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केके का आना और उनकी बांछों का खिलना

केके उपाध्याय के लखनऊ हिन्दुस्तान में ज्वाइन करते ही कुछ लोगों की बांछें खिल गई हैं। इसमें वे लोग शामिल हैं, जो केके के करीबी और साथ ही नाकाबिल भी हैं। उन लोगों को इतनी बधाईयां मिल रही हैं, जितनी तो शायद खुद केके को भी नहीं मिल रही होंगी। शुक्रवार को केके उपाध्याय ने लखनऊ में बतौर संपादक कार्यभार संभाल  लिया। यह खबर जैसे ही कुछ पोर्टल और फोन पर लोगों को मिलीं वे चौड़े होकर घूमने लगे। यह वे लोग हैं जो स्वयं को केके का करीबी बताते हैं। खास बात यह है कि उन्हें कामधाम से कोई मतलब नहीं वह सिर्फ लॉबिंग में ही दिन-रात जुटे रहते हैं। कई लोग ऐसे हैं, जिनकी ताजपोशी केके ने की थी और सही तरीके से काम को अंजाम न दे पाने के कारण वे इस वक्त हाशिए पर चल रहे हैं। उन्हें एक बार फिर तेल लगाकर अपने दिन बहुरने का इंतजार है।

केके उपाध्याय के लखनऊ हिन्दुस्तान में ज्वाइन करते ही कुछ लोगों की बांछें खिल गई हैं। इसमें वे लोग शामिल हैं, जो केके के करीबी और साथ ही नाकाबिल भी हैं। उन लोगों को इतनी बधाईयां मिल रही हैं, जितनी तो शायद खुद केके को भी नहीं मिल रही होंगी। शुक्रवार को केके उपाध्याय ने लखनऊ में बतौर संपादक कार्यभार संभाल  लिया। यह खबर जैसे ही कुछ पोर्टल और फोन पर लोगों को मिलीं वे चौड़े होकर घूमने लगे। यह वे लोग हैं जो स्वयं को केके का करीबी बताते हैं। खास बात यह है कि उन्हें कामधाम से कोई मतलब नहीं वह सिर्फ लॉबिंग में ही दिन-रात जुटे रहते हैं। कई लोग ऐसे हैं, जिनकी ताजपोशी केके ने की थी और सही तरीके से काम को अंजाम न दे पाने के कारण वे इस वक्त हाशिए पर चल रहे हैं। उन्हें एक बार फिर तेल लगाकर अपने दिन बहुरने का इंतजार है।

केके उपाध्याय ने हिन्दुस्तान यूपी में बहुत समय दिया। बरेली, आगरा और मेरठ में तो वे काफी दिन रहे भी। इसी दौरान उन्होंने कई ऐसे लोगों को भर्ती कर लिया, जिनको काम-धाम तो आता नहीं था और अमर उजाला में हाशिए पर चले गए थे। उनकी जगह उनके जूनियर को इंजार्च बनाकर बैठा दिया गया था। ऐसे में ये लोग केके की शरण में आए। केके ने इन लोगों को इसलिए हिन्दुस्तान में ले लिया क्योंकि ये लोग उनकी जी-हूजूरी कर रहे थे। चुंकि ज्यादातर लोग अमर उजाला में थे, सो केके को उन्हें हिन्दुस्तान में लाने में ज्यादा दिक्कत भी नहीं हुई। आखिर जिस अखबार का प्रधान संपादक से लेकर हर कर्मचारी अमर उजाला का हो वहां यह काम क्या मुश्किल है। केके ने न सिर्फ ऐसे लोगों की हिन्दुस्तान में इंट्री कराई बल्कि पैसे और पद भी ज्यादा दिला दिया। जो लोग अमर उजाला में सब एडिटर थे, उन्हें सीनियर सब और जो लोग सीनियर सब थे उन्हेंं चीफ सब बना दिया। यानी लगभग सबको एक-एक पद बढ़ा कर दिया गया। इसी क्रम में उनका वेतन भी बढ़ गया।

