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राहुल बारपुते ने राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी जैसे प्रखर संपादक देश को दिए

इंदौर के लिए यह एक यादगार दिन था। राहुल बारपुते की बेमौसम याद। यह न बारपुते की जयंती थी, न पुण्यतिथि। उनके देहांत के 17 साल बाद पहली बार उस लेखनी का कमाल सामने आया, जिसने पत्रकारों और पाठकों की एक पीढ़ी को प्रभावित किया। एक छोटे से शहर में रहकर पूरे देश की पत्रकारिता में अपनी धाक जमाई। राहुल बारपुते का अविस्मरणीय योगदान सिर्फ इंदौर या मध्यप्रदेश की पत्रकारिता तक ही सीमित नहीं है।

इंदौर के लिए यह एक यादगार दिन था। राहुल बारपुते की बेमौसम याद। यह न बारपुते की जयंती थी, न पुण्यतिथि। उनके देहांत के 17 साल बाद पहली बार उस लेखनी का कमाल सामने आया, जिसने पत्रकारों और पाठकों की एक पीढ़ी को प्रभावित किया। एक छोटे से शहर में रहकर पूरे देश की पत्रकारिता में अपनी धाक जमाई। राहुल बारपुते का अविस्मरणीय योगदान सिर्फ इंदौर या मध्यप्रदेश की पत्रकारिता तक ही सीमित नहीं है।

वे सिर्फ हिंदी पत्रकारिता में भी अपने कृतित्व के लिए याद नहीं किए जाएंगे। उन्होंने भारत की पत्रकारिता में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। उन्हें आदर्श संपादकीय नेतृत्व के रूप में हमेशा याद किया जाएगा, जिन्होंने एक समृद्ध पीढ़ी तैयार की और भावी पीढिय़ों के लिए अद्भुत मिसालें पेश कीं। भाषा के लिहाज से बेहद सजग और हर विधा में गहराई से जुड़े एक संवेदनशील रचनाधर्मी व्यक्तित्व। वे आज की पत्रकारिता के लिए एक उजली आशा हैं। एक प्रेरणा। एक ऊर्जावान उपस्थिति।

इंदौर के आनंद मोहन माथुर सभागार में रविवार की शाम इंदौर प्रेस क्लब के प्रतिष्ठा प्रसंग 'राहुल स्मरण' में यह उद्गार देश के नामचीन संपादकों ने व्यक्त किए। प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश, जनसत्ता के संपादक ओम थानवी, नईदुनिया के प्रधान संपादक श्रवण गर्ग, वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक, अभय छजलानी और राहुल देव अतिथि वक्ता थे। पत्रकार विजय मनोहर तिवारी द्वारा संकलित अहम दस्तावेज 'राहुल बारपुते' का विमोचन भी किया गया। यह राहुलजी के 30-40 साल पुराने संपादकीय, आलेख, रिपोर्ताज एवं नियमित कॉलम का एकमात्र दुर्लभ संग्रह है, जो उनके देहावसान के 17 साल बाद प्रकाशित हुआ। समारोह में श्री हरिवंश ने कहा कि आज की पत्रकारिता में राहुलजी के कृतित्व से आज भी उम्मीदें जागती हैं। अपने दौर में अगर वे श्रेष्ठ कर पाए तो यह हम सबके लिए एक सबक है कि हम भी अपने समय की जरूरतों के मुताबिक अपने कर्तव्य में खरे उतरें। डॉ. वैदिक ने कहा कि राहुलजी की खूबी ही यही थी कि न सिर्फ वे अपनी भूमिका में खरे उतरे बल्कि उन्होंने एक पूरी पीढ़ी को भी तैयार किया। दूसरों की प्रशंसा और प्रोत्साहन में वे वाकई खुला आसमान थे, जैसा कि राजेंद्र माथुर ने उनके बारे में कहा।

