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‘प्रभात खबर’ ने झारखंड के बेहद गरीब गांव जमुनियां को लिया गोद

झारखंड में देवघर जिला से तक़रीबन बीस किलोमीटर दूर एक गांव। गांव का नाम जमुनिया। प्रखंड-मोहनपुर। पंचायत- बिचगढ़ा। झारखंड के आदिवासी गांव जमुनिया का सच ये है कि आजादी के साठ साल बीत जाने के बावजूद आधारभूत संरचना और बुनियादी सुविधाओं से मरहूम है। गांव तक जाने के लिए कोई सड़क नहीं न ही पक्की और न ही कच्ची या यूँ कहे काफी घुमावदार और बेतरतीब रास्ता। इन्हीं परेशानियों के बीच अवस्थित आदिवासियों का गांव जमुनियां।

झारखंड में देवघर जिला से तक़रीबन बीस किलोमीटर दूर एक गांव। गांव का नाम जमुनिया। प्रखंड-मोहनपुर। पंचायत- बिचगढ़ा। झारखंड के आदिवासी गांव जमुनिया का सच ये है कि आजादी के साठ साल बीत जाने के बावजूद आधारभूत संरचना और बुनियादी सुविधाओं से मरहूम है। गांव तक जाने के लिए कोई सड़क नहीं न ही पक्की और न ही कच्ची या यूँ कहे काफी घुमावदार और बेतरतीब रास्ता। इन्हीं परेशानियों के बीच अवस्थित आदिवासियों का गांव जमुनियां।

वर्ष 2000 में बिहार से अलग होकर झारखण्ड का निर्माण हुआ, झारखण्ड के भले आदिवासियों का सपना पूरा होने के लिए, परन्तु राज्य निर्माण के तेरह वर्ष बीत जाने के बाद भी आदिवासियों का तो कल्याण नहीं हुआ परन्तु इन आदिवासियों के नाम पर राजनीति करने वाले इनके तथाकथित रहनुमाओं ने अपनी आर्थिक हैसियत बढाई, उस पर तब जबकि अब तक झारखण्ड में सिर्फ आदिवासी ही मुख्यमंत्री रहा हो।

खैर इस आदिवासी गांव में लोगों ने अभी तक सिर्फ बिजली का पोल देखा है, बिजली का तार देखा है पर अपने गांव में बिजली नहीं देखा है। अब इन्हें इनकी तक़दीर कहें या नियति, इस गांव में यदि कोई बीमार भी पड़े तो अस्पताल का नाम भी इनके लिए एक सपना जैसा ही है।

इन तमाम तरह की परेशानियों के बीच जमुनियां गांव के लोगों के लिए "प्रभात खबर" सामने आया है। प्रभात खबर के देवघर संस्करण ने इस गांव को गोद लिया है। प्रभात खबर के देवघर यूनिट के स्थानीय संपादक सुशील भारती के अनुसार अखबार के प्रधान संपादक हरिवंश जी के निर्देशानुसार सुदूर आदिवासी गांव में विकाश की रोशनी पहुँचाने के लिए इन तरह के सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाना है।

गौरतलब हो कि प्रभात खबर ग्रामीण झारखण्ड-बिहार के पाठकों को मद्देनज़र रखते हुए 'पंचायतनामा' का भी प्रकाशन करता है। प्रभात खबर और इसके प्रधान सम्पादक को साधुवाद। इसलिए कि इस कॉर्पोरेट एवं गलाकाट प्रतियोगिता के समय में भी ऐसा कोई अखबार है जिसे ग्रामीण भारत की चिंता है।

अनंत झा की रिपोर्ट.

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