देवास से इंदौर लौटकर Rahul Dev और हरिवंश की सम्मति से चौराहे की चाय के लिए रुके। इंदौर की परंपरा के अनुरूप बहुत जायकेदार चाय थी। लेकिन प्लास्टिक के कप में स्वाद छीज गया था। और कप का आकार? उसे देखकर कभी चाय को देखते, कभी चाय वाले को। पहले लगा कि चखाने भर के लिए छोटे कप हैं, असल चाय का कप बाद में आएगा। चाय वाला बोला — आजकल यही चलता है! कुछ वह झेंपा, कुछ हम। राहत के लिए राहुलजी ने तसवीर खींची। आप देखिए, हथेली में छुपा कप थोड़ा दिख जाय शायद! उसे कप कहना भी रियायत ही होगी।
राहुल देव बताते हैं, यह आइडिया शायद मुंबई से निकला है जहां 'कटिंग' चाय चलती है। जोधपुर में लोग इसे 'डोज' (दवा की खुराक की मानिंद) कहा करते थे और बीकानेर में बट्टे-चाय (एक चाय दो कप में यानी एक बट्टे दो; दो चाय और तीन कप यानी दो बट्टे तीन!)। वहां कहीं-कहीं 12 नंबर (एक चाय, दो कप); 34 नंबर (तीन चाय, चार कप) का संकेत-शास्त्र भी चलता था। बहरहाल, डोज हो चाहे बट्टे चाय, इतना छोटा कप मैंने तो पहले कभी देखा नहीं! वह भी इतने नाजुक प्लास्टिक का। मेरे सहयोगी अमर का कहना है कि दिल्ली स्टेशन पर भी छोटे आकार कप मिलते हैं। शायद मेरा ध्यान उन पर नहीं गया है।

पर दिल्ली हो चाहे इंदौर, इस तथाकथित कप को तो उँगलियों के बीच थामे रखना भी कम टेढ़ा नहीं। चाय सुरकना और मशक्कत मांगता है। कहीं इसीलिए तो आकार छोटा नहीं? कि फटाफट पी डालिए। बहरहाल, हाल तक मैंने तो बस अड्डों पर चाय और दूध के सकोरे देखे हैं। प्लेट सहित चीनी-मिट्टी वाले कप भी, जिनमें लोग आधी चाय प्लेट में डाल साथी से साझा कर लिया करते थे। प्लास्टिक के दौर में सकोरा गया, कुम्हार का रोजगार गया, स्वाद गया, परिमाण गया, साझा भी गया।
वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.
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