यही नहीं सभी लोगों को किसी न किसी जगह का इंचार्ज भी बना दिया गया। जब तक केके यूपी की विभिन्न यूनिटों में रहे तब तक तो सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा, उनके बिहार जाते ही समीकरण बदल गए। नए संपादकों ने जब देखा कि पुराने लोग सही परिणाम नहीं दे पा रहे हैं रहे हैं तो उन्हें हटाकर नए लोगों को लाया गया। हालांकि बिहार में रहते हुए भी केके ने इन लोगों को बचाने की काफी कोशिश की। लेकिन नाकाबिल लोग आखिर कब तक ढोए जाते। और हुआ भी ऐसा ही। सबको इधर से उधर किया जाने लगा। जिन लोगों की कहीं और जुगाड़ थी वे तो चले गए। लेकिन जिनकी कहीं जुगाड़ नहीं हो पाई वे दिन काटते रहे। अब उनका इंतजार खत्म हो गया। उनके दिन फिर से बहुरने वाले हैं। यह सोचकर वे लोग काफी खुश हैं। मजे की बात यह है कि उन्होंने खुशी अपने तक ही सीमित नहीं रखी, सबको बांटी भी। जिन लोगों की पहुंच केके तक नहीं हैं, वे उन चहेतों को फोन करके बधाई दे रहे हैं। चहेते भी कम नहीं वे खुशी-खुशी बधाई स्वीकार भी कर रहे हैं और पूरे यूपी में छा जाने की बात भी कर रहे हैं।

दरअसल केके उपाध्याय हिन्दुस्तान के प्रधान संपादक शशि शेखर के खास माने जाते हैं। शशि शेखर ने केके को अपनी स्टाइल में काम करने की पूरी छूट दे रखी है। हालांकि यह भी सच है कि केके बहुत सारे काबिल लोगों को हिन्दुस्तान में लाए। इससे अखबार की सेहत भी सुधरी, लेकिन अपने गुरु शशि शेखर से केके ने एक खास गुण ले लिया। और वह गुण है, अपने नीचे कुछ चूतिया लोगों को रखने का। जो अखबार का काम छोड़कर हर काम करने के लिए तैयार रहें। जो आपको पूजते रहें और यस सर यस सर कहते रहें। यही हुआ भी। केके यूपी की जिन यूनिटों में भी रहे वहां से जाने के बाद भी एक-दो लोग ऐसे छोड़ गए जो पल-पल की खबर उन्हें देते रहें। ये लोग अपने काम को ठीक प्रकार से अंजाम भी देते रहे। अब उस काम का परिणाम आने का वक्त हो गया है।

आगरा और बरेली में अभी भी ऐसे लोग हैं जो केके के जाने के बाद भी लगातार उनके सम्पर्क में रहे और हर अंतरिक जानकारी केके को देते रहे। इसलिए केके को भले लखनऊ और पूर्वी उत्तर प्रदेश का काम दिया गया हो, लेकिन उनकी नजर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आगरा और बरेली पर बनी रहेगी। हालांकि माना यह भी जा रहा है कि अनिल भास्कर को भले पश्चिमी उत्तर प्रदेश का हेड बनाया गया हो, लेकिन उन्हें मेरठ तक ही सीमित होकर रह जाना पड़ेगा। आगरा और बरेली का काम भी अप्रत्यक्ष रूप से केके ही देखेंगे। यानी वे जो निर्णय लेंगे वही अंतिम निर्णय होगा। इन यूनिटों में जितने भी केके के चहेते और नाकाबिल लोग हाशिए पर हैं वे अब बदला लेने के मूड में आ गए हैं, और खूलेआम यह कहते घूम रहे हैं कि देखें अब कौन हमारा क्या बिगाड़ लेगा। ऐसे में जहां एक ओर केके के लिए लखनऊ की स्थिति को समझना और वहां के लोगों को यह विश्वास दिलाना कि वे उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाएंगे से ज्यादा मुश्किल काम इन चहेतों के लिए कुछ करना रहेगा। उम्मीद पर तो दुनिया कायम है तो यह लोग क्यों नहीं। जानकार मान रहे हैं कि जल्द ही पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी बड़ा सत्ता परिवर्तन देखने को मिले तो कोई बड़ी बात नहीं है। अब तो बस तेल देखिए और तेल की धार देखिए। (कानाफूसी)

लखनऊ से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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