Vikas Mishra : ये सोचकर मैं फेसबुक पर आया था कि ये जोड़ेगा हमें- लोगों से, दोस्तों से, देश के अलग अलग हिस्से की संस्कृतियों से, दोस्तों की खुशियों से, दोस्तों के गमों से। कुछ हम सुनेंगे, महसूस करेंगे, कुछ हम सुनाएंगे, कुछ बांटेंगे, लेकिन इधर लग रहा है कि दिलों को जोड़ने का मंच बना फेसबुक बहुत कुछ तोड़ने का मंच बन रहा है।
कहां तो तय था कि दर्द बांटेंगे, खुशियां बांटेंगे। लेकिन यहां तो कुछ और ही बंट रहा है। इंसानियत बंट रही है। धर्म निरपेक्षता-सांप्रदायिकता का बंटवारा हो रहा है। हिंदू-मुस्लिम हो रहा है। राहुल-मोदी हो रहा है। राजनीति ने इस मंच पर भी फन फैला लिया है। तमाम दोस्त जुटे हैं ये साबित करने में कि मोदी रॉबिनहुड हैं, उन्हें प्रधानमंत्री बना देंगे तो देश फिर से सोने की चिड़िया बन जाएगा। तमाम दोस्त मोदी से ऐसे डरा रहे हैं कि मोदी आ गए तो कयामत आ जाएगी।
समर्थन-विरोध गाली गलौच और नफरत की चिनगारी भड़काने की हद तक जा रहा है। धर्म के नाम पर न जाने क्या क्या लिखा जा रहा है। खुद को परम ज्ञानी समझने वाले कई लोग ज्ञान की उल्टियां कर रहे हैं। क्या हमने-आपने यही सब पाने, पढ़ने, जानने के लिए खुद को फेसबुक से जोड़ा था।
लेखक विकाम मिश्र आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर हैं. उनके फेसबुक वॉल से साभार.





