव बी के हरि प्रसाद, झारखंड मामलों के संगठन प्रभारी भी हैं। उन्होंने ऐलान कर दिया है कि सरकार बनाने के लिए जेएमएम से पूरी बातचीत हो चुकी है। इस सरकार में राजद के विधायक भी मंत्री बनेंगे। लेकिन, इनके हिस्से में कौन से मंत्रालय आएंगे? इसका फैसला मुख्यमंत्री के रूप में हेमंत सोरेन ही करेंगे। यहां पर कांग्रेस पहले भी जेएमएम के साथ गठबंधन की राजनीति का स्वाद चख चुकी है। जेएमएम का राजनीतिक अनुभव उसके लिए बहुत अच्छा तो नहीं रहा, फिर भी लोकसभा चुनाव की रणनीति को देखते हुए कांग्रेस ने सोरेन से हाथ मिलाया है। ऐसे में, राज्य सरकार की ‘गुणवत्ता’ को लेकर उसकी ज्यादा चिंता नहीं समझी जाती। झारखंड में कांग्रेस ने निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा की सरकार को समर्थन दिया था। इस सरकार ने राज्य में भ्रष्टाचार के तमाम नए रिकॉर्ड बनाए थे। इसको लेकर राजनीतिक रूप से कांग्रेस की भी बहुत किरकिरी हुई थी। इस कटु अनुभव के बाद भी यहां कांग्रेस नेतृत्व ने एक बार फिर सरकार बनवाने का जोखिम लिया है।
उल्लेखनीय है कि यहां पर भाजपा नेता अर्जुन मुंडा की नेतृत्व वाली सरकार चल रही थी। लेकिन, जेएमएम ने नाराज होकर इस सरकार से 8 जनवरी को अपना समर्थन वापस ले लिया था। ऐसे में, मुंडा की सरकार गिर गई। यहां पर 18 जनवरी से राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसकी अवधि 18 जुलाई को पूरी होने जा रही है। इसके पहले ही नई सरकार के गठन की कवायद शुरू हो गई है। सूत्रों के अनुसार, विधानसभा में कांग्रेस के नेता राजेंद्र प्रसाद सिंह को उपमुख्यमंत्री बनाने की बात तय की गई है। हालांकि, कांग्रेस ने आधिकारिक रूप से इसकी कोई पुष्टि नहीं की है। लोकसभा के चुनाव के लिए दोनों दलों ने सीटों के बंटवारे की बात तय कर ली है। यहां पर 14 में से 10 सीटों पर कांग्रेस लड़ेगी। जबकि, बाकी चार सीटें जेएमएम के हिस्से में आई हैं।
लोकसभा की सीटों के बंटवारे को लेकर ही दोनों दलों के बीच लंबी सौदेबाजी चलती रही। यहां पर जेएमएम कम से कम अपने हिस्से में छह सीटों के लिए जोर दे रहा था। लेकिन, उसे इतनी सीटें नहीं मिल पाईं। इस मामले में एक पेंच लालू यादव की नेतृत्व वाली पार्टी राजद का भी फंसा रहा। शिबु सोरेन चाहते थे कि कांग्रेस यहां पर दो सीटें राजद के लिए भी छोड़े। इस मामले में कांग्रेस ने जेएमएम को संकेत दिया है कि जरूरत पड़ने पर वह अपने कोटे से दो सीटें राजद को दे देगा। लेकिन, पार्टी यह फैसला बिहार के राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए बाद में तय करेगी।
इधर, कांग्रेस और बिहार की सत्तारूढ़ पार्टी जदयू के बीच अच्छे रिश्ते बने हैं। उल्लेखनीय है कि नरेंद्र मोदी के बहुचर्चित मुद्दे पर जदयू और भाजपा के बीच चला आ रहा 17 साल का राजनीतिक गठबंधन टूट गया है। मोदी के मुद्दे पर भाजपा और जदयू के बीच राजनीतिक धींगामुश्ती भी शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रति कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व काफी नरम है। यहां तक कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी मुख्यमंत्री की जमकर सराहना कर चुके हैं। वे नीतीश को खांटी सेक्यूलर नेता भी करार कर चुके हैं। कांग्रेस के लिए बिहार में मुश्किल यह है कि यहां पर जदयू और राजद के बीच खास राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता है। ऐसे में, एक साथ दोनों से हाथ मिलाए रखना संभव नहीं रह गया है। बिहार में जदयू का राजनीतिक दायरा बढ़ गया है। ऐसे में कांग्रेस, यूपीए-3 के लिए जदयू को अपना संभावित सहयोगी दल मानकर चल रहा है। यदि किसी वजह से जदयू नेतृत्व सीधे तौर पर कांग्रेस के साथ न जुड़ना चाहे, तो वह सपा-बसपा की तरह बाहर से समर्थन देने की भूमिका तो निभा ही सकता है। कांग्रेस के रणनीतिकार इस तरह का राजनीतिक गुणा-भाग लगाने में जुटे हैं। ऐसे में, वे लालू यादव से फिलहाल कुछ दूरी बनाए रखने की रणनीति ही उचित मानते हैं।
यह अलग बात है कि लालू यादव को कांग्रेस का यह ‘अवसरवाद’ अच्छा नहीं लग रहा। लेकिन, मुश्किल यह है कि लालू के पास भी कांग्रेस के अलावा कोई और माकूल विकल्प नहीं है। हालांकि, लालू तो यही उम्मीद कर रहे हैं कि कांग्रेस का जदयू की राजनीति से जल्दी ही मोह भंग हो जाएगा। क्योंकि, कांग्रेसियों को पता नहीं है कि अब बिहार में जदयू की राजनीतिक जमीन खोखली हो चुकी है। यूपीए-1 की सरकार में राजद, यूपीए का घटक था। लालू, यूपीए की सरकार में रेलमंत्री रहे थे। श्रीलंका से जुड़े तमिल भावनाओं के मुद्दे पर करुणानिधि के नेतृत्व वाले द्रमुक ने यूपीए से रिश्ता तोड़ लिया था। यहां तक कि द्रमुक नेताओं ने कांग्रेस के नेताओं को जमकर कोसा भी था। लेकिन, एक बार फिर कांग्रेस, द्रमुक नेतृत्व को पटाने की कोशिश में है। पिछले दिनों तमिलनाडु से करुणानिधि की बेटी कानिमोझी राज्यसभा में चुन ली गई हैं। इस चुनाव में कांग्रेस विधायकों ने द्रमुक के पक्ष में वोट डाला था। इस प्रकरण के बाद अब फिर से द्रमुक और कांग्रेस के रिश्ते अच्छे होने लगे हैं। कांग्रेसी रणनीतिकार उम्मीद कर रहे हैं कि लोकसभा का चुनाव यहां पर दोनों दल गठबंधन के रूप में लड़ सकते हैं।
इसी तरह से आंध्र प्रदेश में अपनी स्थिति संभालने के लिए कांग्रेस नेताओं ने वाईएसआर कांग्रेस के प्रमुख जगन मोहन रेड्डी से भी दोस्ती के तार जोड़ने शुरू किए हैं। कोशिश की जा रही है कि अगले ही कुछ महीनों में जगनमोहन की पार्टी का कांग्रेस में विलय हो जाए। ताकि, आंध्र की राजनीति में पार्टी अपना ‘डैमेज कंट्रोल’ कर सके। यहां पर तेलंगाना के मुद्दे को लेकर भी कांग्रेस की काफी मुश्किलें हैं। इसको देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व जल्द से जल्द तेलंगाना के मुद्दे पर दो टूक राजनीतिक फैसला लेने की तैयारी में बताया जा रहा है। इस तरह से कोशिश हो रही है कि अगले तीन-चार महीनों में कांग्रेस के पास कुछ नए सहयोगी दल आ जाएं। क्योंकि, खास मुकाबले में जो एनडीए गठबंधन हैं उसकी स्थितियां बेहतर नहीं है। भाजपा नेतृत्व की तमाम कोशिशों के बावजूद एनडीए का कुनबा बढ़ नहीं पा रहा। विवादित नेता नरेंद्र मोदी का मुद्दा भाजपा के लिए गले की फांस-सा बन गया है। इसी के चलते जदयू, एनडीए की राजनीति से बाहर आ गया है। कांग्रेस के रणनीतिकारों को लगता है कि झारखंड से जो राजनीतिक प्रयोग शुरू किया गया है, उसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। क्योंकि, इससे सेक्यूलर दलों में यही संदेश जाएगा कि कांग्रेस दूसरे दलों को लेकर आगे बढ़ने की राजनीति में विश्वास रखती है।
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।





