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मधुसूदन आनन्द, कमर वहीद नकवी, एनके सिंह वगैरह ने विरोध करते हुए कहा- रैंकिंग का क्या मतलब है?

शनिवार की रात कनॉट प्लेस के होटल पार्क में मीडिया महारथी समारोह में जाने का मौका मिला। इसके आयोजक मूलतः कारोबारी हैं और वे मीडिया के बिजनेस पक्ष से जुड़े मसलों पर सामग्री प्रकाशित करते हैं। हिन्दी के पत्रकारों के बारे में उन्हें सोचने की जरूरत इसलिए हुई होगी, क्योंकि हिन्दी अखबारों का अभी कारोबारी विस्तार हो रहा है। बात को रखने के लिए आदर्शों के रेशमी रूमाल की जरूरत भी होती है, इसलिए इस संस्था के प्रमुख ने वह सब कहा, जो ऐसे मौके पर कहा जाता है।

शनिवार की रात कनॉट प्लेस के होटल पार्क में मीडिया महारथी समारोह में जाने का मौका मिला। इसके आयोजक मूलतः कारोबारी हैं और वे मीडिया के बिजनेस पक्ष से जुड़े मसलों पर सामग्री प्रकाशित करते हैं। हिन्दी के पत्रकारों के बारे में उन्हें सोचने की जरूरत इसलिए हुई होगी, क्योंकि हिन्दी अखबारों का अभी कारोबारी विस्तार हो रहा है। बात को रखने के लिए आदर्शों के रेशमी रूमाल की जरूरत भी होती है, इसलिए इस संस्था के प्रमुख ने वह सब कहा, जो ऐसे मौके पर कहा जाता है।

हिन्दी पत्रकारिता को 'समृद्ध' करने में जिन समकालीन पत्रकारों की भूमिका है, इसे लेकर एक राय बनाना आसान नहीं है इसलिए उस पर चर्चा करना व्यर्थ है। पर भूमिका और समृद्ध करना जैसे शब्दों के माने क्या हैं, यही स्पष्ट करने में काफी समय लगेगा। अलबत्ता यह कार्यक्रम दो-तीन कारणों से मनोरंजक लगा। इसमें उस पाखंड का पूरा नजारा था, जिसने मीडिया जगत को लपेट रखा है।

इस कर्म के साथ एक अर्से से जुड़ाव के दौर में मुझे हमेशा महसूस हुआ कि इस व्यवसाय का पाखंड से चोली-दामन का रिश्ता है। इस मामले में कोई संजीदा काम सम्भव भी है तो उसे सहारा देने वाली ताकतें बेहद कमजोर हैं। यह पाखंड तभी खुलता है जब इसमें शामिल व्यक्तियों और शक्तियों का आपसी टकराव होता है। जब तक दाँव पर मामूली बातें थीं, जीवन सरल था। अब जीवन और समाज के सितारे मीडिया के सहारे तय हो रहे हैं तो मनोकामनाएं बढ़ रहीं हैं। मूल बात 'पावर' और 'निहित स्वार्थों' की हैं। इस कार्यक्रम में जिन चार बातों पर मैने ध्यान दिया वे इस प्रकार थीं:-

1.हिन्दी की ताकत

2.पत्रकारिता का प्रश्न

3.पत्रकारों का सम्मान

4. हिन्दी का कारोबार और सत्ता-प्रतिष्ठान (केवल सरकारी सत्ता नहीं)

कार्यक्रम चौथे बिन्दु पर था। पहली तीन बातों का संदर्भ मात्र था। कार्यक्रम शुरू होते वक्त ही ज्यूरी के एक सदस्य पुष्पेश पंत ने दो-तीन विसंगतियों की ओर इशारा किया, जिनसे पता लगता था कि सारा मामला किस दिशा में जाएगा। संचालक के अंग्रेजी में बोलने को लेकर राहुल देव ने आपत्ति व्यक्त की। इस आपत्ति पर दो-चार लोग और समर्थन में आगे आए। पुष्पेश जी कार्यक्रम छोड़कर चले गए। आजकल बोलचाल में अंग्रेजी का इस्तेमाल चलता है। पर हिन्दी पत्रकारिता से जुड़े कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र से लेकर मंच संचालन तक में अंग्रेजी का इस्तेमाल अटपटा लगता है। संचालक चाहते तो यह कह सकते थे कि क्षमा करें, हम कोशिश करेंगे कि हिन्दी का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल हो पर आदत से मजबूर होकर कुछ बोल जाएं तो उसकी अनदेखी कर दें। बहरहाल ऐसा कुछ कहा नहीं गया।

