भोजन उपरांत का सत्र- 'बाबा बागदेव' के पाठ के साथ हुआ। पचमढ़ी में भवानी प्रसाद मिश्र की कविता 'सतपुड़ा के घने जंगल' का जो वाचन प्रशांत ने किया था, यहां उसे कश्मीर उप्पल ने अपनी ही कविता के जरिए विस्तार दिया…
कभी किसी ने
बाघ नहीं कहा उन्हें
न ही कहा शेर
बाबा के बारे में
बोलते लोगों की आंखें
चमकने लगतीं
सांस भर आती
….
बाबा मायाराम ने इलाके में चल रहे जनसंघर्षों और उनकी नियति पर संक्षेप में प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ये अजीब विडंबना है कि मानव एक तरफ मंगल पर जीवन तलाश रहा है और दूसरी तरफ पृथ्वी पर जीवन के ख़ात्मे में सहभागी बना बैठा है। टाइगर रिजर्व में वन विभाग के अधिकारियों की एक अजीबोगरीब दलील का जिक्र किया- मछली से बाघ चमकता है इसलिए मछली पालन का काम इस इलाके से ख़त्म कर दिया जाए। विस्थापन के नाम पर आदिवासियों के साथ हो रही लूट-खसोट को उन्होंने बेहद दुखद घटना बताया।
इसके बाद फागराम ने आपबीती सुनाई। उन्होंने बताया कि लकड़ी-गट्ठे के झूठे केस में पुलिस ने उन्हें जेल भेजा और सताया। ग्रामीण शिक्षा के बारे में बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि 150 बच्चों पर एक गुरूजी। ऐसे में गुरूजी की हालत बेहद दयनीय हो जाती है- इते देखईं कि उते देखईं। अब ऐसे में मास्टरसाहब क्या तो 'मास्टरप्लान' समझेंगे और समझाएंगे। बिना लड़े इस देश में कुछ नहीं मिलता, राह-ए-संघर्ष चुननी ही पड़ेगी।
चाय के उपरांत, दिन के तीसरे सत्र में 'मौजूदा दलीय लोकतंत्र-कितना संवैधानिक' विषय पर 'कल्पतरु एक्सप्रेस' के संपादक अरुण त्रिपाठी ने अपनी बातें रखीं। उन्होंने 1975 और उसके बाद 1992 को भारतीय लोकतंत्र के लिहाज़ से दो ख़तरनाक 'काल' बताया। देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को परिवारवाद, पक्षपात, तानाशाही का गढ़ बताया तो वहीं क्षेत्रीय दलों के उभार का भी जिक्र किया। इस बात पर अफसोस भी जाहिर किया कि उत्तरप्रदेश जैसे सूबे की दो बड़ी पार्टियां चाहें सवारी हाथी या साईकिल की कर रही हों, परसुराम जयंती मनाने में दोनों ही दलों के कार्यकर्ताओं का उत्साह एक सा है।
बातचीत के क्रम में अरुण त्रिपाठी ने बीडी शर्मा का एक कथन उद्धृत किया- संविधान ने लोगों को आज़ादी दी, आदिवासियों को गुलामी। इसके साथ ही इस बात पर चिंता भी जाहिर की कि देश की सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका ऐसी भी लंबित है, जिसमें संविधान से 'समाजवाद' शब्द को हटाने की गुहार लगाई गई है। त्रिपाठीजी ने कहा कि अब लोकतंत्र में भागीदारी के लिए भी बड़ी पूंजी चाहिए। दिनोंदिन पूंजी का बोलबाला बढ़ा है और बौद्धिक लोगों की उपेक्षा हर मोर्चे और हर पार्टी में नजर आने लगी है। सबसे बड़ी विडंबना तो ये है कि देश का नेता भी विदेश में तय होने लगा है।
इस सत्र में हस्तक्षेप के तौर पर एशियन ह्यूमन राइट्स के सदस्य समर अनार्य ने अन्ना के आंदोलन को मौजूदा दौर का सबसे गैर-लोकतांत्रिक आंदोलन बताया। सत्र की अध्यक्षता कर रहे अखलाक अहमद ने कहा कि विदेशी शक्तियों का दखल केंद्र सरकार ही नहीं राज्य सरकारों का मुखिया तय करने में भी बढ़ रहा है, जो चिंता का विषय है। पहले दिन का आखिरी और खुला सत्र कश्मीर उप्पल, रजनी बख्शी, सुनील, सचिन जैन और राकेश दीवान की टिप्पणियों के साथ समाप्त हुआ।
दूसरे दिन के पहले सत्र की शुरुआत गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़े गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अनुपम मिश्र के प्रजेंटेशन से हुई। पानी और उनके संरक्षण के कई उदाहरण चित्रों के जरिए सामने आए और उनके साथ अनुपमजी की लाइव कमेंट्री चलती रही। पानी के संरक्षण को जितने सुंदर चित्रों में सहेजा गया था, उतनी ही कोमल वाणी में उसका महात्म्य बखाना जा रहा था। हॉल में बैठे लोग मंत्रमुग्ध से कभी सेलुलाइड के चित्रों को और कभी अनुपम मिश्र को निहार रहे थे। पानी के इसी जनतांत्रिक संरक्षण के जरिए उन्होंने 'समाज के लोकतंत्र और संवैधानिक लोकतंत्र' के फर्क को बड़ी सरलता और सहजता से मन में उतार दिया।
इस सत्र में कश्मीर उप्पल ने नागार्जुन, श्रीकृष्ण कुमार और सच्चिदाननंद सिन्हा के कुछ पत्रों का वाचन किया। ये वो पत्र थे, जिनसे पत्रकारिता के क्षरण का इतिहास झांक रहा था। पशुपति शर्मा ने बतौर हस्तक्षेप एक पत्रकार के स्टाइलशीटिया बन जाने पर अफसोस जताया। अख़बारों के संपादकों से जैसा तादात्म्य आम लोगों का था, ठीक वैसा ही चैनलों के संपादकों के साथ क्यों नहीं?, ये सवाल भी उठाया।
…जारी…
पशुपति शर्मा की रिपोर्ट. संपर्क: 9868203840
उपरोक्त के आगे-पीछे के पार्ट…
सुखतवा मीडिया संवाद (3) : मीडिया हाउसेस रिपोर्टिंग पर खर्च कम करते जा रहे, इसीलिए चैनलों पर टॉक शो की बाढ़ आ गई है
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सुखतवा मीडिया संवाद (1) : आजादी के पहले प्यार और पॉलीटिक्स दोनों ही चाइनीज़ मोबाइल की तरह नहीं थे
इसी आयोजन की कुछ अन्य रिपोर्ट्स–
- दैनिक जागरण के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में रियल एस्टेट, मैक्डोनल्ड्स, टैक्स कंसल्टेंट्स और सीए नजर आएंगे, पत्रकार नहीं
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- टीओआई वाले 119 कंपनियों के लिए पेड न्यूज छापते हैं
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- एनडीटीवी के मुंबई दफ्तर से 250 पत्रकारों की नौकरियां गईं, सब चुप रहे
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- ‘न्यू कन्वर्जेंस’ मीडिया के लिए नया और बहुत बड़ा खतरा : पी साईनाथ





