उत्तर प्रदेश पुलिस हिरासत में 20 मई 2013 को फैजाबाद से लखनऊ पेशी पर जा रहे सीरियल बम ब्लास्ट कांड के आरोपी आतंकवादी खालिद मुजाहिद की मौत स्वभाविक थी। न कि किसी साजिश का हिस्सा। इस बात का खुलासा उत्तर प्रदेश विधि विज्ञान प्रयोगशाला (लखनऊ) में हुए बिसरे की जांच के बाद हुआ। यह रिपोर्ट शासन को सौंप दी गई है। रिपोर्ट आने के बाद इस बात की संभावना जताई जा रही है कि खालिद की मौत के बाद हत्या और साध्य मिटाने के आरोप का मुकदमा झेल रहे पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह और तत्कालीन डीजी लॉ एंड आर्डर ब्रजलाल सहित उन पुलिस वालों की मुश्किले कम हो जायेंगी जिनकी कस्टडी में खालिद की मौत हुई थी।
गौरतलब हो 20 मई 13 को फैजाबाद से पेशी के लिये लखनऊ आ रहे खालिद की जिला बाराबंकी से गुजरते समय अचानक मौत हो गई थी, जिस पर काफी हो-हल्ला मचा था और यहां तक कहां गया था कि खालिद की हत्या की गई है। इस पर खूब राजनीति भी हुई। अखिलेश सरकार ने खालिद के परिवार को मुआवजा देकर मामले को रफा-दफा करना चाह, लेकिन जब बात नहीं बनी तो कई पुलिस वालों को आरोपी बनाकर उनके ऊपर मुकदमा ठोंक दिया गया।
उधर,पांच डाक्टरों के पैनल ने जिसमें दो मुसलमान चिकित्सक भी थे खालिद के शव का पोस्टमार्टम किया। पोस्टमार्टम से यह तो साफ हो गया था कि उसके साथ किसी तरह की मारपीट नहीं की गई थी, लेकिन पोस्टमार्टम कर रही टीम ने संभावना व्यक्त की कि हो सकता है कोई जहरीला पदार्थ देकर खालिद को मौत की नींद सुलाया गया हो, इसलिये खालिद के बिसरे (पेट में मिले खाद्य पदार्थ) की जांच की जाये। पोस्टमार्टम करने वाली टीम की सिफारिश को तुरंत मान कर खालिद का बिसरा विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेज दिया गया, जहां बिसरे का परीक्षण करने के बाद डाक्टरों ने और पाया कि खालिद के बिसरे में कोई जहरीला पदार्थ नहीं था।
भाजपा नेता और प्रवक्ता विजय पाठक ने खालिद की मौत से पर्दा हटने के बाद प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए था, खालिद की मौत स्वभाविक थी, यह बात तब भी लोग जानते थे और अब भी यही सच्चाई सामने आई है। बात राजनीति की कि जाये तो सपा ने खालिद की मौत को खूब राजनीतिक रंग दिया था। समाजवादी पार्टी वोट बैंक की राजनीति में कितना गिर जाती है, इसकी बानगी आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद खालिद की पुलिस कस्टडी में हुई मौत के बाद हुई सियासत में जनता को देखने को मिली थी। सरकार ने मुसलमानों को खुश करने के लिये खालिद के परिवार को मुआवजा देने में भी संकोच नहीं किया था। पुलिस वालों के खिलाफ अनाप-शनाप मुकदमें ठोंक दिये गये थे, जबकि वह अपने को बेकसूर बता रहे थे।
यहां तक की एक मुकदमा रिटायर्ड डीजीपी विक्रम सिंह के खिलाफ भी दर्ज कर दिया गया, जो खालिद की मौत के समय रूड़की के रामकृष्ण ट्रस्ट मिशन में व्याख्यान दे रहे थे। अपने खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की बात सुनकर वह गुस्सा हो गये थे और उन्होंने यहां तक कह दिया था ‘यह सब सरकार के पैंतरे हैं। खालिद की गिरफ्तारी मेरे ही कार्यकाल में हुई थी। मैं दावे के साथ कह सकता हॅू कि वह आतंकवादी था और रहेगा। पता नहीं खालिद के परिवार को छह लाख रूपये की मदद देकर राज्य सरकार के नुमाइंदे क्या संदेश देना चाहते है।’ उन्होंने पुलिस वालों का मनोबल बढ़ाते हुए यहां तक कहा था कि ऐसे मुकदमों से पुलिस वालों को परेशान नहीं होना चाहिए। पूर्व डीजीपी के एल गुप्ता ने बिसरा रिपोर्ट आने के बाद पिछले घटनाक्रम को याद करते हुए आतंक के आरोपियों के नाम पर वोट बैंक की राजनीति को घातक करार दिया। उनका कहना था सच को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। बिसरा रिपोर्ट से यह साफ हो गया है।
लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार की रिपोर्ट.





