नई दिल्ली : भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् (भारत सरकार) एवं अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति के तत्वावधान में आजाद भवन, नईदिल्ली में सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार पंडित सुरेश नीरव की अभी हाल में प्रकाशित हुई पुस्तक ''उत्तरप्रश्नोपनिषद्'' का लोकार्पण पद्मविभूषण डॉक्टर कर्ण सिंह (सांसद एवं अध्य़क्षः भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्, भारत सरकार) तथा पद्मभूषण डॉक्टर विंदेश्वरी पाठक (संस्थापकः सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन) ने किया।
लोकार्पण करते हुए डॉक्टर कर्णसिंह ने कहा कि- प्रश्नोत्तर शैली में लिखी गई पंडित सुरेश नीरव की पुस्तक उत्तर प्रश्नोपनिषद को मैंने बहुत ध्यान से पढ़ा है। ये प्रश्न सनातन हैं और हर काल में रहे हैं। सुरेश नीरव की ये प्रश्नाकुलता समाधान की दिशा में पहुंचने का एक सार्थक प्रयास है। प्राचीन ग्रंथों में ऋषि-मुनियों ने अपने शिष्यों को प्रश्नोत्तर शैली में ही ज्ञान प्रदान किया था। महाभारत, कठोपनिषद्, वृहदारण्यक और छांदोग्य सभी प्रश्नोत्तरशैली में ही हैं। आज साक्षात्कार के नाम पर प्रश्नकर्ता साक्षात्कार दे रहे व्यक्ति से जो प्रश्न पूछते हैं वह नितांत सामयिक और व्यक्तिगत होते हैं और इन प्रश्नोत्तरों की उम्र बहुत कम होती है और इस तरह के साक्षात्कारों से तात्कालिक सूचनाएं तो मिल जाती है पर समाज को कोई सार्थक दिशा नहीं मिल पाती है।
जब हम अकेले होते हैं तो कभी-कभी ऐसे प्रश्न हमारे मन में उठते जरूर हैं। मगर उनका उत्तर कहां मिले? यह यक्ष-प्रश्न सामने आ जाता है। इस पुस्तक ने उस रचनात्मक अभाव को काफी हद तक पूरा किया है। जागरूक लेखक के इस सृजनात्मक श्रम और महत्व को विद्वजन निश्चित ही सराहेंगे इस विश्वास के साथ मैं लेखक सुरेश नीरव को अनेक शुभकामनाएं देता हूं। प्रखर साहित्यचिंतक तथा सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन के संस्थापक डॉक्टर विंदेश्वर पाठक ने प्रश्न को ज्ञान-विज्ञान का प्राण तत्व बताते हुए कहा कि कारण और कारक पर ही सारा ज्ञान-विज्ञान खड़ा है। कारण ही प्रश्न है। बुढ़ापा क्यों आता है,बुद्ध के मन में उठा प्रश्न है और सेव पेड़ से नीचे ही क्यों गिरता है यह न्यूटन के मन में उठा प्रश्न है। प्रश्न ही आविष्कार और शोध की गंगोत्री हैं। अनछुए प्रश्न मेधावी मस्तिष्क में ही उठते हैं। पूछे गए प्रश्न ही चेतना का स्तर निर्धारित करते हैं। पंडित सुरेश नीरव द्वारा पूछे गए प्रश्न ही यह बताने के लिए काफी हैं कि वे कितने गहरे विद्वान हैं।
पुस्तक लेखक पंडित सुरेश नीरव ने कहा कि- प्रश्न जितने पैने और धारदार होंगे जिज्ञासा की उर्वराभूमि से उत्तरों का खनन भी उतना सार्थक होगा। वरिष्ठ कवि तथा साहित्य अकादमी के उप सचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी तथा भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के उप महानिदेशक अनवर हलीम ने भी पुस्तक की प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय सेवाओं के लिए सर्वभाषा संस्कृति सम्मान से विशिष्ट विभूतियों को अलंकृत भी किया गया जिसमें समकालीन चौथी दुनिया के संपादक प्रवीण चौहान उल्लेखनीय हैं। इस अवसर पर प्रवीण चौहानजी (संपादकः समकालीन चौथी दुनिया), ओमप्रकाश प्रजापतिजी (संपादकः ट्रू मीडिया), डॉक्टर अमर नाथ अमर (दिल्ली दूरदर्शन), राकेश पांडेजी (संपादकःप्रवासी संसार), बी.एल. गौड़ (संपादकः गौड़ टाइम्स), राजकुमार सचान होरी (संपादकः पटेल टाइम्स), अरविंद पथिक (सचिवः बिस्मिल फाउंडेशन), ताहिर हुसैन (शिक्षाविद्), विजयशंकर चतुर्वेदी (संपादकः राष्ट्र टाइम्स), योगेश मिश्रा (रायटर्स-डेस्क), विजय दासानी (फिल्म अभिनेता), अशोक रिछारिया (अध्यक्षः बुंदेलखंड विकास परिषद), प्रदीप जैन (प्रोड्यूसर-डाइरेक्टर), पूनम माटिया (कवयित्री), अनुभूति चतुर्वेदी (कवयित्री), बबली वशिष्ठ (कवयित्री), स्नेहलता (कवयित्री), अवधेश चौबे (महासचिवः बुंदेलखंड विकास परिषद) ,कुलदीप राजपूत (पत्रकार) विशेषरूप से उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन सुनीति शर्मा ने किया।
प्रस्तुति : मधु मिश्रा