इसके बाद जब रैंकिंग आने लगी तब मधुसूदन आनन्द, कमर वहीद नकवी, एनके सिंह वगैरह ने उसका विरोध किया। कहा रैंकिंग का क्या मतलब है? मुझे लगता है यह कार्यक्रम रैंकिंग पर ही केन्द्रित था। यदि सारे नाम अकारादिक्रम से होते तो महारथियों की सूची में रह क्या जाता? कुछ नाम डाले ही जाने थे। देश की पत्रिकाएं इंजीनियरी कॉलेजों की रैंकिग कर रही हैं। फोर्ब्स से लेकर इंडिया टुडे और इंडियन एक्सप्रेस तक 'पावर और पावरफुलों' की सूची जारी करते हैं। इस संस्था की दिलचस्पी ऐसी सूची बनाने में है तो इसमें किसी को क्या आपत्ति है? मूल बात साख की है, जिसे वे खुद देखें। यह सूची कितनी सहज लगती है इसे लेकर अलग से चर्चा की जा सकती है। पर मोटी बात यह है कि हिन्दी बिजनेस के साथ जो रिश्ता इसके संचालक बनाना चाहते हैं, वह बना लिया।

यह सूची भ्रमों से भरी है। पर यह देखना उनका काम है, जिन्होंने इसे बनाया। इसमें जो नाम हैं वे ज्यूरी की समझ में सही हैं तो उसे चुनौती देना बेकार है, पर जो नाम नहीं हैं उनके बारे में सवाल मन में उठते हैं। मसलन इसमें दिल्ली प्रेस का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। पत्रिकाओं के मामले में सम्भवतः यह देश की किसी भी भाषा का सबसे बड़ा प्रकाशन समूह है। टेलीविजन मीडिया में जी समूह देश में सबसे पहले प्रवेश करने वाला समूह है। इसके दो पत्रकारों के नाम एक जगह नीचे की ओर नजर आते हैं। टॉप का नाम कोई नही। हिन्दी अखबारों में अमर उजाला और नवभारत टाइम्स का क्षीण सा प्रतिनिधित्व है, लोकमत का नाम नहीं है। देशबंधु और नवभारत का अता-पता नहीं। हिन्दी वैबसाइटों के नाम पर बीबीसी के निधीश त्यागी का नाम ही है, बाकी कोई नाम नहीं।

पत्रकारिता को समृद्ध करने की परिभाषा से चलें तो इस मौके पर जारी की गई 'कॉफी टेबल' बुक में, जो देखने में ब्रोशर जैसी लगती है, पहले 25 रैंक बड़े फोटो वाले हैं, बाकी छोटे फोटो वाले। शायद शुरू में योजना टॉप 50 महारथियों की सूची बनाने की थी, पर रैंक के कारण 66 महारथी शामिल हुए हैं। कुछ रैंक के कारण प्रसन्न या दुखी होंगे और बाकी बाहर रहने के कारण नाखुश होंगे।

हिन्दी की ताकत सब मानते हैं, पर इसके कारोबारी पक्ष का दोहन करने पर ही सारा जोर है। पत्रकारिता का क्या प्रश्न है और इसके कौन से मसलों पर विचार करने की क्या जरूरत है, इसका कोई फोरम दिखाई नहीं पड़ता। पत्रकारों के सम्मान के बारे में पता लगाने के लिए इन संस्थानों के नए पत्रकारों से बात करने पर काफी मनोरंजक सामग्री मिलती है।

चलते-चलाते मैं बता दूँ कि मेरा पसंदीदा मनोरंजन कार्यक्रम निर्मल बाबा का दरबार है। कई समाचार चैनलों पर आता है, पर इस रैंकिंग में कहीं नहीं है। अच्छी बात यह है कि हिन्दी मीडिया घरानों पर शक्तियों की किरपा आ रही है। लगता है इनके मालिक हरी चटनी के साथ समोसे खाते हैं जिससे इनका मुनाफा बढ़ रहा है। उम्मीद है अगले साल की सूची में कुछ और नाम होंगे। चलते-चलाते यह सवाल मन में आता है कि ऐसी रैंकिग हिन्दी पत्रकारों के बारे में बनाई गई, अंग्रेजी महारथियों की क्यों नहीं ? और यह भी कि अन्ना हजारे का यहाँ क्या काम था?

लेखक प्रमोद जोशी वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग 'जिज्ञासा' से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.


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