नेता, विधायक, मंत्री बनकर आज लोगों में होड़ है ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने की. पर एक शख्स विधायक रहकर भी पैसे वाला न बन सका. सिर्फ इसलिए कि उसे ईमानदारी से प्यार था और ईमानदारी को वह आदमी जीता था. भगवती प्रसाद एक बार नहीं बल्कि दो बार उत्तर प्रदेश में विधायक रहे. पहली बार 1967 में और दूसरी मर्तबा 1969 में. इतना होने के बाद जब उनका आखरि वक़्त आया तो मजबूरन उनको एक चाय की दुकान खोल कर बैठना पड़ा ताकि वह अपना और अपने घर वालों का पेट पाल सके. आखिरकार 70 साल की उम्र में कल उन्होंने आखिरी सांस ली.
यूपी के श्रावस्ती जिला के एकोना रिज़र्व्ड असेंबली सीट से दो बार जीते भगवती प्रसाद आखिरी दौर में काफी बीमार थे. उनके घर वालों के पास उनका इलाज कराने तक को पैसे नहीं थे. इलाज न होने से बहराइच के सरकारी अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली. भगवती अपने पीछे तीन बेटे और एक बेटी छोड़ गए हैं. भगवती प्रसाद एक ऐसे सियासतदान थे जिन्होंने 1967 मे अपना पहला इलेक्शन लड़ने के लिए 1800 रुपये में अपनी भैंस बेचा और जीत कर असेम्बली पहुंचे. चुनाव में कुल सोलह सौ रुपये खर्च किए. दो साल बाद उत्तर प्रदेश असेंबली का जब दोबारा इलेक्शन हुआ तब भी भगवती प्रसाद ने सिर्फ लगभग 2000 रुपया में ही इलेक्शन लड़ कर दोबारा से उसी एकोना असेंबली सीट से मुन्तखब होकर उत्तर प्रदेश असेंबली तक पहुंचे.

दो बार एमएलए रहने के बावजूद भी भगवती प्रसाद ने कभी पैसे कमाने को तरजीह नहीं दी और खुले दिल से अवाम की खिदमत को ही अपना फ़र्ज़ समझा. जब कुर्सी गयी तो घर चलाने को चाय की दुकान खोल कर बैठना पड़ा. जब आखरी वक़्त आया तो पैसे न होने की वजह से इलाज से महरूम होकर उत्तर प्रदेश के बहरैच जिला के सरकारी अस्पताल के फर्श पर दम तोड़ दिया. भगवती प्रसाद के घर के हालात इतने खस्ता हैं कि उनके कफ़न के लिए भी पैसे उनके पड़ोसियों ने दिए. आज के
दौर का एक भी नेता या सरकार का कोई नुमाइंदा उनकी सुध लेने एक बार भी उनके पास नहीं गया.
भगवती प्रसाद जिस पार्टी के नेता थे, उस पार्टी के आज के एक नेता, खुले तौर पर यह दावा करते हैं कि उन्होंने अपने एक इलेक्शन में 8 करोड़ रुपये खर्च किये.. काश, इन सभी नेताओं के हाथ की मैल भी अगर भगवती प्रसाद को मिल जाती तो शायद उन्हें बचाया जा सकता था.. उनके अहले खानदान आज भी दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं, लेकिन, किसी को कोई परवाह नहीं, क्योंकि वह उस खानदान से वास्ता रखते हैं, जिसके मुखिया ने कभी पैसे नहीं कमाए, सादगी से अपनी ज़िन्दगी बसर करने की सोची और ता-ज़िन्दगी शराफत का दामन पकडे रखा.. भगवती प्रसाद सभी परेशानियों का सामना करते हुए हम से रुखसत तो हो गए, लेकिन जाते जाते हम सभी को एक सीख तो दे ही गए, साथ ही हम सभी के मुंह पर डला बेशर्मी का पर्दा भी दिखा गए..
शायद भगवती प्रसाद को आज के दौर का अंदाज़ा बखूबी लग चुका था, तब ही उन्होंने तीसरी बार सियासत के मैदान में कूदने से परहेज़ किया और चाय की दुकान खोल किसी तरह अपने घर वालों का गुज़ारा करने में ही अपनी बेहतरी समझी..
लेखक सैयद असदर अली दिल्ली स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.





