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तो क्या मैं रेसपोंस बताने के लिये यहां बैठा हूं…

'ये शुरुआती दौर है बाबू…अभी मलाईखोरों की झल्लाहट भी झेलनी पड़ेगी और अपन को अभी ठोकरे भी खानी पड़ेगी..लेकिन हार कभी नहीं माननी।' ये वो स्टेटमेंट है जो आज मेरे दिल ने मुझे अभी-अभी सुनाई है। दरअसल मामला कुछ यूं है कि एक संस्थान में नौकरी के लिये विज्ञापन देखा तो रिज्यूम भेज दिया।

'ये शुरुआती दौर है बाबू…अभी मलाईखोरों की झल्लाहट भी झेलनी पड़ेगी और अपन को अभी ठोकरे भी खानी पड़ेगी..लेकिन हार कभी नहीं माननी।' ये वो स्टेटमेंट है जो आज मेरे दिल ने मुझे अभी-अभी सुनाई है। दरअसल मामला कुछ यूं है कि एक संस्थान में नौकरी के लिये विज्ञापन देखा तो रिज्यूम भेज दिया।

रिज्यूम भेजे तकरीबन एक महीना हो गया। लेकिन उधर से कोई रेसपोंस नहीं। रिज्यूम का स्टेटस जानने के लिये, उम्मीद पर कायम दुनिया जैसे जुमले ने उत्साह बढ़ाया और संस्थान के संपर्क सूत्र की खोज में लग गया (संस्थान के ऑफिस इसलिये नहीं गया क्योंकि वहां जाकर कोई फायदा नहीं था। वहां गेटकीपर ही बॉस होता है)।

काफी माथापच्ची करने के बाद आखिर संस्थान का टेलीफोन नम्बर मिला। फोन लगाया.. फोन किसी फलाने सिंह ने रिसीव किया…उनसे पूछा,.. साहेब आपके यहां रिज्यूम भेजा है..पर कोई रिप्लाई नहीं आया। मैं अपनी बात पूरी कर ही रहा था कि उन्होंने किसी ढिकाने सिंह से बात करने को कहा…आप ढिकाने सिंह से बात कर लें..वो ही बता पायेंगें आपकों ठीक से,…सर उनका नम्बर,..उन्होंने अपना नम्बर देने से मना किया हुआ है,…बस इतना कहा और फोन कट।

खैर इस बेचैन को कहां चैन था। चार दिन बाद फिर से ऑफिस में फोन घुमा दिया। फिर से उन्हीं फलाने सिंह ने फोन उठाया और इस बार बिना किसी ज्यादा पूछताछ के किसी खड़ाने सिंह का नम्बर दे दिया और कहा,.. ये खड़ाने सिंह है..इनसे आपको ढिकाने सिंह का नम्बर मिल जाएगा। तुरंत खड़ाने सिंह को फोन घुमाया गया। लेकिन खड़ाने सिंह का फोन आराम कर रहा था यानि स्विच ऑफ था। अगले तीन दिन लगातार खड़ाने सिंह का फोन लंबी-गहरी नींद में सोया रहा। शायद उसे लंबे आराम की आदत पड़ गई थी। अब ये कहना मुश्किल है फोन को या खड़ाने सिंह को।

इस बैचेन ने खड़ाने सिंह को फिर से चौथे दिन फोन लगाया। अब फोन गहरी नींद से जाग चुका था और उधर से  एक मोटी भारी आवाज ने मेरे कान में एंट्री की, जो खड़ाने सिंह की थी… हैल्लो,.. हैल्लो सर आप खड़ाने सिंह बोल रहे है…जी हां बोल रहा हूं, सर मुझे ढिकाने सिंह का नम्बर चाहिये और आपका नम्बर फलाने सिंह से मुझे मिला है…जी,..जी कौन फलाने और ढिकाने सिंह..मैं किसी को नहीं जानता। बस इतना कहा और फोन कट। पांच दिन की कड़ी वेटिंग गई पानी में…खैर हिम्मत नहीं हारी क्योंकि उम्मीद पर दुनिया कायम है। फिर से ढिकाने सिंह के नम्बर की खोजबीन में जुट गया।

