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जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ की हालत पर जनसंदेश प्रबंधन की तरफ से वक्तव्य

जनसंदेश टाइम्स लखनऊ की हालत निरंतर सुधार पर है। एक वर्ष के अंधेरे समय का असर इतना जल्द खत्म तो नहीं हो जायेगा लेकिन पूरे कैनवस पर कालिमा खत्म हो रही है, उजास दिखायी पड़ने लगी है। मार्च के पहले के समाचारपत्र को देखें और आज के समाचारपत्र को तो आप को अनेक परिवर्तन दिखायी पड़ेंगे। रंगीन पृष्ठों की संख्या बढ़ी है। स्थानीयता के अनुसार संस्करणों की संख्या भी बढ़ी है। फीचर पन्नों में आमूल परिवर्तन हुआ है।

जनसंदेश टाइम्स लखनऊ की हालत निरंतर सुधार पर है। एक वर्ष के अंधेरे समय का असर इतना जल्द खत्म तो नहीं हो जायेगा लेकिन पूरे कैनवस पर कालिमा खत्म हो रही है, उजास दिखायी पड़ने लगी है। मार्च के पहले के समाचारपत्र को देखें और आज के समाचारपत्र को तो आप को अनेक परिवर्तन दिखायी पड़ेंगे। रंगीन पृष्ठों की संख्या बढ़ी है। स्थानीयता के अनुसार संस्करणों की संख्या भी बढ़ी है। फीचर पन्नों में आमूल परिवर्तन हुआ है।

समूचे अखबार में एक विजन की झलक मिलने लगी है। यह अखबार किसी राजनीतिक प्रतिबद्धता का कायल नहीं है। इसकी एक सांस्कृतिकी धीरे-धीरे निर्मित हो रही है और यह अपनी प्रारंभिक जनपक्षधर दृष्टि को फिर से अपने कंटेंट में, अपनी प्रस्तुति में आत्मसात कर रहा है। इस परिवर्तन के प्रति पाठकीय संकेत भी सकारात्मक हो रहे हैं और धीरे-धीरे समाचारपत्र की प्रसार संख्या भी बढ़ रही है। एक बार फिर यह समाचारपत्र अपनी वैचारिकता और सांस्कृतिक विविधता के लिए जगह बनाने की ओर है।

जहाँ तक आर्थिक पक्ष का सवाल है, कुछ कठिनाइयाँ हैं। इसके बावजूद उन्हें ठीक करने का प्रयास चल रहा है। जब से विनीत मौर्य ने काम संभाला है, चीजें ठीक होती गयी हैं। पहले रौशनी नहीं थी। डीजल फूँकना पड़ता था। कार्यालय में भी और मशीन में भी। अब रौशनी है। लाइनें जुड़ गयी हैं। आफिस पहले से ज्यादा शांत और जगमग है।

यह कहना सही नहीं है कि मई तक का वेतन नहीं िमिला है। तीन-चौथाई कर्मचारियों को मई का वेतन दिया जा चुका है और बाकी को भी एक-दो दिनों में मिल जायेगा। इस तरह अब केवल जून माह का बकाया होगा। जून का वेतन जुलाई में मिलना चाहिए और जुलाई अभी बीती नहीं है। इसे ठीक करने के प्रयास किये जा रहे हैं। हमें नहीं पता कि किस जनसंदेशकर्मी ने आप को खत भेजा है लेकिन उसकी नाराजगी गैरवाजिब है। सुभाष राय के आने के बाद जो नये कर्मचारी रखे गये हैं, उनका वेतन नियमित रूप से उन्हें दिया जा रहा है। कुछ भी छाप देने की जगह भड़ास को विश्वसनीयता का एक स्तर कायम रखना चाहिए। सबको नहीं लगना चाहिए कि यहाँ सब कुछ  चंडूखाने का है।

जनसंदेश प्रबंधन का यह पक्ष भड़ास को मेल के जरिए मिला है.


मूल खबर–

जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ में काम करने वालों को मई महीने की भी सेलरी नहीं मिली

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
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