कभी मैं रंगकर्मी था। अभिनय, नाट्य-लेखन, निर्देशन, अन्य संयोजन। इस कारण जब सरबुलंद संपादक राहुल बारपुते के बारे में जाना कि वे रंगमंच पर भी सक्रिय थे, मुझे निजी तौर पर बहुत ख़ुशी हुई। उनकी रुचियाँ इतनी विविध और व्यापक थीं कि इस मामले में शायद ही कोई उनके समकक्ष रखा जा सके। देवास में कुमार गंधर्व निवास में दीवार पर एक तसवीर मिली, जिसमें कुमारजी के साथ संपादकाचार्य राहुल बारपुते तानपुरे पर संगत करते दिखाई दिए (देखिए तसवीर, राहुल बारपुते जी ठीक दाएं हैं )।
यह तसवीर काठमांडू की है। Kalapini Komkali ने बताया कि राहुलजी ने पेरिस में भी कुमारजी के साथ संगत की थी। दरअसल, कुमार गंधर्व और राहुल बारपुते में घनिष्ठ मित्रता थी। अक्सर वे कुछ रोज के लिए इंदौर से देवास आ जाते थे। कुमार जी के कमरे में उनके पलंग के सामने अपना बिस्तर लगवाते। वजह? रात दोनों की जब भी आँख खुल जाय, शाम की बहस वहीं से फिर शुरू कर सकें जहाँ छूटी थी!

और आजकल के संपादक? कोई मेरी तरह निर्गुण सुनता-सुनवाता है और फेसबुक पर दिलबस्तगी में लगा रहता है; कोई 'गंभीर' टिप्पणियां लिखकर 'विचारक' कहाने की महत्त्वाकांक्षा पाले नजर आता है! मैं तो सेवानिवृति का सौभाग्य मिलते ही फिर से थियेटर की ओर मुंह करने की सोचता हूँ! इंदौर यात्रा की यही प्रेरणा है। आगे खुदा जाने!
वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से साभार.
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