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शारदा फर्जीवाड़े के शिकार लोगों के मुआवजे के लिए फंड का क्या हुआ?

एक घोटाले को रफा दफा करने के लिए एक और घोटाले की जरुरत होती है। रेल गेट, कोलगेट, शारदा, आईपीएल, टुजी स्पेकट्रम, राष्ट्रमंडल खेल गोटालों का हश्र यही साबित करता है। शारदा चिटफंड फर्जीवाड़े के भंडाफोड़ के बाद बंगाल में जारी सैकड़ों फर्जी कंपनियों के गोरखधंधे का सिलसिला केंद्रीय एजंसियों की सुरुआती प्रतिक्रिया खत्म हो जाने के बाद जस का तस जारी है। विशेष जांच टीम ने अभी काम ही शुरु नही किया है।

एक घोटाले को रफा दफा करने के लिए एक और घोटाले की जरुरत होती है। रेल गेट, कोलगेट, शारदा, आईपीएल, टुजी स्पेकट्रम, राष्ट्रमंडल खेल गोटालों का हश्र यही साबित करता है। शारदा चिटफंड फर्जीवाड़े के भंडाफोड़ के बाद बंगाल में जारी सैकड़ों फर्जी कंपनियों के गोरखधंधे का सिलसिला केंद्रीय एजंसियों की सुरुआती प्रतिक्रिया खत्म हो जाने के बाद जस का तस जारी है। विशेष जांच टीम ने अभी काम ही शुरु नही किया है।

सुदीप्त और देवयानी एक थाने से दूसरे थाने की हिरासत में स्थानांतरित होते जा रहे हैं। कॉरपोरेट मंत्रालय समेत विभिन्न मंत्रालयों ने इस पर चुप्पी साध ली है। कोलकाता हाईकोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय को शारदा समूह चिटफंड घोटाले की जांच करने की अनुमति दे दी, उस जांच के सिलसिले में क्या हुआ, यह भी कोई बता नहीं सकता।शारदा घोटाले ने समूचे राज्य में हजारों ही नहीं लाखों लोगों को बरबाद कर दिया है। कहीं बेटियों वाले घर में शादी के अरमान धोखे की वेदी पर कुर्बान हो गए। कहीं सैकड़ों लोग घर छोड़ कर भाग गए और कहीं-कहीं तो सिर्फ बरबादी की दास्तान ही बाकी है। ये एक घोटाले से पैदा हुआ ऐसा हृदयविदारक दर्द है, जिसने एक-समूचे राज्य को बंधक बना लिया है।

सबसे बड़ी खबर तो यह है कि शारदा भंडाफोड़ के बाद आत्महत्याओं के दौर में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जो इस फर्जीवाड़े के शिकार लोगों को मुआवजा देने के लिए पांच सौ करोड़ का फंड का ऐलान किया था, दो महीने से ज्यादा वक्त बीतने के बावजूद उस फंड के गठन के लिए वित्त विभाग ने विज्ञप्ति ही जारी नहीं की है।दीदी ने तब नागरिकों को ज्यादा से ज्यादा सिगरेट पीकर इस फंड को मजबूत करने की अपील की थी। पश्चिम बंगाल में हजारों ऐसे परिवार सहमे हुए हैं जिनके घर का कोई सदस्य शारदा कंपनी का एजेंट था। अब उनपर हमले हो रहे हैं। जून के पहले हफ्ते तक शारदा कंपनी के खौफजदा 26 एजेंट खुदकुशी कर चुके हैं। 20 से ज्यादा एजेंटों समेत 50 से ज्यादा लोग आत्महत्या की कोशिश कर चुके हैं। 1 हजार से ज्यादा एजेंट घर छोड़ कर भाग गए हैं। 1 हजार से ज्यादा एजेंटों के घर पर हमले हुए हैं। हजारों महिलाएं इस कंपनी की एजेंट बनी थीं। लेकिन कंपनी के भाग जाने के बाद ये महिलाएं घर-परिवार और यहां तक कि बच्चों से भी दूर हो गई हैं।

