Shambhunath Shukla : फेसबुक की आभासी दुनिया में भी लोग सीरियस रहते हैं। यहां आकर तो आप मठ उजाडि़ए फिर देखिए मठाधीशों के दयनीय मुद्रा में बनते बिगड़ते चेहरे। राजनीतिकों के भी, पत्रकारों के भी और उन तथाकथित ज्ञानियों के भी जो मठ में बैठकर अपने फरमान जारी करते रहते हैं। मैं तो अपना वक्त यहां इसलिए लगाता हूं कि इस बहाने एक तो कुछ जो आप नहीं कह पाए या लिख पाए उसे कहने अथवा लिखने का मौका मिलता है।
दूसरे टाइम पास होता है तीसरा बहुत कुछ नया जानने और सोचने का मौका मिलता है क्योंकि यहां का लगभग हर चेहरा मेरी तुलना में नया है। इसके अलावा आप उदास या निराश नहीं होते और हर पोस्ट के साथ और नई पोस्ट का आइडिया मिलता है। क्या यह दिलचस्प नहीं है कि मेरी पोस्ट से तमाम लोगों को टीवी पर बहस करने का और अखबारों के पन्नों पर लिखने का मुद्दा मिला है। कुछ लोग मुझे समझाते हैं कि आप अब भजन या कीर्तन करिए। मूर्ख हैं जो मुझे ऐसा करने की सलाह देते हैं। जिस आदमी की किसी भी धर्म, पंथ या मठ में आस्था ही नहीं है वह भला क्यों किसी मठ में जाकर तालियां पीटे। इसी फेसबुक पर रहकर मैं बहुतों को पलीता लगाता रहूंगा।
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.





