Shambhunath Shukla : मैं जब दिल्ली आया यानी 2 अगस्त सन् 1983 को तब जनसत्ता में पालेकर वन का ग्रेड मिलता था। मुझे तीन इंक्रीमेंट दिए गए थे तब भी कुल मिलाकर करीब डेढ़ हजार रुपये महीने में मिलते थे वह भी कट कुटाकर मात्र 1200 रुपये। हर हफ्ते कानपुर जाता था। तब गोमती का किराया 37 रुपये था। और एक भी दिन लेट हो गए तो इंडियन एक्सप्रेस का दफ्तर पैसे काट लेता था। मुझे कभी भी महीने में 1000 रुपये से ज्यादा न मिल पाता। मकान का किराया भी 500 रुपये महीने देना पड़ता था। अब बाकी के 500 में महीने का गुजारा मुश्किल था।
सो जनसत्ता के एक सहायक संपादक सतीश झा साहब ने कुछ विज्ञापनों के अनुवाद का काम दिलवा दिया और इससे मुझे 2500 रुपये महीने की अतिरिक्त आय हो जाती। उसके बाद कुछ विज्ञापन एजंसियों में कापी राइटिंग का काम मिला। तब मुझे लगा कि पत्रकारिता से अधिक कौशल की जरूरत कापी राइटिंग में चाहिए। अब आज करीना कपूर का एक विज्ञापन- ओ पापे प्यास बढ़ा को टीवी पर देखकर लगा कि वाकई प्रतिभा विज्ञापनों और फिल्मों की दुनिया में ज्यादा है। इस विज्ञापन में कुछ संशोधन किया गया है और यह कापी राइटर का ही कमाल है। आखिरी के बोल हैं तू मामा बनकर पछताएगा। यह सुनते ही मुझे बेचारे पवन बंसल याद आ गए। वाकई सिंगला जैसा भानजा उनका सारा कैरियर ले डूबा अब वे सरकारी गवाह बन गए हैं और मामा होने के पछतावे का प्रायश्चित करेंगे।
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.