शारदा घोटाले के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए ममता सरकार ने जस्टिस श्यामल कमीशन का गठन किया है। घोटाले के शिकार लोग अब कमीशन में अपनी शिकायत दर्ज करा रहे हैं। कमीशन 5 जून से 29 जून तक शिकायत लेगा। लेकिन जून के पहले हफ्ते तक के आंकड़ों पर निगाह डालें तो जस्टिस श्यामल कमीशन के पास 7 लाख 75 हजार शिकायतें आ चुकी हैं। अनुमान है कि शिकायतों का आंकड़ा 20 लाख तक पहुंच सकता है।

कोलकाता हाईकोर्ट ने शारदा चिट फंड घोटाला मामले की केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने का आदेश देने से इनकार कर दिया, लेकिन न्याय के हित में मामले को खत्म नहीं किया। न्यायमूर्ति एके बनर्जी और न्यायमूर्ति एमके चौधरी की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए मामले की सीबीआई से जांच कराने का आदेश देने से इंकार कर दिया। लेकिन न्यायिक सलाहकार के अनुरोध पर मामले को खारिज नहीं किया। सलाहकार वकील लक्ष्मी गुप्ता ने दलील दी कि मामले को खत्म न किया जाए, बल्कि इसे लंबित रखा जाए। न्यायालय ने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया।

केंद्रीय और राज्य सरकारों की ओर से पोंजी योजना पर अंकुश के लिए कानून बनाने की घोषणाएं हुई और बंगाल विधानसभा के विशेष अधिवेशन में विधेयक पासहुआ, जिसे केंद्र ने लौटा दिया। सेबी ने जिन कंपनियों को नोटिस जारी किया, वे अदालत की शरण में हैं और सेबी की चेतावनी के बावजूद आम लोग अब भी इन कंपनिों में निवेश कर रहे हैं।  ठगे गए 80 फीसदी लोग गरीब तबके से हैं जिनके लिए शारदा कंपनी की योजना को नजरअंदाज करना मुश्किल था। आरोपों के मुताबिक शारदा ग्रुप ने 165 कंपनियों के जरिए चिटफंड ठगी का जाल बुना। कंपनी ने दो तरह की स्कीम से गरीबों को धोखे का शिकार बनाया।

पहली स्कीम में रोजाना 20 रुपये जमा करने पर 10500 रुपये की वापसी का झांसा दिया गया। रोजाना स्कीम में 1500 रुपये शुद्ध मुनाफे का वादा किया गया। दूसरी योजना के तहत 7 साल तक 10 हजार रुपए जमा करने पर 40 हजार रुपये वापसी की गारंटी दी गई। 2008 में बनी कंपनी महज चार साल में ही कई सौ करोड़ की बन गई। लेकिन 10 अप्रैल 2013 को उसका मायालोक धवस्त हो गया। शारदा ग्रुप के दफ्तरों का शटर गिर गया। एक झटके में लाखों लोग बरबाद हो गए।

शारदा फर्जीवाड़े के बाद जो बवंडर मचा, उसका अब नामोनिशान  नहीं है। पंचायत चुनावों ने यह मसला ही खत्म कर दिया। अब कोई इस मामले में बोल ही नहीं रहा है और न मीडिया पर सुर्खियां बन रही है। जिन लोगों के नाम उछले, उनसे न पूछताछ हुई और न सुदीप्त और देवयानी के बाकी साथियों की खोज खबर ली गयी। सुदीप्त के परिजन अभी पकड़ से बाहर हैं। बुंबा की गिरफ्तारी हो गयी। शारदा समूह के खातों से कुछ नहीं निकला और न उसकी संपत्ति के बारे में कुछ पता चला। अब सघन पूछताछ का ब्यौरा भी नहीं आ रहा है।

कोयला माफिया, आतंकवादी, माओवादी, उग्रवादी, जिहादी, अंडरवर्ल्ड और राष्ट्रविरोधी ताकतों से चिटफंड कंपनियों के जुड़े तार के सिलसिले में भी कोई पड़ताल नहीं हुई। ऐसे में इन  कंपनियों में निवेश करके अपना सबकुछ गवांने वालों का हश्र वही होगा जो संचयिनी, अपेस इंडिया,ओवरलैंड जैसे पुराने मामलों में हुआ। दीदी ने शारदा समूह के दो टीवी चैनल के अधिग्रहण की घोषणा की, जिस पर अमल हुआ नहीं है। शारदा मीडिया समूह के बंद अखबारों के कर्मचारियों की भी कहीं सुनवाई नहीं हुई।

