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शंकर दुबे के आरोपों पर सिद्धार्थ कलहंस ने भी दी सफाई

अभी दो दिन पहले भड़ास में वाराणसी के किसी सज्जन (जो स्वंय को श्रमजीवी पत्रकार और आईएफडब्लूजे का 27 साल पुराना साथी होने का दावा भी करते हैं) का लेख पढ़ा। लेख पोस्ट करने वाले श्री शंकर दुबे, हालांकि काशी पत्रकार संघ के पदाधिकारी ऐसे किसी नामधारी के आईएफडब्लूजे के रायपुर अधिवेशन में जाने के दावे या उसके पत्रकार संघ के सदस्य होने की बात को सिरे से खारिज करते हैं, ने अधिवेशन में गैर पत्रकारों के यूपी से जाने की बात कही।

अभी दो दिन पहले भड़ास में वाराणसी के किसी सज्जन (जो स्वंय को श्रमजीवी पत्रकार और आईएफडब्लूजे का 27 साल पुराना साथी होने का दावा भी करते हैं) का लेख पढ़ा। लेख पोस्ट करने वाले श्री शंकर दुबे, हालांकि काशी पत्रकार संघ के पदाधिकारी ऐसे किसी नामधारी के आईएफडब्लूजे के रायपुर अधिवेशन में जाने के दावे या उसके पत्रकार संघ के सदस्य होने की बात को सिरे से खारिज करते हैं, ने अधिवेशन में गैर पत्रकारों के यूपी से जाने की बात कही।

यूपी से गए 70 सदस्यों के दल के बारे में इतना तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि वो सबके सब अखबार कर्मी थे न कि किसी मजदूर विरोधी संगठन के मुखबिर या यूनियन विरोधी तत्व जैसा कि दुबे जी के आलेख से झलकता है। आईएफडब्लूजे को लंबे समय से जानने वालों (जैसा कि दुबे जी का दावा है) को पता है हम केवल अपनी लड़ाई अकेले लड़ने में यकीन नही रखते बल्कि समान विचार वाले अन्य मजदूर संगठनों का साथ देते और लेते हैं। क्या बुरा था अगर विभिन्न क्षेत्रों के मजदूरों, कामगारों, गरीबों वंचितों की यूनियनों ने हमारे नेता का भिलाई में स्वागत कर दिया। हमारा तो नारा है कि दुनिया के मजदूरों एक हो। मजदूर संगठनों की एकजुटता मालिकों के लिए बड़ा खतरा होती है।

राजधानी लखनऊ में पत्रकारों के संघर्ष में रेल मजदूर यूनियन, अपट्रान, स्कूटर्स इंडिया के लोग हमारे साथ शाना ब शाना लड़े हैं और हम भी उनके साथ खड़े हुए हैं। अभी हाल में आईएफडब्लूजे के लखनऊ के साथी पत्थरकट्ट के नाम से जाने वाले गरीब कारीगरों के उत्पीड़न के खिलाफ फुटपाथ पर धरने पर बैठे और गले में तख्ती टांग कर जुलूस भी निकाला। इस संघर्ष में हमारे साथ जाने माने गांधीवादी विचारक संदीप पांडे भी शामिल थे।

बड़े पत्रकारों अखबारों के बारे में भी आदरणीय दुबे जी (यदि वे कोई हैं तो) अपने लेख में कहते हैं। आप खुद को काशी पत्रकार संघ से जुड़ा बताते हैं तो यह भी जानते हैं कि कैसे मजीठिया वेज बोर्ड के लिए लड़ाई लड़ने वाले इस संघ की सदस्यता से पत्रकारों का खून चूसने के लिए कुख्यात अखबार मालिकों ने अपने यहां काम करने वालों से इस्तीफा दिलवाया। इतना ही नहीं, उनसे यह भी लिखवा लिया कि उन्हें वेज बोर्ड की जरूरत ही नहीं है। मजीठिया बोर्ड को लेकर हम लोग जब लखनऊ में धरना प्रदर्शन करते हैं तो बड़े अखबारों को लोग कहीं नजर नहीं आते। इतना ही नहीं, ये लोग तो खुद अपने हित की खबरें भी मालिकों के डर से कहीं प्रकाशित नही करते।

महोदय आपने रायपुर के कार्यक्रम की खबर के कहीं न प्रकाशन की बात कही। जबकि आप, अगर वहीं थे, को पता है कि रमन सिंह के कार्यक्रम में रायपुर के सभी बड़े अखबारों के प्रतिनिधि मौजूद थे जहां उनके लिए पेंशन से लेकर आवास सुविधा देने तक का एलान हुआ। क्या ये सवाल उन बड़े पत्रकारों से नहीं पूछा जाना चाहिए कि अपनी बिरादरी के कल्याण की घोषणाएं न छाप कर वो किसका भला कर रहे थे। कम से कम पत्रकारों का तो नही। ये बात दीगर है कि उस दिन रविवार था अगले दिन जब प्रेस रिलीज भेजी गयी तो खबरें बहुत सारी जगहों पर छपी (इससे साबित होता है कि प्रेस रिलीज पत्रकारिता देश भर में फैली है).

सिद्धार्थ कलहंस

सदस्य कार्यसमिति, आईएफडब्लूजे

अध्यक्ष, लखनऊ श्रमजीवी पत्रकार यूनियन

09336154024


मूल खबर–

यही जुगाड़ू पत्रकार आईएफडब्लूजे अध्यक्ष के बगलगीर थे

के. विक्रम राव को सत्ता सुख लेना होता तो 1977 में जेल से ही चुनाव लड़ लोस पहुंच जाते और मंत्री बन जाते

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