श्री थानवी ने कहा कि सच तो यह है कि हमने राहुल बारपुते के किस्से ही सुने हैं। दिल्ली में प्रभाष जोशी और राजेंद्र माथुर जैसे शिखर संपादक इस बात का ताकतवर परिचय थे कि राहुल बारपुते किस कदकाठी के संपादक रहे होंगे। पत्रकारिता में उनका योगदान बहुआयामी है। श्री देव ने कहा कि बारपुते ने इंदौर जैसे छोटे शहर से बड़ी से बड़ी मिसालें सहज रूप में कायम कीं। राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी जैसे प्रखर संपादक देश को दिए। उनकी लेखनी आज भी प्रासंगिक है। वे दूरदृष्टा चिंतक थे। श्री गर्ग ने कहा कि राहुलजी और उनके समय की पत्रकारिता को याद करना इंदौर में केदारनाथ के दर्शन करने जैसा अनुभव है, लेकिन यह दुखद है कि पत्रकारिता में उनके अवदान को प्रयासपूर्वक भुलाने की कोशिश की गई।

यह अनायास स्मरण एक ऐसे आकाश को याद करना है, जिसने प्रतिभाओं को उड़ान के अनंत अवसर दिए। आज के संपादकों के लिए ऐसा कर पाना नामुमकिन ही लगता है। यह वाकई वे ही कर सकते थे, जिन्हें खुद पर भरोसा था। उन्होंने हमेशा अपने से श्रेष्ठ को भी तबज्जो दी । श्री छजलानी ने कहा कि साठ और सत्तर के दशक में नईदुनिया को पत्रकारिता का विश्वसनीय ब्रांड बनाने में राहुलजी की भूमिका ही महत्वपूर्ण थी। वे सहज-सरल भाषा के प्रति बेहद सजग संपादक थे। कुछ लिखने के पहले काफी कुछ पढऩे का मंत्र अपने सहयोगियों को उन्होंने ही दिया। मध्यप्रदेश के पूर्व महाधिवक्ता आनंद मोहन माथुर ने राहुल बारपुते के साथ अपने पांच दशक पुराने आत्मीय दोस्ताना रिश्ते को याद किया। ३७५ पेज की पुस्तक के प्रकाशक मध्यप्रदेश माध्यम के एडिशनल डायरेक्टर सुरेश तिवारी ने कहा कि ऐसी और रचनाओं को प्रकाशित करने में माध्यम सदैव तत्पर है। मंच पर राहुल बारपुते की पोती रेवा नांदेड़कर भी मौजूद थीं।

अतिथियों का स्वागत प्रवीण कुमार खारीवाल, अरविंद तिवारी, सुनिल जोशी, कमल कस्तूरी, अतुल लागू, शशीन्द्र जलधारी, सुरेश तिवारी, डा. पल्लवी अड़ाव, अरुण डिके, अरविंद अग्निहोत्री, बालकृष्ण गायके, किशोर कुमार रावल, सत्यानारायण व्यास, अशोक वानखेड़े, डॉ. हनीष अजमेरा आदि ने किया। प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल ने स्वागत भाषण में क्लब की रचनात्मक गतिविधियों की जानकारी दी। पुस्तक के सूत्रधार विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि किताब के बहाने राहुलजी के रचना संसार और उनके करीबी मित्रों व सहयोगियों से निरंतर संपर्क एक तीर्थयात्रा के पवित्र अनुभव जैसा था। उन्होंने कहा कि यह काम मूलत: पत्रकारिता के शिक्षण संस्थानों को करना चाहिए था ताकि विद्यार्थियों को लिखने का सलीका आए और इस बहाने वे पुरानी पीढ़ी के महान् संपादकों के व्यक्तित्व से परिचित हों। कार्यक्रम का संचालन मशहूर चित्रकार प्रभु जोशी ने किया। आभार इंदौर प्रेस क्लब के महासचिव अरविंद तिवारी ने माना।

कार्यक्रम में मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष अशोक कुमार पांडे, शास्त्रीय गायिका व कुमार गंधर्व की सुपुत्री कलापिनी कोमकली, प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता मुकुंद कुलकर्णी व डॉ. वसुंधरा कालेवार समेत कई लेखक, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद थे। समारोह में राजेश जैन द्वारा राहुल बारपुते पर केंद्रित एक स्लाइड शो प्रस्तुत किया गया, जिसमें राहुलजी के अत्यंत दुर्लभ चित्रों के जरिए उनकी सादगी से भरी जीवनशैली की प्रेरक झांकी पेश की गई। इस मौके पर राहुलजी पर विशेष रूप से प्रकाशित 'प्रेस क्लब टाइम्स' और इंदौर प्रेस क्लब की स्मारिका 'मीडिया खड़ा बाजार में' का भी विमोचन हुआ।

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