इसी बीच केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल विधानसभा के विशेष अधिवेशन में पास पश्चिम बंगाल वित्तीय प्रतिष्ठान के निवेशकों के हितों का संरक्षण विधेयक 2013 लौटाते हुए इस विधेयक में यह प्रावधान करने का सुझाव दिया है कि पोंजी कारोबार के सिलसिले में गिरफ्तार मालिकों से मोटी रकम हरजाना वसूल करके उन्हें रिहा कर दिया जाये। हालांकि बंगाल की मुख्यमंत्री ने विधेयक लौटाने की खबर को गलत बताते हुए केंद्र की ओर से कुछ स्पष्टीकरण मांगे जाने का दावा किया है।

केंद्र के मुताबिक अदालत में अपना जुर्म कबूल कर लेने के बाद चिटफंड मालिकों को यह छूट दी जा सकती है। और इस सिलसिले में केंद्र और राज्यों के कानून अपर्याप्त है, इसी के मद्देनजर यह बीच का रास्ता निकाला गया है। हालांकि सुदीप्त सेन मामले में यह सुझाव लागू इसलिए नहीं होगा क्योंकि विधेयक अभी कानून बना नहीं है और उनकी गिरफ्तारी पहले ही हो चुकी है। बताया जा रहा है कि ममता बनर्जी की सरकार ने यह सुझाव मान भी लिया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से दिये गये तीनों सुझावों पर राज्य सरकार को कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन राज्य सरकार की दलील है कि केंद्र के सुझावों को अभी जोड़ने में वक्त जाया होगा, लिहाजा पहले राष्ट्रपति उसपर दस्तखत करके कानून बना दें और फिर केंद्र इसमे अपने सुझाव समायोजित कर दें। जाहिर है कि दीदी ने फिर गेंद केंद्र के पाले में डाल दी है।

ममता बनर्जी के मुताबिक केंद्र सरकार ने पोंजी कारोबार पर विशेष अदालतों को ज्यादा अधिकार देने का सुझाव भी दिया है ताकि दूसरे राज्यों में लंबित मामलों की भी उसी अदालत में सुनवाई हो सके। इसके अलावा ऐसे मामलों में अभियुक्तों को अग्रिम जमानत न मिलें, इसके प्रावधान करने का केंद्र का सुझाव है। फिर अभियुक्तों को कैद की सजा से बरी करने के लिए हरजाना के बदले रिहाई का सुझाव है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल वित्तीय प्रतिष्ठान के निवेशकों के हितों का संरक्षण विधेयक 2013 पर राज्य सरकार से कुछ सवाल पूछे हैं। पश्चिम बंगाल सरकार ने मई माह के शुरू में इस विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा था।

केंद्र ने सवाल किया है कि राज्य सरकार नये कानून के तहत पुराने मामले में गिरफ्तार आरोपी पर कैसे फौजदारी मामला चला सकती है, क्योंकि भारतीय संविधान में ऐसा प्रावधान ही नहीं है कि नया कानून बना कर किसी पुराने आरोपी को उस कानून के तहत सजा दी जा सके। राज भवन के एक सूत्र ने बताया कि गृह मंत्रालय ने राज्यपाल के जरिये राज्य सरकार से विधेयक पर एक-दो सवाल पूछे हैं। इन सवालों का खुलासा नहीं किया गया है। शारदा चिटफंड घोटाला सामने आने के बाद ममता बनर्जी सरकार ने निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए 30 अप्रैल को विधानसभा में इंटरेस्ट ऑफ डिपॉजिटर्स इन फाइनेंशियल इस्टेब्लिशमेंट बिल, 2013 को पारित कराया था। पश्चिम बंगाल सरकार ने मई माह के शुरू में इस विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा था।

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​ की रिपोर्ट.

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