लगभग एक महीने बाद ढिकाने सिंह का नम्बर कड़ी खोजबीन के बाद आखिर मिल ही गया। नम्बर मिलते ही ढिकाने सिंह को फोन लगाया…सर आप ढिकाने सिंह बोल रहे है,…हां बोल रहा हूं,…सर आपकों रिज्यूम सेंड किया था.. एक महीने से ज्यादा हो गया है.. कोई रेसपोंस नहीं आया,… जी,..जी सुनिये अगर आपने नौकरी के लिये फोन किया है तो गलत किया है,…सर मैंनें नौकरी के लिये नहीं रिज्यूम के रेसपोंस के लिये फोन किया है,…तो क्या मैं रेसपोंस बताने के लिये यहां बैठा हूं,…सर आपके ऑफिस से मुझे यही बताया गया है कि उस डिपार्टमेंट का सबकुछ आप ही देखते है। खड़ाने सिंह ने एक लंबी गहरी सांस ली और  झल्लाहट भरी आवाज में मुझ पर गुस्सा उतारते हुए कहा… आपने विज्ञापन नहीं पढ़ा…विज्ञापन में साफ-साफ लिखा है.. किसी भी तरह की कोई भी कॉल न करें,…सर,..सर  रिज्यूम सेंड किये एक महीना हो गया। मैंने आपकों सिर्फ रिज्यूम के रेसपोंस के रिगार्डिग फोन किया है न कि आपसे किसी प्रकार की सिफारिश के लिये।

मेरे मन में और भी कई बातें थी जो ढिकाने सिंह को कहना चाहता था। लेकिन ढिकाने सिंह ने झल्लाहट के साथ फोन पहले ही कट कर दिया। अब मैं आपकों वो बताता हूं जो ढिकाने सिंह से मैं कहना चाहता था। प्रिय, ढिकाने सिंह जी मुझे खैरात में मिली चीजें पसंद नहीं आती और न मैं उन्हें लेना पसंद करता। आपको फोन करने का मेरा मकसद, आपके ऑफिस की तरफ से रेसपोंस न आने का कारण जानना था न कि आपसे किसी प्रकार की सिफारिश करना। मैंने आपसे पहले आपके ऑफिस में संपर्क किया लेकिन वहां मुझे बताया गया कि उस डिपार्टमेंट को आप ही देखते है तो मैं उनसे संपर्क करुं।

और अगर मेरे पास सिफारिशी ही होते तो मैं आपके पास नौकरी के लिये रिज्यूम नहीं भेजता बल्कि सिफारशी कब का मुझे कहीं न कहीं चिपकायें हुए होते तथा मुझे बेवजह ये सब लिखने के लिये मजबूर न होना पड़ता। एक बात और जब मीडिया में पिछले दरवाजे से एंट्री की प्रथा कायम है तो आपके संस्तथान की तरफ से विज्ञापन जैसी ढकोसलेबाजी क्यों..? बेहतर होता पिछले दरवाजे से भर्ती कर लेते। वैसे आप और आपका संस्थान भी इस प्रथा से अपने आप को मुक्त नहीं कर सकते क्योंकि आप न सही पर आपके यहां भी कई बेरोजगारों के रिश्तेदारे बैठे है जो मीडिया में भाई-भतीजावाद जैसे नियम का सक्रिय रुप से पालन कर रहे होंगे और किसी भी कीमत पर उनकों एंट्री दिलाने के लिये एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे होंगे।

खैर मेरा दिल मुझसे कह रहा है 'ये शुरुआती दौर है बाबू…अभी मलाईखोरों की झल्लाहट भी झेलनी पड़ेगी और अपन को अभी ठोकरे भी खानी पड़ेगी..लेकिन हार कभी नहीं माननी।'

रहीसुद्दीन 'रिहान'

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