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पीआर कंपनी के ‘मीडिया महारथी’ प्रोग्राम में बवाल, कई संपादकों ने जताया रोष

देश की एक पीआर कंपनी की तरफ से बीते दिनों हिंदी वालों में से मीडिया महारथी तलाशने की कवायद शुरू की गई. इसके लिए बाकायदा एक जूरी बनाई गई. जूरी के सभी सदस्यों को अच्छे खासे पैसे व सुविधाएं दी गई. मीडिया महारथी बनने के लिए लालायित पत्रकारों ने अपना नामिनेशन भेजना शुरू किया. कई वरिष्ठों ने खुद का नाम दूसरों से भिजवाया. मालिक से लेकर संपादक तक, वरिष्ठ पत्रकार से लेकर जूनियर पत्रकार तक, मार्केटियर से लेकर दलाल तक… सबने नामांकन किया… कभी पत्रकार अपनी पहचान जाहिर नहीं करता था और आज परम बाजारू माहौल में पत्रकार मीडिया महारथी का तमगा पाने और सम्मानित होने के लिए लार टपकाता फिरता है.

देश की एक पीआर कंपनी की तरफ से बीते दिनों हिंदी वालों में से मीडिया महारथी तलाशने की कवायद शुरू की गई. इसके लिए बाकायदा एक जूरी बनाई गई. जूरी के सभी सदस्यों को अच्छे खासे पैसे व सुविधाएं दी गई. मीडिया महारथी बनने के लिए लालायित पत्रकारों ने अपना नामिनेशन भेजना शुरू किया. कई वरिष्ठों ने खुद का नाम दूसरों से भिजवाया. मालिक से लेकर संपादक तक, वरिष्ठ पत्रकार से लेकर जूनियर पत्रकार तक, मार्केटियर से लेकर दलाल तक… सबने नामांकन किया… कभी पत्रकार अपनी पहचान जाहिर नहीं करता था और आज परम बाजारू माहौल में पत्रकार मीडिया महारथी का तमगा पाने और सम्मानित होने के लिए लार टपकाता फिरता है.

खैर, पीआर कंपनी ने कल दिल्ली के एक बड़े होटल में लाखों रुपये खर्च कर मीडिया महारथी ऐलान करने का कार्यक्रम रखा. इस पीआर कंपनी के दैनिक जागरण वालों से खूब अच्छे रिश्ते हैं और जागरण वालों के विज्ञापन कांटीनिवस इस पीआर कंपनी के उपक्रमों पर संचालित होते रहते हैं, सो नंबर वन मीडिया महारथी का एवार्ड दैनिक जागरण के मालिक और संपादक संजय गुप्ता को मिलना ही थी. फिर दूसरे नंबर पर दैनिक भास्कर के मालिक और संपादक सुधीर अग्रवाल को यह तमगा मिलना ही था. दुर्भाग्य ये कि मीडिया महारथी में पत्रकारों के साथ-साथ मालिकों को भी शामिल कर लिया गया और नंबर एक व नंबर दो मीडिया महारथी मालिकों को घोषित कर दिया गया. इससे दिग्गज सपादकों को काफी गुस्सा आया.. कई संपादकों ने इस रेटिंग व रैंकिंग के सिस्टम की जमकर आलोचना मौके पर ही की और देखते ही देखते कार्यक्रम में बवाल मच गया.

कार्यक्रम का आयोजन विशुद्ध बाजारू लोगों ने किया था तो इसका संचालन भी बेहद घटिया और बाजारू भाषा में किया गया. दोषपूर्ण हिंदी व अंग्रेजी के मिक्सचर से पैदा नष्ट भ्रष्ट हिंग्लिश के जरिए संचालिका बके बोले जा रही थीं जिस पर वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने आपत्ति की और हिंदी की यह दुर्दशा न करने की अपील की. राहुल देव की आपत्ति को कई अन्य ने सपोर्ट किया. बाद में अनुराग बत्रा, जो पीआर कार्यक्रमों के सरगना हैं और जिनका कंटेंट से कभी कोई लेना देना नहीं रहा, विशुद्ध मार्केटियर और लायजनर जीव हैं, ने मंच पर आकर अंग्रेजी में सफाई दी. पर हिंदी वाले पत्रकारों व संपादकों को सब कुछ बड़ा अजीब लग रहा था. पूरे आयोजन में हंगामा होता रहा. कई संपादकों ने रैंकिंग व रेटिंग के इस घटिया तरीके की जमकर निंदा की.

 

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